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सारे स्कूल बंद हो गए हैं !!!!

एक सुबह नींद खुले और पता चले कि सारे स्कूल बंद हो गए हैं। बच्चों को अब स्कूल नहीं जाना पड़ेगा। वे घर पर रहेंगे। दिन भर जो मर्जी करे करेंगे। खेलना-कूदना, सैर-सपाटा, धमा-चौकड़ी। घर वाले भी उन पर होम वर्क करने के लिए, स्कूल की शिकायतों के ऊपर, वहां से मिलने वाले रिपोर्ट कार्ड से तुलना करके उनको डपटेंगे नहीं कि तुम क्ला, में सबसे फिसड्डी क्यों हो ? नंबरों की होड़ के काऱण उनको होने वाले तनाव से मुक्ति मेलेगी। छः घंटे की कैद से आजादी मिलेगी। वे जिंदगी को जीते हुए सीखना शुरु करेंगे। पूरा समाज उनके लिए पाठशाला होगी। वे लर्निंग बाय डूंइंग को फिर से जीने की तरफ आगे बढ़ेंगे। जीवन की पाठशाला में आनंद ही आनंद होगा। समाज उनके बारे में नए सिरे से सोचना शुरु करेगा कि बच्चों को दिनभर कैसे संभाला जाय, उनको कौन सा काम दिया जाय,
बच्चे क्या-क्या करेंगे ? दिन भर फिल्में देखेंगे। दिन भर तालाब-नदी के किनारे, पहाड़ों पर, खेत पर, दुकानों पर, बाजार में, सड़कों पर घूमते फिरेंग या फिर घर पर बैठेंगे। या फिर पड़ोसी के अमरूद के पेड़ों पर धावा बोल देंगे। तरबूजे-ककड़ियों की चोरियां करते फिरेंगे। एक घर से दूसरे घर पर शिकायतों का अंबार लग जाएगा। लोग घर के आगे शिकायत पेटिका लगा देंगे। उसके साथ एक डू नॉट डिस्टर्ब को बोर्ड भी कि बच्चों के बारे में शिकायत करके कृपया हमारा वक्त न जाया करें। अपनी शिकायत फुर्सत के समय लेकर आएं। बच्चों के बारे में लोगों की एक आम धारणा बन जाएगी कि वे शरारती होते हैं। बदमाश होते हैं। घर-घुस्सू होते हैं। घुमक्कड़ होते हैं। आवारगी करते हैं। इसी तरह की तमाम लेबलिंग उनके ऊप लग जाएगी। जिसका दोहरान करके उसको सामाजिक मान्यता का रूप दे दिया जाएगा। लोग स्कूली दिनों को याद करेंगे। कहेंगे भला था कि सारा दिन स्कूल में फंसे रहते थे। अब तो सारा दिन सर पर बैठे रहते हैं।
अध्यापकों का क्या होगा, वे घर पर पढ़ने की टूयुशन दे सकते हैं, स्कूल की खाली पड़ी बिल्डिंगों का क्या होगा, लोग वहां जानवर बांध सकते हैं, बच्चों के खेल का मैदान बना सकते हैं, सामाजिक अवसरों के लिए उसका इस्तेमाल हो सकता है। बच्चों की शरारतों से परेशान लोग हिंसा पर उतारू हो सकते हैं। बच्चे भी अपनी आजादी पर पाबंदी लगाने के खिलाफ हो सकते है। वे सवाल पूछ सकते हैं कि आपने स्कूल में जाकर कौन सा तीर मारा जो हमको स्कूल भेजना चाहते हो, हमें नहीं पढ़ना है, घर पर हम काम भर का पढ़ना-लिखना खुद से सीख सकते हैं। उसके लिए इतनी हाय-तौबा मचाने की क्या जरूरत है ? आप अपने सपने और अपेक्षाएं हमारे ऊपर मत लादिए। हमें जो करना होगा, कर लेंगे। अपने जीवन का रास्ता खुद खोज लेंगे। 
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बहुत-बहुत शुक्रिया अमृता जी। मन की कल्पनाओं को जैसे पंख मिल गए हों…यह सोचकर कि सारे स्कूल बंद हो गए हैं। स्कूलों के बारे में सोचते-सोचते लगता है कि तारीफ तो बहुत हो गई। कुछ अलग हटकर भी सोचना चाहिए। इसी तलाश में यह पोस्ट लिखी गी।

Amrita Tanmay

काश ऐसा भी होता ..

बहुत-बहुत शुक्रिया अमृता जी। मन की कल्पनाओं को जैसे पंख मिल गए हों…यह सोचकर कि सारे स्कूल बंद हो गए हैं। स्कूलों के बारे में सोचते-सोचते लगता है कि तारीफ तो बहुत हो गई। कुछ अलग हटकर भी सोचना चाहिए। इसी तलाश में यह पोस्ट लिखी गी।

Amrita Tanmay

काश ऐसा भी होता ..

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