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भाषा शिक्षण: फोनिक्स, होल लैंग्वेज और बैलेंस अप्रोच

भाषा शिक्षण, लायब्रेरी, पुस्तकालय का उपयोग, अर्ली लिट्रेसी, भारत में प्रारंभिक शिक्षा

एक सरकारी स्कूल में किताब के पन्ने पलटते और चर्चा करते बच्चे।

मूल रूप से भाषा शिक्षण के तीन अप्रोच हैं। होल लैंग्वेज अप्रोच, फोनिक्स अप्रोच और बैलेंस अप्रोच या कांप्रिहेंसिव अप्रोच। अमरीका में दोनों पहली अप्रोच के मुख्य बातों को मिलाकर बैलेंस अप्रोच के साथ काम किया जा रहा है। भारत में लंबे विचार-विमर्श के बाद होल लैंग्वेज अप्रोच को अपनाने की बात हो रही है, वहीं बहुत से शिक्षक साथी पारंपरिक रूप से फोनिक्स अप्रोच के सहारे बच्चों को पढ़ना सिखाने वाले अपने तरीके से काम कर रहे हैं। मगर सबसे अहम सवाल तो ये है कि पढ़ना क्यों चाहिए?

भाषा सिखाने का तरीका

एक शिक्षक प्रशिक्षक कहते हैं, “पॉलिटिकल इकॉनमी की समझ रखने वाला कोई भी शिक्षा शास्त्री होल लैंग्वेज अप्रोच की वकालत करता है। क्योंकि यह समझ निर्माण के साथ-साथ भाषा के विभिन्न उपयोगों को लेकर सजग बनाने पर जोर देती है। जबकि फोनिक्स अप्रोच में पढ़ना तो आसानी से सिखाया जा सकता है कि लेकिन इसमें भाषा के बाकी सारे पहलुओं पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। जैसे सवाल पूछना। चीज़ों को समझना। किसी बात के अन्य पहलुओं पर ग़ौर करना। अर्थव्यवस्था और भाषा के रिश्ते को समझना इत्यादि।” उन्होंने कहा कि होल लैंग्वेज को सिर्फ भाषा सिखाने का एक तरीका भर नहीं है। यह उससे कहीं ज्यादा है।

पढ़ना क्यों है?

फोनिक्स अप्रोच से पढ़ना सिखाना आसान है। मगर इसमें क्यों वाले पहलू पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है कि पढ़ना क्यों चाहिए? पढ़ना क्यों जरूरी है। महज साक्षर होने भर को पढ़ा-लिखा कहना कितना सही है। ऐसी पढ़ाई से वास्तव में फ़ायदा कम और नुकसान ही जाता है। शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले एक साथी कहते हैं, “कोई पढ़ना देर से सीखे कोई बात नहीं। मगर पढ़ना क्यों है? इस सवाल का जवाब उसके पास होना चाहिए। यहां से पढ़ना सीखने की दिशा में होने वाली प्रगति और उसके परिणाम बहुत अलग तरीके के होते होंगे।”

इसके साथ ही नई पीढ़ी के आत्मविश्वास को लेकर बात हो रही थी। इसका मुख्य पहलू था कि किसी के साथ बातचीत के दौरान जो आत्मविश्वास और सहजता होनी चाहिए। वह नई पीढ़ी में थोड़ी सी मिसिंग है। पता नहीं वे लोग खुद को कम करके क्यों आते हैं। आजकल की पढ़ाई में क्यों वाले पहलू पर बहुत ज्यादा ज़ोर नहीं हैं। बच्चों को सेल्फ आब्जर्बेशन या ‘ख़ुद का मॉनीटर’ होने की दिशा में आगे ले जाना ही शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए।”  भाषा शिक्षण के तरीके का राजनीतिक अर्थव्यवस्था और किस तरह के मनुष्यों का निर्माण करना है। इस तरह के बड़े उद्देश्यों से सीधा रिश्ता है।

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