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महिला शिक्षकों के सामने क्या हैं चुनौतियां?

education-mirrorभारतीय समाज परंपरागत रूप से एक पितृसत्तातमक समाज है। मगर शिक्षा के क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों के स्थापित वर्चस्व को चुनौती दे रही हैं, अगर यह बात कहें तो शायद अतिश्योक्ति नहीं होगी। शिक्षा के क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं, तो कई क्षेत्रों में उनको पीछे भी छोड़ रही हैं। महिला शिक्षकों की सशक्त मौजूदगी भारतीय समाज में बड़े बदलाव का संकेत है।

हालांकि इस बदलाव के साथ ही पुरुषों की मानसिकता और पितृसत्तातमक सोच में तेज़ी से बदलाव नहीं आया है, इस कारण से उन्हें विभिन्न तरह की चुनौतियों का सामना कार्यस्थल और परिवार में करना पड़ रहा है। मगर महिलाएं इस चुनौती का बखूबी मुकाबला कर रही हैं और साथ ही साथ आने वाले पीढ़ी के लिए रास्ते को ज्यादा सुगम और कंटक विहीन भी बना रही हैं। हमारे समाज में आज भी महिलाओं के लिए शिक्षण का पेशा सबसे सुरक्षित माना जाता है। मगर उनकी मौजूदगी शिक्षा, चिकित्सा, प्रबंधन, पत्रकारिता, साहित्य और सामाजिक विज्ञान के साथ-साथ विज्ञान के विभिन्न विधाओं में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।

शिक्षा के क्षेत्र में अपने सफ़र की शुरुआत के बारे में एक शिक्षिका कहती हैं, “जब मैंने पहली बार नौकरी ज्वाइन की तो आसपास के लोग पूछते थे कि आप काम करती हैं?” मगर धीरे-धीरे समाज में लोगों का नज़रिया बदला । अभी तो बड़ी संख्या में महिलाएं शिक्षण के पेशे को चुन रही हैं और सरकारी व निजी दोनों क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज़ करा रही हैं।

महिला शिक्षकों की चुनौती

परीक्षा देती छात्राएं

एक स्कूल में खाली समय में आपस में बात करती छात्राएं।

मगर महिला शिक्षकों का यह सफर बिल्कुल आसान कतई नहीं है। महिला शिक्षकों के सामने बहुत सी चुनौतियां होती हैं, जिनका सामना उनको रोज़मर्रा की ज़िंदगी में करना पड़ता है। मसलन लंबा सफर तय करके स्कूल पहुंचना। स्कूल जाने से पहले घर का सारा काम पूरा करना। बच्चों को तैयार करना और बाकी सदस्यों का ख्याल रखना।

इस वजह से भी उनको पर्याप्त रूप से पढ़ने और प्रोफ़ेशनल तरीके से आगे बढ़ने में काफी दिक्कत होती है। मिशाल के तौर पर एक स्कूल में इंग्लिश पढ़ाने वाली शिक्षका का कहना था, “मैं खुद भी अंग्रेजी सीखना चाहती हूँ ताकि बच्चों को अच्छे से पढ़ा सकूं। मगर घर पर बहुत सारे पारिवारिक काम होते हैं। किताब लेकर बैठना संभव हो ही नहीं पाता।”

परिवार का सपोर्ट है जरूरी

बहुत से परिवारों में पढ़ने की संस्कृति नहीं है। संयुक्त परिवार है। बड़े और बुजुर्ग लोगों की सोच पुराने समय वाली है, वहां पर तो शिक्षिकाओं को घर का काम भी करना पड़ता है और स्कूल भी जाना होता है। यानि उनको दोहरी जिम्मेदारी का निर्वाह  करना पड़ता है। अगर परिवार की तरफ से सपोर्ट मिल रहा है तो अच्छी बात है। इसके अभाव में तो उनकी व्यथा या तो वे जानती हैं,. या फिर उनकी साथी शिक्षिकाएं जो इसी तरह की समस्याओं से रोज़ाना दो-चार होती हैं।

भारत में प्राथमिक शिक्षा, महिला शिक्षकों की स्थिति, शिक्षा और सामाजिक बदलाव, लैंगिक समानता

भविष्य में महिला शिक्षकों की स्थिति बेहतर होगी क्योंकि बड़ी संख्या में लड़कियां बीएड और एसटीसी की पढ़ाई कर रही हैं।

बहुत से परिवार ऐसे भी हैं, जहाँ उनके काम को महत्व नहीं दिया जाता। इसका असर उनके स्कूल में काम करने के उत्साह पर पड़ता है। इस बारे में एक शिक्षिका कहती हैं, “हमें इस काम से ख़ुशी मिलती है। हम अपने बच्चों की जरूरतें पूरी करने में आत्मनिर्भरता है। किसी के सामने हाथ तो नहीं फैलाना है। पूरा दिन घर पर बैठने से बेहतर है स्कूल में बच्चों को पढ़ाना।”

स्कूल में कई बार पुरुष स्टाफ के साथ तालमेल बैठाने में दिक्कत आती है क्योंकि पुरुष शिक्षकों के अपने पूर्वाग्रह होते हैं जो काम के दौरान बार-बार दिखाई पड़ते हैं। इसका जिक्र एक बार महिला शिक्षकों के सम्मेलन में सुनने को  मिली। वहां महिला शिक्षकों के बीच में मैं इकलौता पुरुष था।उन्होंने बेबाकी के साथ विभिन्न मुद्दों पर आपस में संवाद किया और भविष्य में एक-दूसरे की मदद करने का भरोसा जताया।

स्कूल में बुनियादी सुविधाओं की मौजूदगी

किसी भी महिला शिक्षक के लिए एक स्कूल में काम करने के लिए सबसे बुनियादी चीज़ों में एक शौचालय की मौजदूगी भी है। यह ऐसी स्थिति में होना चाहिए ताकि उसका सम्मान के साथ इस्तेमाल किया जा सके। निजी स्कूलों में तो इस सुविधा की मौजूदगी अच्छी स्थिति में होती है, मगर बहुत से सरकारी स्कूलों में टॉयलेट की स्थिति काफी दयनीय होती है, इसके कारण भी महिला शिक्षकों को परेशानी होती है। जिन स्कूलों में पहली बार महिला स्टाफ की नियुक्ति हुई, वहां के शिक्षकों ने संवेदनशीलता दिखाते हुए ऐसी सुविधा को दुरुस्त करने की पहल की ताकि स्कूल में नए साथी को परेशानी न हो। इस तरह के अच्छे उदाहरण भी ज़मीनी स्तर पर देखने को मिलते हैं।

बालिका शिक्षा के प्रचार-प्रसार और प्रोत्साहन के कारण अभी कॉलेज में बहुत सारी लड़कियां बीएड और एसटीसी का कोर्स कर रही हैं। इनमें से कुछ पार्ट टाइम या फुल टाइम सरकारी और निजी स्कूलों में पढ़ाने का काम भी कर रही हैं। इससे आने वाले दिनों में महिला शिक्षकों के लिए भी एक सोशल सपोर्ट सिस्टम विकसित होगा, जो उनको मुश्किल दौर में मदद करने के लिए आगे आएगा। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी काम करने वाली महिला शिक्षकों के हौसले को सलाम करने का मन होता है। इस मुद्दे पर आगे भी चर्चा जारी रहेगी।

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