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अर्ली लिट्रेसीः याद आते हैं ‘रीडिंग कैंपेन’ वाले दिन

कहानी की किताब पढ़ते स्कूली बच्चे। इनके चेहरे की ख़ुशी पढ़ने के आनंद को बयां करती है।

राजस्थान में चले री़डिंग कैंपेन से बहुत से बच्चों ने पढ़ना सीखा। इस दौरान शिक्षकों को बच्चों को पढ़ना सिखाने पर विशेष रूप से ध्यान देने का मौका मिला। उस समय उनका एक ही उद्देश्य था कि हर बच्चे को पढ़ना आना चाहिए। चाहें वह पहली में पढ़ता हो या छठीं में।

राजस्थान के प्राथमिक स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों को सामूहिक रूप से सारे बच्चों के साथ काम करने वाले अनुभव का जिक्र होने पर ‘रीडिंग कैंपेन’ वाले दिन याद आते हैं।

अपने अनुभवों को याद करते हुए शिक्षक कहते हैं, “उस दौरान हमारी कोशिश थी कि सारे बच्चों को पढ़ना आ जाए। इसके लिए हम पढ़ने से संबंधित बहुत सी गतिविधियां करवा रहे थे।”

वे बताते हैं, “उस समय यह बात ज़्यादा मायने नहीं रखती थी कि कौन सा बच्चा किस क्लास में पढ़ रहा है? सबसे ज्यादा महत्व इस बात का था कि उसे पढ़ना आता है या नहीं। अगर उसे पढ़ना आता है तो उसके पठन कौशल को और उच्च स्तर पर ले जाने की कोशिश होती थी। और जो पढ़ना नहीं जानते थे उनको पढ़ना सिखाने पर हमारा पूरा ध्यान केंद्रित होता था।”

‘रीडिंग कैंपन की जगह’

फिलहाल रीडिंग कैंपेन अभियान बंद हो गया है। इसकी संदर्शिकाएं धूल फांक रही है। सारे बच्चों को पढ़ना सिखाने वाली जिद बीते दिनों की बात हो गई है। हाँ, कुछ शिक्षक जरूर स्कूल के स्तर पर सारे बच्चों को पढ़ना सिखाने के मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं। मगर ज़्यादातर शिक्षक तो सीसीई की लिखित योजना (written planning) बनाने के ऊपर अपना सारा ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। उनके योजना की कॉपियां और रजिस्टर देखकर बीएड और एसटीसी करने वाले दिनों की याद आ जाती है।

हालांकि शिक्षक बड़ी सादगी के साथ कहते हैं कि जिस गुणवत्ता की योजना (quality planning) हम बना रहे हैं, उसे लागू करना लगभग असंभव है क्योंकि हमारे पास उतना समय नहीं होता। बाकी विषय भी तो पढ़ाने हैं, बाकी कक्षाओं के ऊपर भी तो ध्यान देना है।

शिक्षकों की क्षमता पर संदेह

इस पूरे परिदृश्य में एक बात समझने वाली है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों की क्षमता को सदैव संदेह की दृष्टि से देखा है। वह यह मानकर चलती रही है कि उसे शिक्षक न तो पाठ्यचर्या बनानेे में अपना योगदान दे सकता है और न पाठ्यक्रम को अंतिम रूप देने में अपना योगदान दे सकते हैं। ऐसी मान्यता सी हो गई है कि शिक्षक बस इसे बेहतर ढंग से लागू करने करने की अपनी भूमिका निभा लें, यही बहुत है। सोचने और करने की खाई यहां साफ़-साफ़ नज़र आती है, मगर इसे पाटने का कोई प्रयास होता नज़र नहीं आता।

वक़्त के साथ एक बात और कही गई कि बच्चा तो अपने ज्ञान का निर्माता है, शिक्षक तो बस सुगमकर्ता है। जैसे ट्रैफिक पर आने-जाने वाली गाड़ियों को केवल रोकने-रास्ता देने और हरी-लाल-पीली बत्ती दिखाने की जरूरत होती है,शिक्षक की भूमिका कमोबेश ऐसे ट्रैफ़िक पुलिस जैसी हो गई है। इससे शिक्षकों को कहीं न कहीं लगा कि अब तो उन्हें बच्चों को पढ़ाने की जरूरत नहीं है। बच्चे तो ख़ुद से सीख जाते हैं।

लैंग्वेज अप्रोच की लड़ाई

बाकी की रही सही कसर भाषा सिखाने के दो तरीकों (two approaches) के बीच होने वाली जंग ने पूरी कर दी। हिंदी भाषा की किताबें होल लैंग्वेज अप्रोच को ध्यान में रखकर लिखी गयीं हैं। शिक्षकों ने लंबे समय तक फ़ोनिक्स वाले अप्रोच से काम किया है, जहाँ भाषा सीखने की प्रक्रिया वर्ण ज्ञान से शुरू होती है। बारहखड़ी तक जाती है। वर्ण और आवाज़ का रिश्ता धीरे-धीरे पुख़्ता कर दिया जाता था, बच्चों को ठोंक-पीटकर, डरा-धमकाकर पढ़ना सिखा दिया जाता था।

किताब पढ़ते बच्चे

किताब के ऊपर चर्चा करते स्कूली बच्चे।

ज़मीनी स्तर पर एक उलझन वाली स्थिति है क्योंकि शिक्षकों के लिए होल लैंग्वेज अप्रोच को समझना और उस तरीके से पढ़ाना मुश्किल काम है। क्योंकि यह काम वे पहली बार कर रहे हैं। इसे थ्योरी के रूप में बड़े अच्छे से समझाया जा सकता है। मगर बच्चों के साथ काम करने पर शिक्षकों को होने वाली परेशानी की तरफ़ किसी का ध्यान नहीं है।

यानी भाषा शिक्षण का काम एक संक्रमण काल से गुजर रहा है। एक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। आने वाला समय बताएगा कि इसके क्या परिणाम आएंगे। ऐसे माहौल में शिक्षक जब कहते हैं कि हम आठवीं के बच्चों को भी पढ़ना सिखा रहे हैं तो पठन कौशल की स्थिति को समझा जा सकता है। पढ़ने की आदत का विकास तो ऐसे बच्चों के लिए बहुत दूर की कौड़ी है। एक दिवास्पवन है, जो गिजूभाई के दिवास्वपन की याद भी दिलाता है।

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