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शिक्षा विमर्शः नवाचार के ‘बासी विचार’ से आगे बढ़ें

education-mirrorशिक्षा के क्षेत्र में ‘नवाचार’ शब्द का इतना ज्यादा इस्तेमाल हो गया कि यह शब्द भी बासी प्रतीत होने लगा है। ऐसे शब्दों के झांसे में उलझने की बजाय शिक्षा क्षेत्र की जरूरी अवधारणाओं को समझते हुए चीज़ों को व्यवहार में लाने की कोशिश ज्यादा बेहतर होगी।

जैसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अवधारणा है। इसके बारे में कहा जा रहा है कि हर बच्चे के सीखने का अपना तरीका होता है। इसलिए बच्चों को अपने तरीके से सीखने में मदद करना ज्यादा बेहतर होगा ताकि बच्चा ख़ुद के प्रयासों से चीज़ों को समझ सके।

हर बच्चा अपने तरीके से सीखता है

इस विचार के पहले यह मान्यता थी कि सारे बच्चों को एक ही तरह से सिखाया जा सकता है। इसलिए सबके लिए एक ही तरीका काम में लिया जाता था और यह तरीका शिक्षक द्वारा निर्धारित किया जाता था। इन नये विचारों ने एक शिक्षक का काम आसान किया है। मगर साथ ही साथ उसके सामने पूरी क्लास को एक ऐसा माहौल देने की चुनौती भी रखी है जिसमें ज्यादा से ज्यादा बच्चों को भागीदारी करने का मौका मिले।

किसी क्लास में काम करने के एक से अधिक तरीके दिखाई देते। पहला तरीका क्लास के कुछ बच्चों पर ध्यान देने वाला है, दूसरा तरीका पूरी क्लास पर फोकस करने वाला है, तीसरा तरीका क्लास के हर बच्चे के साथ व्यक्तिगत रूप से सपोर्ट करने का है, चौथा तरीका क्लास के बच्चों को समूह में विभाजित करके उनको पढ़ाने का है। इस तरीके से क्लासरूम में बच्चों को सपोर्ट करने के पाँचवे और दसवें तरीके भी हो सकते हैं।

बच्चों की भागीदारी का सवाल

उदाहरण के तौर पर कोई शिक्षक पूरी क्लास को पढ़ाने के मकसद से काम कर रहे हैं। मगर पूरी क्लास के बच्चे उनके ऊपर ध्यान न दे रहे हैं। तो ऐसे में क्या-क्या स्थितियां बन सकती हैं। पहली स्थिति, हो सकता है कि 30 बच्चों की क्लास में से केवल 10-15 बच्चे ही शिक्षक की बातों पर ध्यान दे रहे हों। बाकी के 50 फ़ीसदी बच्चे अपने-अपने काम में लगे हों।

मसलन किताब में कोई चित्र देख रहे हों। कुछ बच्चे अपने बगल में बैठे बच्चों से बात कर रहे हों। दूसरे बच्चे को चिकोटी काट रहे हों। या अपनी कॉपी में कुछ उतार रहे हों। ऐसी स्थिति में पूरी क्लास के साथ काम करने वाली रणनीति चुनिंदा बच्चों के साथ काम करने वाली स्थिति में तब्दील हो जाती है।

समय का सही इस्तेमाल

क्लास में पढ़ाते समय एक शिक्षक का क्लासरूम में बच्चों की भागीदारी को लेकर सजग रहना बेहद जरूरी है। इससे शिक्षक ज्यादातर बच्चों का सीखना सुनिश्चित कर सकेंगे। इसके साथ-साथ बच्चों को समय देने की प्राथमिकता भी निर्धारित कर पाएंगे। जैसे अगर कोई बच्चा खुद से पढ़ने लगा है तो उसे कोई पाठ पढ़ने के लिए कहकर आप बाकी बच्चों को सपोर्ट कर सकते हैं जो पढ़ने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे बच्चों को समय दे सकते हैं जिनको लिखने में विशेष परेशानी हो रही है। इ

स तरह की कोशिश से आपको क्लास में समय की कमी कोई समस्या नहीं, बल्कि एक अवसर की तरह दिखाई देंगी जिसका इस्तेमाल आप बच्चों की जरूरतों के अनुसार कर सकते हैं।

क्या है सूक्ष्म नवाचार?

आजकल ‘सूक्ष्म नवाचार ‘ शब्द की खूब चर्चा है। लोग इसके बारे में जानना चाहते हैं कि आखिर सूक्ष्म नवाचार क्या है? इस सवाल का जवाब देते हुए एक शिक्षक प्रशिक्षक कहते हैं, “बड़े बदलाव के लिए छोटे छोटे अभिनव व निरंतर प्रयास ही सूक्ष्म नवाचार है । मसलन एक विद्यालय से बच्चों का जुड़ाव कम हो रहा था। इस स्कूल में शिक्षकों ने बच्चों का जन्मदिन बिना किसी उपहार के मनाना शुरू कर दिया। इससे स्कूल में बच्चों की उपस्थिति बढ़ी।”

उन्होंने कहा, “लोग बड़ी समस्याओं के चपेट में आकर इतने हतोत्साहित हो गए है कि नया कोई प्रयोग करना ही नही चाहते।” शायद उनका इशारा उस स्थिति की तरफ था जहाँ लोग मान लेते हैं कि हम कितनी भी कोशिश कर लें बदलाव संभव ही नहीं है। चीज़ें जैसी हैं, वैसी ही रहेंगी।

इसके बारे में यही कहा जा सकता है कि स्कूली स्थिति को बाहर से झांकने और समझने का प्रयास करने पर बड़ी-बड़ी समस्याएं ही नज़र आती हैं, छोटे-छोटे समाधान नहीं नज़र आते। इसके लिए जरूरी है कि इस क्षेत्र में काम कर रहे लोगों की तरफ से छोटी-छोटी कोशिशें होती रहें। ताकि कुछ नया करने का हौसला और उत्साह बना रहे।

आख़िर में दो बातें

यही कह सकते हैं कि हमें नवाचार, सूक्ष्म नवाचार और ऐसी तमाम शब्दावलियों में उलझने की बजाय चीज़ों को स्पष्ट तौर पर समझने की कोशिश करनी चाहिए कि हमारे स्कूल में कौन से विचार का इस्तेमाल किया जा सकता है। जिससे बच्चों के पठन-लेखन कौशल का विकास हो सके। उनकी रचनात्मकता को अभिव्यक्ति का अवसर मिल सके। एक ऐसा सकारात्मक माहौल बने जहाँ बच्चों को प्रोत्साहित किया जाता हो। उनको छोटी-मोटी गलत करने पर टोकने की बजाय धैर्य के साथ समझाया जाता हो कि इस काम को अगर ऐसे किया जाए तो शायद चीज़ें बेहतर हो सकती हैं।

ऐसी कोशिशें ही नवाचार और सूक्ष्म नवाचार हो सकती हैं आपके स्कूल के लिए। जैसे बच्चों की उपस्थिति बढ़ाने के लिए बच्चों का जन्मदिन मनाने वाला विचार था। बाकी सारे विचार नवाचार के लबादे में लिपटे ‘बासी विचार’ ही है।

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