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बच्चों की रचनात्मकता को प्रोत्साहित करता है ‘टाइम लाइन कैलेंडर’

“दीवार का इस्तेमाल” पुस्तक में प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार स्कूल की कक्षा की दीवारों के रचनात्मक इस्तेमाल के बारे में लिखते हैं कि  “बगैर दीवारों के चलने वाले स्कूलों की बात छोड़ दी जाए तो यह कहे जाने में शायद ही किसी को आपत्ति हो कि एक औसत स्कूल दीवार का इस्तेमाल बाहरी दुनिया से रक्षा और इस दुनिया से भिन्न एक विशेष किस्म का वातावरण बनाने के लिए करता है। 
प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार आगे कहते हैं,”बाहरी दुनिया से रक्षा में धूप,बारिश और ठण्ड से रक्षा शामिल है और इस अर्थ में बच्चों की रक्षा किए जाने में कोई शंका नहीं हो सकती। शंका तब होती है जब हम पाते हैं कि दीवारों के सहारे स्कूल बाहर की दुनिया के सामाजिक यथार्थ से बच्चों को अलग रख रहा है। स्कूली व्यवस्था की दृष्टि में यह भी बच्चों की रक्षा ही है। यह एक पुरानी मान्यता है कि बच्चों का व्यक्तित्व यथार्थ की आँच नहीं सह सकता। इस मान्यता की आड़ में यह मान लिया जाता है कि स्कूल को सामाजिक यथार्थ से बच्चों की रक्षा करने का हक है। इसी हक में यह कर्त्तव्य भी शामिल माना जाता है कि स्कूल अपनी दीवारों के भीतर एक विशेष किस्म का वातावरण पैदा करे।”
दीवार का इस्तेमाल 
कृष्ण कुमार ने अपने लेख में लिखा था कि कुछ दिन (इसे अब कुछ वर्षों पहले पढ़ा जा सकता है) पहले भारत में यात्रा करते हुए मेरा ध्यान एक स्कूल की दीवारों पर लिखे उपदेशों की ओर गया। इस स्कूल में समय का प्रयोग बहुत अनाप-शनाप ढंग से होता है, पर दीवार पर लिखा था, “समय ही अनुशासन है।”
संस्था में आपसी कलह और व्यवस्था से जुड़ी दिक्कतों के कारण हर किसी का पारा लगभग हर वक्त चढ़ा रहता है, पर प्राचार्य के कमरे के बाहर लिखा था, “क्रोध को जीतो।” इसी तरह अन्य कई उपदेश वाक्य थे जो स्कूल के यथार्थ के ठीक विपरीत थे। इन वाक्यों से बच्चों के गिर्द एक विशेष किस्म का नैतिक वातावरण बुनने की कोशिश की गई थी। जैसी नैतिकता यह वातावरण सिखा रहा था, उसका कोई आधार स्कूल के भीतर या बाहर न था।”
इस कारण दीवारों पर अंकित वाक्यों की व्यंजना अत्यन्त कमज़ोर जान पड़ रही थी। उन्हें रोज़ देखते-देखते बच्चों में शायद यह मानने की आदत पड़ रही थी कि भाषा का इस्तेमाल बगैर किसी अर्थ के हो सकता है। इस दृष्टि से सोचें तो हम यह कह सकते हैं कि स्कूल में भाषा के पाठ्यक्रम में स्कूल की दीवारें बहुत ऋणात्मक भूमिका निभा रही थीं। भाषा के सरकारी पाठ्यक्रम की चेष्टा यह थी कि बच्चे सार्थक भाषा का प्रयोग सीखें। दीवारें यह दिखा रही थीं कि स्कूल स्वयं भाषा का कितना निरर्थक प्रयोग करता है।”
दीवार का ‘रचनात्मक इस्तेमाल’ कैसे करें?
कक्षा-कक्ष की दीवार के इस्तेमाल के सम्बन्ध में यह लेख हमें कक्षा की दीवारों के उपयोग के लिए आगाह करता है कि कक्षा की दीवारों पर हम सार्थक,ज्ञानवर्धक एवं रचनात्मक सामग्री ही लगाएं। वस्तुत: आजकल विद्यालयों में कक्षा कक्ष की दीवारों को कक्षा अनुरूप टी एल एम और बाला BaLA (Building as Learning Aid) पेंटिग्स से सजाया जाता है किन्तु अभी भी बहुत सारे कक्षा कक्ष पुराने ढर्रे पर ही चल रहे हैं। 
कुछ कक्षाओ में कक्षा के दौरान बच्चे जो चित्र बनाते हैं, या जो लेख, कहानी, पत्र या कविता लिखते हैं,उसे तुरन्त दीवार पर टाँग या चिपका दिया जाता है। कक्षा की चारों दीवारें इस तरह की सामग्री से भरी होती हैं। जब कोई बच्चा एक नई कृति  बनाता है,तब पुरानी कृति हटा कर अथवा पुरानी कृति के ऊपर चिपका दिया जाता है। यह चित्र बनाने वाले अथवा लिखने वाले बच्चे का मनोबल बढ़ाने वाली है लेकिन यह प्रक्रिया व्यक्ति विशेष पर आधारित है।
लेकिन कभी कभी चित्र और लेख को चिपकाने के कारण कक्षा के छात्रों के बीच विवाद एवं ईर्ष्या की भावना जगने की संभावना बन जाती है जो कि कक्षा के वातावरण को दूषित कर सकता है। इस समस्या का समाधान खोजने के लिए हम अपने विद्यालय अथवा कक्षा की दीवार पत्रिका का निर्माण भी कर सकते हैं। गत दो वर्षों हमारे विद्यालय  के छात्रो द्वारा दीवार पत्रिका “उड़ान” बनाई जा रही है।
बच्चों की भागीदारी से बना वार्षिक ‘टाइमलाइन कैलेंडर’
प्रत्येक कक्षा-कक्ष में एक कैलेंडर अवश्य होता है जो कि परोक्ष रूप से  टीएलएम(TLM) का कार्य करता है यह बच्चों को सप्ताह के दिनों के नाम,महीनों के नाम ,सप्ताह में दिन ,वर्ष में दिन एवं लीप ईयर के बारे में सिखाता है। नव वर्ष के अवसर पर हम नया कैलेंडर कक्षा में लाकर लगाते हैं जिस पर विभिन्न चित्र अंकित होते है। इसी कड़ी में हमने अपनी कक्षा का एक कैलेंडर बनाने का विचार बच्चों के साथ साझा किया। छात्र-छात्राओं को यह विचार बहुत ही पसंद आया तब हमने इस वर्ष का टाइमलाइन कैलेंडर बनाने का निर्णय लिया।
टाइमलाइन कैलेंडर के बारे में थोड़ी सी चर्चा कर लेते हैं। इस कैलेंडर का मुख्य पृष्ठ पर एक वृक्ष बना है  जैसा कि हम जानते है कि 1 वर्ष में 12 माह  होते हैं और  कैलेंडर में केवल 12 ही पेज हो सकते थे तो सभी छात्रों को की सहभागिता , सहयोग,एकजुटता,संयुक्त प्रयास एवं सार्वभौमिकता बनाने के लिए कैलेंडर के मुख्य पृष्ठ पर जो पेड़ बना है इसकी पत्तियों को छात्र-छात्राओं के उंगली एवं अंगूठे की छाप से बनाया है जिससे सभी छात्र-छात्राओं का प्रत्यक्ष रूप से योगदान कैलेंडर में जरूर रहे।
कैलेंडर में है बच्चों के रचनात्मक भागीदारी की झलक 
गत वर्ष छात्र-छात्राओं ने वर्षभर जो गतिविधियां (जैसे-कहानी,कविता एवं लेख लिखना ) की हैं,  उनको ही प्रत्येक माह के पृष्ठ के रूप में सजाया गया है। जनवरी का पृष्ठ हमने बुक ट्री के रूप में बनाया है क्योंकि बुक ट्री गतिविधि छात्राओं को बहुत पसंद आयी थी। इसके साथ ही ‘बुक ट्री’ की गतिविधि के दौरान बच्चों ने बहुत सारी पुस्तकें भी पढ़ी।

‘बुक ट्री’ मेरे विद्यालय के बच्चों की सबसे पदंदीदा गतिविधि है। किताबों से दोस्ती को प्रोत्साहित करने वाली इस थीम से नव वर्ष (2025) के कैलेंडर की शुरुआत की गई।

वहीं फरवरी माह का चित्र मशरूम और तितली एक लघु कथा जो कक्षा की छात्रा द्वारा लिखी गई है। मार्च का मार्च में होली आई गीत का प्रयोग किया गया है यह गीत भी कक्षा 3 की छात्रा द्वारा ही लिखा गया है। इसी प्रकार जून के पृष्ठ पर “मैटी,बैठ जाओ ! बैठ जाओ मैटी” पुस्तक  के मैटी  के नाम पत्र लिखा गया पत्र है जो की चकमक पत्रिका के एक अंक में छप चुका है। 
टाइम लाइन पेज:- कैलेंडर के अंत में कुछ पेज खाली लगे हुए हैं जिन प्रश्नों पर छात्र-छात्राओं द्वारा वर्ष पर की जाने वाली गतिविधियों को अंकित किया जाएगा। जैसा कि हम जानते है कि हमारी कक्षाओ में  बहुत ही रोचक अनुभव  होते  रहते हैं और इसके साथ ही हम बहुत सारे उत्सव और विभिन्न शैक्षणिक कार्यक्रमों का आयोजन भी कक्षा एवं विद्यालय स्तर पर करते रहते हैं इन्हीं गतिविधियों को लिपिबद्ध करते हुए टाइम लाइन पेज पर अंकित किया जायेगा।
कैलेंडर में शामिल हैं कविताएं और कहानियां
जैसा कि हम देख पा रहे है कि कैलेंडर के माहवार पृष्ठों को छात्रों द्वारा चित्र कहानी एवं कविता के माध्यम से सजाया है।  यह सभी गतिविधि उनके द्वारा की गयी है। टाइम लाइन  कैलेंडर का प्रत्येक पृष्ठ उन्हें  वर्ष भर नया करने की  प्रेरणा देगा। इसके साथ ही  उन्हें सृजनशीलता के असीम अवसर प्रदान करने के लिए प्रेरित करता  रहेगा।
इस वर्ष 2025 में की जाने वाली गतिविधियां वर्ष के अंत में लिपिबद्ध होगी जोकि उनकी अगले वर्ष सीखने-सिखाने की यात्रा में  उत्प्रेरक का कार्य करेगी। बच्चे मौलिक अभिव्यक्ति के अपने गुण को एवं गतिविधियों में अपनी शत-प्रतिशत सहभागिता को अगली कक्षाओ में भी इसी प्रकार गतिमान रखेंगे।
(लेखक परिचय: बच्चों की रचनात्मक क्षमता को प्रोत्साहित करने वाले अनुभवों को एजुकेशन मिरर के लिए लिखा है अरविन्द कुमार सिंह ने। आप वर्तमान में प्राथमिक विद्यालय बंगला पूठरी, बुलंदशहर में काम कर रहे हैं। आपके विद्यालय से बच्चों के विभिन्न अनुभवों का प्रकाशन विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हो चुका है। शिक्षा को जीवन के अनुभवों से जोड़ने और बच्चों की रचनात्मकता को प्रोत्साहित करने के प्रयास आप निरंतर करते रहते हैं।)
(एजुकेशन मिरर से फ़ेसबुकएक्स और यूट्यूब के जरिए भी जुड़ सकते हैं। बच्चों की लिखी सामग्री और उनके बनाये चित्र, अपने मौलिक लेख, पसंदीदा विषय पर कक्षा-शिक्षण के अनुभव और विचार साझा कर सकते हैं educationmirrors@gmail.com पर।)
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