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पहली क्लास में भी ‘बोर्ड परीक्षा’ होनी चाहिए!!

अगर आठवीं क्लास बोर्ड की परीक्षा होने के नाते महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे में पहली कक्षा में भी बोर्ड की परीक्षा करवाई जा सकती है। पहली कक्षा के बच्चों पर दबाव बनाने के लिए नहीं। शिक्षकों के नज़रिये में बदलाव के लिए। यह बताने के लिए कि पहली कक्षा को पढ़ाना और उनके सीखने पर ध्यान देना उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि आठवीं कक्षा में बोर्ड परीक्षा को ध्यान में रखते हुए तैयारी करवाना।

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अगर परीक्षा न हो तो क्या स्कूलों में पढ़ाई बंद हो जायेगी।

अगर केवल परीक्षाओं के नाते पढ़ाई का स्तर अच्छा हो जाता है। और शिक्षक अपने काम को लेकर गंभीर हो जाते हैं तो बेशक परीक्षाएं होनी चाहिए। आठवीं में ही नहीं, पहली में भी। वह भी आठवीं की तरह ‘बोर्ड परीक्षा’। अगर आठवीं में ‘बोर्ड परीक्षा’ हो तो कैसा रहेगा?

इस सवाल के जवाब में एक शिक्षिका कहती हैं, “सारे बच्चे पास हो जाएंगे। क्योंकि किसी बच्चे को तो फेल करना ही नहीं है।”

वहीं इसी सवाल के जवाब में एक शिक्षक कहते हैं, “अच्छा होता। इसी बहाने ही सही अधिकारी और शिक्षक पहली कक्षा में पढ़ाई को महत्व देने के बारे में सोचेंगे।”

अगर सरकारी स्कूलों में ‘बोर्ड परीक्षा’ होती तो उसका क्या असर होता? एक बात तो तय है कि शिक्षक पहली क्लास पर ‘विशेष ध्यान’ दे रहे होते। किसी भी कम उम्र के बच्चे का पहली क्लास में एडमीशन नहीं करते क्योंकि इससे रिजल्ट खराब होने का खतरा बढ़ जाता।

बोर्ड परीक्षा का असर

शिक्षक पहली क्लास का अधिगम स्तर (लर्निंग लेवल) बेहतर करने के लिए योजनाएं बनाते। संभव है कि उनको पूरी वर्णमाला रटाने की कोशिश होती। ढेर सारी कविताएं याद करा दी जातीं। क्लास में माहौल बिल्कुल टाइट होता। बच्चों को भी महसूस होता कि स्कूल में आने का मतलब है कि पढ़ने से बच नहीं सकते। बहुत से बच्चे तो स्कूल आने से बचने का बहाना भी खोजते। क्योंकि उनको घर जैसी मस्ती करने का मौका स्कूल में नहीं मिलता।

पढ़िएः जो बच्चे स्कूल आ रहे हैं, क्या वे सीख रहे हैं?

पहली क्लास के बच्चों का सामना परीक्षाओं के डर से होता। इसकी खबर अभिभावकों तक भी पहुंचती। स्कूल में होने वाली बैठकों में उनको संदेश दिया जाता कि सरकार चाहती है कि हर बच्चा पढ़ाई-लिखाई में अव्वल आये, इसलिए बोर्ड परीक्षा करवाई जा रही है। आप भी अपने बच्चे को रोज़ स्कूल भेजिये। घर पर बैठाकर पढ़ाइए और छोटे बच्चों का एडमीशन करने के लिए स्कूल के ऊपर दबाव मत बनाइए। जिन बच्चों की खेलने की उम्र है, उनको खेलने दीजिए। या फिर आंगनबाड़ी में भेजिए। स्कूल में भेजकर पहली कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों का समय खराब मत करिये।

आमतौर पर पहली और दूसरी कक्षाएं एक साथ बैठती हैं। इसका एक असर यह भी होता कि पहली कक्षा को अलग बैठाया जाता। दूसरी कक्षा का समय भी पहली कक्षा में चला जाता। तीसरी और चौथी शिक्षकों के आने की राह देखतीं, क्योंकि सबसे पहले तो पहली क्लास को तैयार करने की कोशिश होती। इसके साथ ही बाकी क्लास के बच्चों को समझाइस मिलना शुरू हो जाती कि देखो अब तो पहली क्लास से ही बोर्ड परीक्षा शुरू हो गई है। इसलिए कोई बचाव नहीं है। फेल करने का भय भी शिक्षकों की तरफ से जोड़ दिया जाता ताकि बच्चे वास्तव में पढ़ाई करे।

ऐसा लगता है मानो भय बिन होत न पढ़ाई……वाली बात शिक्षक, छात्र और अभिभावक सब समझते हैं।

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