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तोत्तो चान: कहानी एक प्रयोगधर्मी स्कूल से मिलने वाली सीख की

‘तोत्तो चान’ किताब की लेखिका तेत्सुको कुरोयानागी इस स्कूल की छात्रा रही हैं।

‘तोत्तो चान’ जापान के शिक्षाविद् सोसाकु कोबायाशी और उनके प्रयोगधर्मी स्कूल तोमोए की कहानी है। इस किताब की लेखिका तेत्सुको कुरोयानागी इस स्कूल की छात्रा रही हैं। दरअसल उन्होंने यह किताब संस्मरणात्मक शैली में लिखी है। यह जितना कोबायाशी और उनके स्कूल तोमोए की कहानी है, उतनी ही तेत्सुको कुरोयानागी की भी कहानी है।

तोत्तो चान तोमोए स्कूल में बीते उनके बचपन का वो दस्तावेज है जिसने उनके व्यक्तित्व पर गहरा असर डाला है। तेत्सुको को बड़े होने पर यह एहसास होता है कि तोमोए स्कूल में जिस तरह की शिक्षा पद्धति के सहारे उन्हें शिक्षा दी गई थी, वो लगती तो थी खेल और मौज-मस्ती की गतिविधियों की तरह लेकिन दरअसल में वो निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के तहत सोच-समझ कर किए गए क्रियाकलाप थे। फिर चाहे वो बच्चों में संतुलित पोषण आहार का अभ्यास डलवाना हो या फिर उनके अंदर लैंगिक संवेदनशीलता विकसित करना या फिर किसी शारीरिक अक्षमता वाले बच्चे का उसे बिना इसका एहसास कराए, उसका ख्याल रखना।

 सीखने का अवसर बनीं रचनात्मक गतिविधियां

इन सब उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कोबायाशी रचनात्मक गतिविधियों का सहारा लेते हैं। वह हर गतिविधि के माध्यम से बच्चों में पहले कौतूहल जगाते थे, फिर उसमें बच्चों की रुचि विकसित होनी शुरू होती थी। अब जैसे संतुलित पोषण वाले आहार के लिए वो ‘कुछ समुद्र से और कुछ पहाड़ से’ जुमले का प्रयोग करते हैं। इसमें वो बच्चों को लंच में कुछ समुद्री आहार तो कुछ पहाड़ी खाना लाने को बोलते हैं। अगर किसी के लंच में इसकी कमी दिखती है तो वो अपने रसोईघर से उसकी पूर्ति करते हैं। इस तरह से बच्चों में अनजाने में ही संतुलित पोषण वाला आहार लेने का अभ्यास विकसित होता है। ठीक से चबा कर खाने का संदेश देने के लिए वो एक गीत का सहारा लेते हैं।

लड़के और लड़कियों के बीच शारीरिक बनावट के भेद को सहजता से समझाने के लिए कोबायाशी बच्चों को एक साथ स्वीमिंग पूल में तैरना सिखाते हैं। इस क्रम में बच्चे लड़के-लड़कियों के अलावा जो असमान्य बच्चे थे, उनके शारीरिक बनावट को लेकर भी सहज हो पाए। इसी तरह से कोबायाशी बच्चों के मन से भूत के डर को भगाने को लेकर प्रयोग करते हैं। खुले आसमान के नीचे सोने का प्रयोग करते हैं। वे बच्चों को समुद्र में तैरने का अनुभव कराते हैं।

स्कूल में प्रकृति और समाज से सीखने के भरपूर अवसर 

सोसाकु कोबायाशी अपने इस स्कूल में व्यायाम (यूरिथमिक्स) का अनूठा प्रयोग करते हैं। इसमें बच्चे केवल कान से नहीं दिल और दिमाग से भी संगीत सुनना सीखते हैं। बच्चों को खेती-बाड़ी की भी सीख देते हैं। इसके लिए वो एक किसान को उनका अध्यापक बनाते हैं और ये किसान अध्यापक बच्चों को क्लास में नहीं बल्कि खेतों में काम कराते हुए खेती-बाड़ी की जानकारी देते हैं। कोबायाशी बच्चों के साथ खुले में रसोई पकाने का भी प्रयोग करते हैं।

एक बार तोत्तो चान को युद्ध में घायल सैनिकों से भी मिलने का अवसर हासिल हुआ। ये सारे प्रयोग तोमोए के बच्चों को कोई ना कोई सबक देने के साथ आत्मविश्वास और संवेदना से भर देते थे।  तोमोए में कक्षाएँ भी अनोखे तरीके से चलती थी। ये कक्षाएँ रेल के पुराने डिब्बों में चलती थीं। मानो बच्चे किसी सफर पर निकले हो और उन्हें प्रकृति की पूरी सोहबत हासिल हो रही हो।

किताबों से जोड़ने का अनोखा प्रयोग

इस स्कूल में पुस्तकालय के लिए जब ट्रेन का एक नया डिब्बा जोड़ा गया तब बच्चों में कोबायाशी ने नए डिब्बे को लेकर पहले कौतूहल जगाया। नया डिब्बा कैसे आता है, इस पूरी प्रक्रिया को देखने के लिए बच्चों को रात में स्कूल में ही ठहरने को कहा गया। सर्दियों की छुट्टियों के बाद जब बच्चों ने देखा कि नए डिब्बे को पुस्तकालय में बदल दिया गया था तब बच्चों ने पूरे उत्साह के साथ इसका स्वागत किया।

 इस पुस्तकालय के साथ भी कोबायाशी ने ये प्रयोग किए कि क्लास के हिसाब से किताबों को अलग नहीं किया और कहा कि कोई भी बच्चा किसी भी किताब को पढ़ सकता है। उन्होंने पहली घंटी पुस्तकालय के नाम कर दी। इसके बाद तो स्कूल के सारे बच्चे पुस्तकालय में किताबों पर टूट पड़े।

इस किताब को पढ़ते हुए यह बात समझ में आती है कि कैसे हम नए-नए रचनात्मक गतिविधियों के सहारे नए-नए प्रयोग कर बच्चों को बड़ी से बड़ी बात सहज तरीके से समझा सकते हैं। उन्हें बिना इस बात का एहसास कराए कि उन्हें कुछ सिखाया जा रहा है, उनकी चेतना में बहुत कछ डाला जा सकता है।

जापान की इस कहानी से भारत क्या सीख सकता है?

यह किताब एक वैकल्पिक शैक्षणिक पद्धति की महत्व को रेखांकित करती है। हालांकि अपरंपरागत तरीके से चलने वाली तोमोए स्कूल की कहानी दूसरे युद्ध के दौरान के जापान की है।  मुमकिन है कि वहाँ के समाज में कई संदर्भ आज की तारीख में बदल गए हो। इसके अलावा अगर हम भारतीय समाज के संदर्भ में अगर उन प्रयोगों के साथ काम करे तो निश्चित तौर पर हमें यहाँ की संस्कृति, समाज और स्थानीयता का विशेष ख्याल रखना होगा।

इसलिए हमें उन प्रयोगों को हुबहू उतारने की कोशिश ना कर उस एप्रोच को समझने की कोशिश करनी चाहिए और उसके आधार पर नए-नए रचनात्मक गतिविधियों को डिजाइन करने की कोशिश करनी चाहिए।

इन तरीकों में बच्चों की रुचि और व्यक्तित्व का ख्याल रखना भी शामिल होना चाहिए। अब जैसे तोमोए में जो बच्चे थे वो किसी भी दूसरे स्कूल के बच्चों की तरह ही अलग-अलग रुचि वाले थे, कुछ आम गतिविधियों में शामिल होते हुए भी उनकी अपनी विशिष्टता बची रहती थी।

बच्चों की रुचि को प्रोत्साहन ‘स्कूल संस्कृति’ का अभिन्न हिस्सा

जैसे तोमोए में पढ़ने वाला एक बच्चा था ताई-चान। उसकी विज्ञान में गहरी रुचि थी और वो आगे चल कर जापान का अग्रणी भौतिक-विज्ञानी बना। ऐसे ही एक और बच्चा था आकिरा ताकाहाशी, जो बचपन से ही छोटे कद का था और कभी लंबा भी नहीं हुआ लेकिन उसने तोमोए में सभी बाधा दौड़ अपने नाम किया था।

इसमें भी कोबायाशी की दूरदर्शिता थी कि ताकाहाशी के मनोबल को बढ़ाया जाए और उसके अंदर कम कद को लेकर कोई हीन भावना ना पनपे। यह बच्चा आगे चल कर एक कंपनी में कार्मिक प्रबंधक बनता है। कर्मचारियों के बीच समन्वय और सहयोग कायम करना उसकी जिम्मेदारी होती है। तोमोए से निकले ऐसे और भी कई बच्चों ने अपनी जिंदगी की राह अपनी रुचि और नैसर्गिक प्रवृत्ति के अनुरुप तय की।

दरअसल कोबायाशी के प्रयोगों का जोर बच्चों की नैसर्गिक विशेषताओं को निखारते हुए नई-नई बातों को सिखाने पर था। तोमोए में हुए सफल प्रयोग हमें इस बात का भी यकीन दिलाते हैं कि रचनात्मक गतिविधियों के सहारे वैकल्पिक तरीकों को अपनाते हुए बच्चों को सिखाया जा सकता है बशर्ते कि कोबायाशी की तरह बच्चों की स्वभाविकता को समझने के प्रयास किए जाए और उसके अनुरूप अपनी शैक्षणिक क्रियाकलापों को तय किया जाए।

(लेखक परिचय- तारेंद्र किशोर पिछले लगभग चार सालों से शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। इससे पहले आपकी एक दशक तक एक पत्रकार और लेखक के तौर पर सक्रियता रही है। आपका बीबीसी हिंदी सेवा के 5 सालों तक जुड़ाव रहा है। आप राष्ट्रीय सहारा, प्रभात खबर, देशबंधु, दैनिक जागरण और जनसत्ता जैसे दैनिक समाचार-पत्रों में विभिन्न विषयों पर लेख लिखते रहे हैं। आपने वायर, न्यूजलॉन्ड्री और सबरंग जैसी वेबसाइटों के लिए स्वतंत्र लेखन कार्य भी किया है।)

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