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स्कूल के “रोचक समापन” से बदलेगा माहौल..

सातवां-आठवां घंटा आते ही स्कूल का माहौल बदल जाता है। अध्यापक भी दिन भर पढ़ाते-पढ़ाते थक से जाते हैं। बच्चे भी कोर्स की पढ़ाई से उकता से जाते हैं। उनको भी मनोरंजन के नए श्रोतों की तलाश होती है। जिसकी तलाश में वे एक कक्षा से दूसरी कक्षा में भटकना शुरू करते हैं। इसी के साथ शुरु होता है, आपसी झगड़ों, शक्ति प्रदर्शन और मारपीट का सिलसिला। जिसमें कुछ बच्चे सक्रियता से भाग लेते हैं, तो बाकी की भूमिक निरपेक्ष या जिज्ञासु दर्शक की होती है।
स्कूल में खेल की तैयारी के दौरान अध्यापक और बच्चे
जो या तो मारपीट को मौन सहमति से देखते हैं। या फिर अध्यापकों को दौड़ कर सूचित करते हैं कि देखिए फलां कक्षा में फलां बच्चे आपस में झगड़ा कर रहे हैं। अमुक रो रहा है। अमुक नें अमुक को धक्का दे दिया है। अमुक ने अमुक को गाली दी है। अमुक बच्चों की भागादौड़ी में चोटिल हो गया है। 
इस तरह की बातें कुछ स्कूलों में आम हैं। बच्चों का शोर सातवें-आठवें घंटे में अपने चरम पर होता है। वे अपनी बाकी बची ऊर्जो को स्कूल के वातावरण में प्रवाहित कर रहे होते हैं। यह  स्थिति स्कूल में तब उत्पन्न होती है। जब कक्षाएं खाली होती हैं। अध्यापक किसी काम में व्यस्त होते हैं।
ऐसी स्थिति के निर्मित होने के और भी कई कारण हो सकते हैं जैसे अमूमन अध्यापकों के पास आखिरी दो घंटों के लिए कोई रचनात्मक कार्यक्रम नहीं होता। अगर कक्षा में वे हैं भी तो रटवाने और दोहरान का कोई काम दे करके वे भी शांति से थोड़ी देर बैठना चाहते हैं ताकि दिनभर की थकान से निजात पा सकें। कला और खेल की गतिविधि को करवाने के लिए तैयारी और खेल के मैदान की जरूरत होती है। जिसके अभाव में इस योजना को अमल में लाना कठिन हो जाता है। लेकिन कक्षा में खेले जा सकने वाले खेलों की लिस्ट बनाना, उसे अमल में लाने की रूपरेखा बनाना और लागू करना कुछ काम का हो सकता है। 
इस जिम्मेदारी को उठाने वाले अध्यापक की कक्षावार जरूरत होगी ताकि सभी कक्षाओं में इस तरह के कार्यक्रम को बढ़ावा दिया जा सके, इस काम को आसान बनाने के लिए कुछ कक्षाओं को शामिल करने का व्यावहारिक विकल्प अपनाया जा सकता है। अगर बच्चों की संख्या कम है तो इस विकल्प को अपनाना फायदेमंद भी हो सकता है। इस दौरान कहानी सुनाने, बालगीत करवाने, गीत सुनाने, प्रार्थना सभा को रोचक बनाने, संप्रेषण की क्षमताओं (सुनना, बोलना,पढ़ना इत्यादि) पर काम किया जा सकता है।
अंत में हम कह सकते हैं कि  खेल, चित्रकला व पुस्तकों के अध्ययन को प्रोत्साहन देना एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है। इस तरह से हम बच्चों को आपसी मारपीट व झगड़ों में उलझने से रोक सकते हैं। इसके साथ-साथ शाम के दौरान होने वाली बोझिलता से भी निजात दिला सकते हैं। इसके साथ-साथ उनको घर जाने के पहले सकारात्मक और रचनात्मक ऊर्जा से भी भर सकते हैं। ताकि अगले दिन वे उत्साह से स्कूल आने के लिए तैयार हो सकें।  
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वृजेश सिंह
13 years ago

बहुत-बहुत शुक्रिया मदनमोहन जी। रचना को पसंद करने के लिए और टिप्पणी करने के लिए।

Madan Mohan Saxena
13 years ago

बहुत अद्भुत अहसास…सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको .

वृजेश सिंह
13 years ago

बहुत-बहुत शुक्रिया मदनमोहन जी। रचना को पसंद करने के लिए और टिप्पणी करने के लिए।

Madan Mohan Saxena
13 years ago

बहुत अद्भुत अहसास…सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको .

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