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‘मैं पहली कक्षा में पढ़ता हूँ, मुझे स्कूल आना अच्छा लगता है’

आंगनबाड़ी केंद्र में खेलते बच्चे। भारत में लंबे समय से यह मांग की जा रही है कि सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के प्री-स्कूलिंग के लिए भी क़दम उठाना चाहिए ताकि इन बच्चों को भविष्य की पढ़ाई के लिए पहले से तैयार किया जा सके। उनको पढ़ने और किताबों के आनंद से रूपरू करवाया जा सके।

आंगनबाड़ी केंद्र में खेलने का लुफ्त उठाते बच्चे।

मैं पहली कक्षा में पढ़ता हूँ। मेरे स्कूल में एक नये सर आते हैं उनसे छुट्टी मांगने में बड़ा मजा आता है। बड़ी जल्दी छुट्टी दे देते हैं। कभी-कभी मना भी करते हैं ,जब सारे बच्चे क्लास में खड़े होकर एक साथ छुट्टी मांगते हैं। उनकी क्लास में पढ़ाई करने का खूब आनंद आता है।

हर किसी को बोलने के लिए कहा जाता है। मेरी भी बारी आती है। वे बार-बार पूछते हैं, “आप कैसे हैं, अच्छे हैं, कितने अच्छे हैं?” हम सब दोनों हाथों के इशारे से बताते हैं इतने अच्छे हैं।” पढ़ाई के बाद मैं खाने की घंटी बजने से पहले ही अपनी प्लेट लेकर तैयार हो जाता हूँ। खाने की घंटी बजते ही दौड़ पड़ता हूँ क्लास से बाहर। बाकी दोस्तों के साथ खाने की पंक्ति में बैठा इंतज़ार करता हूँ। रोटी के आने का। सब्जी के प्लेट में परोसे जाने का। इस दौरान बीच-बीच में बाकी दोस्तों के साथ बातें भी करता हूँ।

अपनी जगह बनानी होती है

खाने से पहले प्रार्थना जैसा कुछ बोलना होता है। इसके बाद तो झट से खाना खाना शुरू करता हूँ। सारे दोस्त जल्दी-जल्दी खाना खत्म करके हैंडपंप की तरफ दौड़ते हैं। मुझे भी जाने की जल्दी होती है। क्योंकि वहां बड़ी भीड़ होती है। मुझे भी बड़ी कक्षा वाले बच्चों के बीच में चुपके से अपनी जगह बनानी होती है। प्लेट धोने के लिए और पानी पीने के लिए। इसके बाद घर की तरफ घूम आते हैं। मन होता है तो दोस्तों के साथ कोई खेल खेल लेता हूँ।

इस खाने को स्कूल में एमडीएम कहा जाता है। एमडीएम अच्छा लगता है। मगर मेरी एक शिकायत है कि रोटी बस एक ही मिलती है। मेरी माँ एक दिन स्कूल में आई थी और शिक्षक से कह रही थीं, “मैडम मेरे बच्चे बड़ी दूर से आते हैं। केवल एक रोटी से इनका पेट नहीं भरता। दिन लंबा होता है। पूरे दिन भूखे बच्चे के लिए स्कूल में रहना मुश्किल होता है। ऐसे में बच्चे को कैसे स्कूल भेजें।” मेरे साथ के कुछ बच्चे खाना नहीं खाते। वे टिफिन लेकर आते हैं। मगर मुझे क्या। वे खाना खाएं या न खाएं उनकी मर्जी मुझे क्या? गुरूजी ऐसे बच्चों को भी खाना खाने के लिए कहते हैं। मगर वे नहीं जाते। अगर नहीं जाते तो उनकी मर्जी। किसी को इसके लिए डांटना नहीं चाहिए।

मेरे शिक्षक मेरी तारीफ करते हैं

मेरे शिक्षक मुझे हिंदी पढ़ाते समय बार-बार खड़ा करते हैं। बोर्ड पर पढ़ने के लिए बुलाते हैं। कॉपी में काम देते हैं। एक दिन उन्होंने मुझे जोर से डांटा था। उनको इस बात के लिए बुरा लगा। एक दिन वे कह रहे थे, “मैंने इस बच्ची को डांटा था। लेकिन मुझे बाद में दुख हुआ कि इसे नहीं डांटना चाहिए था। छोटे बच्चे हैं। मनमानी करते हैं। थोड़ी शैतानी करते हैं। तो हमें इसे इग्नोर करना चाहिए।” मेरे शिक्षक मेरे बारे में ऐसा सोचते हैं जानकर अच्छा लगा। मुझे उनकी परवाह अच्छी लगती है। वे सभी बच्चों को बड़े प्यार से पढ़ाते हैं। वे चाहते हैं कि सारे बच्चों को पढ़ना-लिखना आ जाए। वे बाकी लोगों से मेरी तारीफ भी करते हैं और मेरी कॉपी भी दिखाते हैं।

मुझे मेरा सरकारी स्कूल अच्छा लगता है। यहां कॉपी भी मिलती है। किताब भी मिलती है। पेंसिल भी मिलती है। और घर जैसा अपनापन भी। आज मेरे स्कूल में परीक्षा हो रही थी। कुछ बच्चे सवालों का जवाब देने में डर रहे थे। मुझे भी डर लग रहा था। लेकिन मेरे शिक्षक ने कहा कि डरने की कोई बात नहीं। पढ़ने से डरना नहीं चाहिए। मेरी क्लास का एक लड़का कह रहा था कि उसे फिर से पढ़ना है। उसे पढ़ना अच्छा लगता है। मुझे भी पढ़ना अच्छा लगता है। पढ़ने के लिए ढेर सारी कवायद करनी पड़ती। मात्रा और अक्षर जाने क्या-क्या याद रखना पड़ता है। मात्राओं का कोई भरोसा नहीं कि कहां पर लगकर कौन सी आवाज़ देंगे। मुझे अनुमान लगाना आ गया है। मेरे अनुमान अच्छे हैं। सही होते हैं।

यह पहली कक्षा के बच्चों की कहानी है। इनके नाम कुछ भी हो सकते हैं।

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