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पहली कक्षा में तो हर बच्चा ‘टॉपर’ है

बहुत से शिक्षक पहली कक्षा में जाने से घबराते हैं। शायद उनको लगता है कि पहली कक्षा के बच्चों को पढ़ाना बहुत मुश्किल काम है। पहली कक्षा में चुपचाप इस पोस्ट में पढ़िए एक ऐसे शिक्षक की कहानी जो स्कूल में बदलाव की वास्तविक कहानी लिख रही हैं। उनके स्कूल में हर सवाल के जवाब में एक बच्चे का हाथ हमेशा सबसे पहले ऊपर उठता था। इस बच्चे को क्लास का टॉपर माना जाता था। जब उन्होंने बाकी बच्चों को तेज़ी से सवालों का जवाब देते और भागीदारी करते देखा तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा।

भाषा शिक्षण, बच्चे का सीखना. एजुकेशन मिरर, बच्चे सीखते कैसे हैं,हर क्लास में एक टॉपर होता है। पहली कक्षा की कहानी भी कुछ महीनों पहले कुछ ऐसी ही थी। उस कक्षा में पूछे जाने वाले सारे सवालों के जवाब में सबसे पहला हाथ उत्तम का उठता था। कुछ समय बाद साफ़ आवाज़ और सटीक उत्तर से लोगों का ध्यान भावना की प्रतिभा की तरफ़ गया

दीपावली की लंबी छुट्टियों के बाद स्कूल फिर से खुला। सारे बच्चों ने फिर से नियमित स्कूल आना शुरु किया। करीब एक महीने बाद मैं बच्चों के सामने था। सारी कक्षाओं से होते हुए पहली कक्षा में पहुंचा। बच्चों के साथ बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ।

पुनरावृत्ति है जरूरी

हमारी बातचीत का विषय था, “अबतक पढ़े गये वर्णों और मात्राओं का पुनरावृत्ति का।” मैम ने बताया कि बच्चों की क्लास लिए काफ़ी दिन हो गये हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वर्ण तो बच्चे सीख रहे हैं। मगर मात्राएं सीखने में उनको दिक्कत हो रही है। तो मैंने कहा कि मैम मात्राओं पर काम करना सबसे आसान है। इसके बाद पुनरावृत्ति का खेल शुरू हुआ। एक साथ सारे बच्चे वर्णों की पहचान कर रहे थे। इसके बाद एक-एक बच्चे को ब्लैकबोर्ड पर बुलाने और सामने लिखे हुए वर्णों को पढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ। सारे बच्चे शानदार कोशिश कर रहे थे। इस कक्षा के टॉपर्स ने पहले की तरह अपने प्रदर्शन से लोगों का मन मोह लिया।

सीखने की नई थ्योरी गढ़ते बच्चे

सीखने की तमाम थ्योरी को दरकिनार करते हुए इस बार सबसे ज्यादा चौंकाया बाकी बच्चो की भागीदारी ने। उन्होंने वर्णों को फटाफट पहचानना शुरू किया। जिन वर्णों को पहचानने में उनको परेशानी होती थी, उसे उन्होंने तेज़ी से दुरुस्त किया। बच्चे ‘ओ’ वर्ण की भी पहचान कर पा रहे थे। बाकी वर्णों को भी साफ़-साफ़ पढ़ पा रहे थे। हालांकि कुछ बच्चे अभी भी ऐसे थे, जिनको वर्णों को पहचानने में तुक्के और अनुमान का सहारा लेना पड़ रहा था। मगर बाकी बच्चों के लिए स्थिति बहुत सहज थी। करीब सात-आठ बच्चों का हुजूम जब वर्णों को पढ़ने के लिए आपस में धक्का-मुक्की कर रहा था। बच्चों के पढ़ने की जिज्ञासा और ललक में उम्मीद का उजास साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था कि कुछ समय बाद वे किताब पढ़ने की दिशा में आगे बढ़ने वाले हैं।

धीरे-धीरे सारे बच्चों ने ब्लैकबोर्ड पर आकर वर्णों को पढ़ा। इसके बाद मात्राओं के पहचान वाली गतिविधि शुरू हुई। आज ‘आ’ की मात्रा पर काम हुआ। सबसे पहले इसके प्रतीक के बारे में बच्चों से पूछा गया। लगभग सारे बच्चे उसके प्रतीक को पहचान पा रहे थे। इसके बाद वर्ण में मात्रा लगाकर और मात्राओं को मिटाकर वर्णों की आवाज़ में होने वाले बदलाव को रेखांकि करने करने में बच्चों ने भागीदारी की।

थोड़े समय के बाद बच्चे वर्णों में होने वाले बदलाव को थोड़ा-थोड़ा पकड़ पा रहे थे। इसके बाद एक तरफ बग़ैर मात्रा वाला वर्ण और उसके सामने मात्रा के साथ वर्ण को लिखकर बच्चों को पढ़कर बताना हुआ। इस दौरान वर्ण के साथ कभी मात्रा आती, तो कभी अकेला वर्ण आता। बच्चे पहचाने हुए वर्णों को बोलते, मात्रा लगने पर वर्ण की आवाज़ में होने वाले बदलाव को जोड़ते।

मात्राएं सीखना तो बहुत आसान है

इस तरह से कुछ समय बाद बहुत से बच्चे वर्णों को ‘आ’ की मात्रा के साथ बहुत आत्मविश्वास के साथ पढ़ रहे थे। कुछ बच्चों ने तो पढ़ने का ऐसा डेमो दिया कि बड़े भी दंग हो जाएं कि बच्चे कितने आत्मविश्वास से पढ़ते हैं औऱ बाकी बच्चों को पढ़ना सीखने में मदद करते हैं। भाषा शिक्षक के लिए आज का दिन बेहद ख़ुशी वाला था। मेरे लिए भी। बच्चों के लिए भी। इस क्लास के टॉपर को संदेश मिल चुका था कि टॉपर की जगह के बहुत से दावेदार इस क्लास में हैं। अब सबको मौका देने और सबको सीखने की प्रक्रिया में भागीदारी का मौका मिलेगा। इसके साथ ही 20 बच्चों के समूह में से पांच-छह ऐसे बच्चों की भी पहचान की गई जिनको मात्राओं की पहचान के लिए सपोर्ट करने की जरूरत है।

आज का पूरा दिन पहली कक्षा के बच्चों के साथ बात करते हुए, वर्ण-मात्राओं पर बात करते हुए, शिक्षक को डेमो देते हुए, बच्चों को धमाचौकड़ी करने का मौका देते हुए बीता। पहली कक्षा के पास में बैठे चौथी कक्षा के बच्चे बार-बार छुट्टी के लिए आ रहे थे, आठवें कालांश में जब उनको आपस में कहानी पढ़कर सुनाने वाली गतिविधि के लिए बात कर रहा था तो पहली कक्षा की पूरी टीम दरवाज़े पर खड़े होकर खूब धमाचौकड़ी कर रही थी। चौथी कक्षा के साथ बैठे कुछ छोटे बच्चे भी उनके बीच से भागकर धमाचौकड़ी करते बच्चों के बीच शामिल हो रहे थे। चौथी कक्षा के बच्चे इस बात को देख रहे थे। उनको भी अच्छा लग रहा था कि छोटे बच्चों को उछलने-कूदने और शरारत करने में बहुत मजा आता है।

पढ़ाई के साथ-साथ दिनभर की मस्ती के बाद घर जाते समय कुछ बच्चे पूछ रहे थे कि आप कल फिर आएंगे, उनका यह सवाल सुनकर लगता है कि स्कूल में आना सार्थक रहा। आज का दिन यादगार रहा।

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