‘नो डिटेंशन पॉलिसी’ खत्म: जानिए बच्चों पर इसका क्या असर होगा?

5वीं और 8वीं कक्षा की परीक्षा में फेल होने वाले बच्चों को अब अगली कक्षा में क्रमोन्नत या पास नहीं किया जाएगा। ऐसे बच्चों को फिर से उसी कक्षा में पढ़ना होगा जिस कक्षा की परीक्षा में वे फेल हुए हैं। केंद्र सरकार ने 23 दिसंबर 2024 को ‘नो डिटेंशन पॉलिसी’ खत्म कर दी है। पहले इस नियम के तहत फेल होने वाले बच्चों को भी अगली कक्षा में प्रमोट कर दिया जाता था।
शिक्षा का अधिकार क़ानून-2009 के अनुच्छेद-16 का एक खण्ड के रूप में नो डिटेंशन पॉलिसी को शामिल किया गया था। यह कहता है, “स्कूल में प्रवेश लेने वाले किसी भी बच्चे को किसी क्लास में फिर से नहीं रोका जाएगा या प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने तक स्कूल से बाहर नहीं निकाला जाएगा।”
नो डिटेंशन पॉलिसी खत्म, क्या होगा असर?
केंद्र सरकार की तरफ से जारी नए नोटिफिकेशन के अनुसार फेल होने वाले बच्चों को 2 महीने के भीतर दोबारा परीक्षा देने का मौका दिया जाएगा। अगर वे दोबारा होने वाली परीक्षा में भी फेल होते हैं, तो उन्हें अगली कक्षा में प्रमोट नहीं किया जाएगा, बल्कि जिस क्लास में वो पढ़ रहे थे उसी कक्षा में दोबारा पढ़ेंगे। केंद्र सरकार ने इसमें एक नया प्रावधान भी जोड़ा है कि 8वीं तक के ऐसे बच्चों को स्कूल से निकाला नहीं जाएगा, जबतक कि उनकी प्रारंभिक शिक्षा पूरी नहीं हो जाती है।
केंद्र सरकार द्वारा शिक्षा का अधिकार कानून में होने वाले इस बदलाव का सीधा असर केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों और सैनिक स्कूलों सहित करीब 3 हजार से ज्यादा स्कूलों पर होगा। 16 राज्य और 2 केंद्र शासित प्रदेश (दिल्ली और पुडुचेरी) नो-डिटेंशन पॉलिसी पहले पहले ही खत्म कर चुके हैं। शिक्षा राज्य सरकार (समवर्ती सूची) का विषय है, इसलिए विभिन्न राज्य नो डिटेंशन पॉलिसी के समाप्त होने वाली स्थिति के संबंध में अपना-अपना निर्णय ले सकते हैं।
निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार (संसोधन) नियम 2024 की 6 खास बातें
- शैक्षणिक वर्ष के अंत में होने वाली 5वीं या 8वीं की परीक्षा में फेल होने वाले विद्यार्थियों को दो महीने के भीतर फिर से परीक्षा देने का मौका दिया जाएगा।
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अगर विद्यार्थी परीक्षा परिणाम घोषित होने के दो महीने के भीतर होने वाली परीक्षा में भी फेल हो जाता है तो उसे 5वीं या 8वीं कक्षा में फिर से पढ़ना होगा।
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अगली कक्षा में प्रोन्नति न होने वाली स्थिति में कक्षा-शिक्षक बच्चे के साथ-साथ यदि आवश्यकता हो तो माता-पिता का भी मार्गदर्शन करेंगे। इसके साथ-साथ बच्चे के अधिगम की चुनौतियों का समाधान करने के लिए विशेषज्ञीय इनपुट देंगे।
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विद्यालय के प्रिंसिपल ऐसे बच्चों की सूची बनाएंगे जो उसी कक्षा में रोके गए हैं (5वीं या 8वीं) और ऐसे बच्चों की शैक्षिक प्रगति की व्यक्तिगत रूप से मॉनिटरिंग करेंगे।
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बच्चों के समग्र विकास को हासिल करने के लिए होने वाली परीक्षाएं दक्षता आधारित होंगी, न कि रटने की क्षमता पर।
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किसी भी बच्चे को तब तक स्कूल से नहीं निकाला जाएगा जबतक वह प्रारंभिक शिक्षा पूरी नहीं कर लेता है।
नो डिटेंशन पॉलिसी के खत्म होने पर प्रोफेसर कृष्ण कुमार क्या कहते हैं?
एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक प्रोफेसर कृष्ण कुमार ने इस फैसले के बारे में बीबीसी न्यूज हिन्दी से कहा, “शिक्षा का अधिकार कानून 2010 में पास हुआ था तो उस नीति का उद्देश्य शुरू से एकदम साफ रहा कि शुरु में पहली से कक्षा आठवीं तक बच्चे अलग-अलग गति से आगे बढ़ते हैं। अगर आप किसी बच्चे को रोक देते हैं या डिटेन कर लेते हैं तो उसका पूरा एक साल बरबाद हो जाता है। आमतौर पर कोई बच्चा एक विषय में कमजोर होता है, कोई दूसरे विषय में कमजोर होता है तो उस विषय के कारण उसका पूरा साल बरबाद हो जाता है। तो इस पॉलिसी का अर्थ शुरू से यही रहा है कि आठ वर्ष तक बच्चों को स्कूल में हमको रखना है।”
उन्होंने आगे कहा, “शिक्षा का अधिकार कानून में भी यह प्रावधान है कि ऐसे बच्चों को विशेष मदद दी जाए जिससे अगर किसी एक विषय या दो विषयों में कमजोर है तो वह कमजोरी दूर हो जाए, यह नहीं कि उनको फिर से उसी क्लास में पूरी साल पढ़ना पड़े। मेरी समझ में शिक्षा के अधिकार कानून में एक थोड़ा सा विचलन है क्योंकि उस कानून के अनुसार तो कक्षा-5 में या कक्षा-8 में कोई परीक्षा नहीं ली जा सकती, इसके लिए आपको सतत प्रक्रिया के तहत बच्चों को मूल्यांकित करते रहना है और जो-जो कमजोरियां मालूम पड़ें उनका उपचार करना है। इसमें एक प्रकार का संसोधन या विचलन है जो कई राज्य पहले ही कर चुके हैं जैसे दिल्ली। निष्काषित न करना कोई बहुत बड़ी चीज नहीं है, लेकिन इम्तिहान लेना छोटी उमर में मेरी समझ में सही नहीं है।”
शिक्षा का अधिकार कानून में जो संसद से पास हुआ, एकमात्र ऐसा कानून है जिसे संसदीय मान्यता प्राप्त है, वो राज्यों का कानून नहीं है। यह संसोधन एक तरह का विचलन ही है जो अच्छा संकेत नहीं है कि हम उस कानून से इतनी जल्दी हट रहे हैं। बहुत से राज्य हैं जैसे तमिलनाडु और केरल उन्होंने बहुत पहले से नो डिटेंशन पॉलिसी का पालन किया और इसका लाभ उनको मिला, जब बच्चे धीरे-धीरे आठवीं तक पहुंचते हैं तो उनकी बहुत सी खामियां अपने आप दूर हो जाती हैं अगर स्कूल अच्छा चल रहा हो। तो इस वजह से ही आप देखते हैं कि दक्षिणी राज्यों में स्कूली शिक्षा में इतनी सफलता मिली है खासकर तमिलनाडु और केरल में और किसी हद तक कर्नाटक में।
बहुत से बच्चे स्कूली शिक्षा नहीं पूरी करते हैं और शिक्षा में इतनी विषमता है, इन सबको दूर करने के लिए ही शिक्षा का अधिकार कानून बना था, उसके अनुसार यह बदलाव उचित नहीं है। यह हर बच्चे का अधिकार है कि वह आठ वर्ष स्कूल में रहे। बच्चे का यह अधिकार किसी परीक्षा से या किसी तरह के शैक्षिक प्रदर्शन से जुड़ा हुआ नहीं है। शिक्षा को जो महत्व मिलना चाहिए, जितना वित्तीय प्रबंधन होना चाहिए शिक्षा के अधिकार कानून के अनुसार जाहिर है कहीं न कहीं उसमें कमी आ रही है, इसलिए ऐसी छोटी-छोटी चीजें करनी पड़ रही हैं जो कि मूल कानून में धीरे-धीरे आता हुआ बदलाव है जो कि मेरी समझ में दुर्भाग्यपूर्ण है।
‘नो डिटेंशन की बजाय क्रियान्वयन को मजबूत बनाने की जरूरत’
वहीं एनसीईआरटी की पूर्व-डीन सरोज यादव ने बीबीसी हिन्दी से बात करते हुए कहा, “पॉलिसी से क्या बदलाव आएगा, ये तो मैं नहीं कह सकती। ये जो फेल-पास का स्टिग्मा है, परीक्षा में फेल होने वाले बच्चे पर यह ठप्पा हमेशा लगा रहता है, इसलिए जरूरत थी कि क्रियान्वयन को मजबूत करें। मैं तो सतत और व्यापक मूल्यांकन (सीसीई) के पक्ष में हूँ। हम असेसमेंट पर फोकस नहीं दे रहे हैं, हम परीक्षा पर ज्यादा फोकस दे रहे हैं। शिक्षा का अधिकार कानून एक अधिकार है, कोई कर्तव्य या जिम्मेदारी नहीं है। इसको पूरा करने के जो प्रयत्न होने चाहिए, वह होना चाहिए।
ऐसे प्रावधान कि परीक्षा को दोबारा पास करने के लिए बच्चों को दो के भीतर से फिर से मौका देंगे। बच्चा फिर भी पास नहीं हुआ तो उसे फेल कर देंगे। फेल होने वाले बच्चे का आत्मविश्वास अगर खत्म हो जाएगा, तो वह आत्मविश्वास दोबारा कभी नहीं आता है। बच्चे में हीन-भावना बनी रहती है, परिवार उसे ताने देता है, दोस्त उसे ताने देते हैं तो जरूरत यह थी कि सिस्टम को सुधारें (जिसे होल सिस्टम अप्रोच कहते हैं)। तो सिस्टम को सुधारने की बजाय हम दो महीने में दोबारा परीक्षा के मौके देने की बात कर रहे हैं जो कि क्रियान्वयन की एक रणनीति है।
हमें क्रियान्वयन की नीति को बेहतर और मजबूत बनाना चाहिए जैसे वित्तीय प्रावधान,शिक्षकों की उपलब्धता,स्कूल का वातावरण और अभिभावकों को तैयार करना ताकि बच्चे ड्रॉप आउट न हों। हमें ड्रॉप आउट को रोकने के लिए काम करना चाहिए। ड्रॉप आउट क्यों हो रहा है इसके कारणों को समझना चाहिए कि क्या ऐसा स्कूल सिस्टम, या शिक्षकों या फिर पैरेंट्स की वजह से हो रहे हैं, क्या वे खुद ड्रॉप आउट हो रहे हैं? ये चीजें ढूंढकर उनके ऊपर काम करने की जरूरत है। हम काम कर रहे हैं दूसरी चीजों पर, मेरा तो यही मानना है कि सतत और व्यापक मूल्यांकन हो यानि बच्चों की प्रोग्रेस सतत बेहतर हो।
अंत में उन्होंने एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा कि सरकारी स्कूल में बच्चे कम क्यों होते जा रहे हैं? जबकि यहां पर पूरा सिस्टम है, स्मार्ट क्लासरूम भी दे रहे हैं कहीं न कहीं तो कोई खामी है, या तो बच्चों को पढ़ने में आनंद नहीं आ रहा है, या आप जिस ज्वायफुल लर्निंग की बात कर रहे हैं वह सैद्धांतिक है प्रेक्टिकल में वह होता ही नहीं है। यानि कोई बच्चा तीन घंटे फिल्म तो लगातार देख लेता है लेकिन क्लास में तीन घंटे तो क्या आधे घंटे में बोर हो जाता है तो क्यों न हम ऐसी कोई रणनीति अपनाएं ताकि बच्चा जिस तरीके से सीखता है ऐसे तरीके अपनाएं तो निश्चित रूप से बच्चा इंज्वाय करेगा और उसकी लर्निंग बढ़ जाएगी, मैं तो इसी विचार की पक्षधर हूँ।