चर्चा में: ‘नो डिटेंशन पॉलिसी’ खत्म होने पर क्या सोच रहे हैं शिक्षक?

प्रत्येक शिक्षक जो वास्तव में बच्चों के साथ कक्षा में कार्य करते हैं वे यही चाहते हैं कि उनके सभी बच्चे उत्तीर्ण हों और सीखते हुए आगे से आगे बढ़े। उनके लिए वास्तव में बच्चों का पास होना ही उनके लिए अध्यापन की परीक्षा में पास होना है। कोई अध्यापक यह नहीं चाहता कि बच्चे को परीक्षा में फेल किया जाए। लेकिन किसी बच्चे का ऐसा उत्साहपूर्ण व्यवहार की वह पढ़े या न पढ़े, परिश्रम करे या न करे, परीक्षा उसका क्या ही बिगाड़ लेगी, उसे हमेशा के लिए मेहनत करने की आदत से दूर कर देती है।
पढ़ाई से दूर कर रही है परीक्षा विहीन प्रणाली
अंकुश का प्रयोग मतवाले हाथियों को काबू में करने के लिए किया जाता है न कि उन्हें कष्ट देने के लिए। इसी प्रकार परीक्षा विहीन प्रणाली भी बच्चों को निरंकुश बना रही है, इसका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव उन बच्चों पर पड़ता है जो परिश्रमशील होते हैं, लेकिन कभी कभी तो उन्हें भी लगता है कि पढ़ने लिखने और परिश्रम करने का कोई फायदा नहीं। क्योंकि अंततः तो सारा धान एक पसेरी ही हो जाएगा, यानि परीक्षा में जब सभी पास हो ही रहे हैं चाहें वे पढ़ें या न पढ़ें तो मेहनत करने का क्या ही लाभ है।
मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि अध्यापकों के एक बड़े वर्ग को इस निर्णय से कोई गहरा फर्क़ नहीं पड़ेगा क्योंकि एक लम्बे समय तक परीक्षा को उपहास–पूर्ण प्रणाली बनाए रखने की वृत्ति ने उन्हें इसके लिए अभ्यस्त कर दिया है। उन्हें भी यही ठीक लगता है कि साल भर का समय बिताओ और सबको पास करके अपने सिर का बोझ हटाओ। यह मुक्ति का सबसे सरल मार्ग है। मुझे तो यह भी लगता है कि शिक्षाविदों की आड़ में बहुत से आंदोलन–जीवी शिक्षक परीक्षा कराने और फेल करने का विरोध ही करेंगे क्यूंकि इससे बेवजह काम का बोझ और सिरदर्द बढ़ जाएगा, और इससे हासिल क्या होगा, दो माह के बाद पुनः परीक्षा कराना, कॉपी जांचने की जहमत इत्यादि।
इस फैसले का असर विद्यालय के माहौल पर निर्भर करता है
यह फैसला बच्चों की पढ़ाई को देखने के तरीके को कैसे प्रभावित करेगा? अगर इस सवाल के नजरिए से इस समस्या पर विचार करें तो कह सकते हैं कि बच्चों को यह फैसला वैसे ही प्रभावित करेगा जैसा माहौल हम विद्यालय में बनाएंगे। यदि विद्यालय स्तर पर इसे डरावना बनाया जाएगा तो यह वैसे ही होंगी, परंतु यदि इन्हें उत्सव या प्रोत्साहन के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा तो बच्चे इन्हें इस नजरिये से देखेंगे।
लापरवाही हम कब सीखते हैं? बस यह वही मसला है, जब हमें यह एहसास हो जाता है कि हमारे कुछ भी न करने से हमारे व्यक्तित्व या भविष्य पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यानी कि जब हम निरंकुश होते हैं तब लापरवाह होने लगते हैं। वास्तव में परीक्षाएं कोई नकेल नहीं जिसे कसा जाए अपितु ये मूल्यांकन का एक उत्साहपूर्ण उपक्रम है, जो हमे अपनी क्षमताओं और कमियों को आँकने और समझने का अवसर देती हैं।
परीक्षाओं से गुजरकर बच्चों में बढ़ता है आत्मविश्वास
बच्चों में परीक्षा के डर की बात से जो शिक्षाविद डर जाते हैं, वे वास्तव में कहीं ना कहीं बच्चों को मानसिक स्तर पर बहुत ही कमजोर सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। वास्तव में हमारा पूरा जीवन ही एक परीक्षा की तरह चल रहा होता है, ऐसे में परीक्षा से बचना या परीक्षा को डरावना बता करके उससे भागना, दोनों ही जीवन के मूलभूत व्यवहार को सीखने में बाधक है। परीक्षा और मूल्यांकन दोनों ही साथ-साथ चलते रहने चाहिए। यह जो सतत मूल्यांकन की बातें करके परीक्षा को हमेशा कमतर या डरावना बताने का प्रयास किया जाता है वही बच्चों के विकास में बाधक बनता है और मनोवैज्ञानिक रूप से बच्चे को संघर्ष के प्रति तैयार होने में भी रुकावट करता है।
परीक्षाओं के दौर से गुजरते हुए बच्चे में जो आत्मविश्वास पैदा होता है और उसे यह समझ में आ रहा होता है कि उसने क्या सीखा है और कहां पर उसे और सीखने की जरूरत है। यह परीक्षा प्रणाली हर तरीके से बच्चे की सीखने की यात्रा में मददगार होती है बशर्ते शिक्षकों या समाज के स्तर पर बच्चों को परीक्षा परिणाम के आधार पर हतोत्साहित न किया जाए।
बच्चों को न्यूनतम अधिगम स्तर तो हासिल करना चाहिए
यह कहना कि फेल होने वाले बच्चों को उनके मित्र चढ़ाएंगे और इससे उनके मानसिक स्तर पर बुरा प्रभाव पड़ेगा , वास्तव में बच्चों के पूरे जीवन को बर्बाद कर देने वाली एक साजिश जैसा विचार है। जो बच्चे परीक्षाओं में फेल हो रहे हैं इसमें यह क्यों न माना जाए कि वह अभी उस न्यूनतम अधिगम को हासिल नहीं कर पाए जिस स्तर की परीक्षा में वे शामिल हुए थे. ऐसे में उन्हें लगातार पास करते-करते आगे बढ़ाते जाने से उनकी उम्र तो बढ़ती जाती है पर उनकी समझ नहीं बढ़ रही है। इतना ही नहीं, जैसे-जैसे बच्चा अगली व उच्चतर कक्षाओं में जाता है नए पाठ्यक्रम का दबाव बढ़ता जाता है जिससे उसमें सीखने की प्रक्रिया और पाठ्यक्रम की जटिला भी बढ़ती है।
एक समय ऐसा भी आता है कि जब ऐसे बच्चे निराश होकर पढ़ने की प्रक्रिया से बिल्कुल ही बाहर हो जाते हैं। यदि इन बच्चों को उसी कक्षा में सीखने का पुनः अवसर मिलता तो संभव होता कि वह उन गैप्स को भरते हुए और अपनी गलतियों और कमियों को समझते हुए ऊंची कक्षाओं के लिए बेहतर तैयार हो सकते थे। मैंने स्वयं ऐसे अनेक बच्चों को कक्षाओं में पढाई से जूझते हुए देखा है जो किसी भी प्रकार से उस कक्षा के पाठ्यक्रम के साथ तालमेल नहीं बैठा पाते हैं और प्रतिदिन अपने साथियों के समक्ष हीन महसूस करते हैं। क्योंकि वे न तो शिक्षक का कक्षा में पढ़ाया हुआ पाठ समझ पा रहे होते हैं न ही उससे जुड़ पाते हैं।
यह रोज-रोज की परिस्थिति फेल होने पर होने वाली तथाकथित बेइज्जती के डर से कहीं ज्यादा खतरनाक हो जाती है और पढ़ाई में पिछड़ते हुए बच्चे का व्यक्तित्व नष्ट कर देती है। उसका स्वाभिमान रोज-रोज चोट खाकर उसे यह सिखा देता है वह कक्षा में व्यर्थ बैठा है और ड्रॉप आउट की तरह अपने क़दम बढ़ा देता है। उसके पास सीखने की पटरी पर लौटने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। इसलिए मेरा यह स्पष्ट मानना है कि बच्चे के मूल्यांकन के साथ ऐसी प्रणाली जरूर बनाई जाए जो उसके सीखने की प्रक्रिया में सहायक हो।
(नोट: यह एक शिक्षक के व्यक्त किए हुए विचार हैं। इससे आपकी सहमति जरूरी नहीं है। आप अपने सुझाव व टिप्पणी को लेख के नीचे दर्ज कर सकते हैं।)