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वे शिक्षक कहाँ हैं, जिन्हें बुनियाद की फिक्र है?

किताब पढ़ते बच्चे, अर्ली लिट्रेसी, प्रारंभिक साक्षरता, रीडिंग रिसर्च, भाषा शिक्षणभारत में पहली से आठवीं कक्षा तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार मिल रहा है। इसके तहत 6 से 14 साल तक के बच्चे को पूरे साल के दौरान कभी भी प्रवेश दिलाया जा सकता है।

इसके साथ बच्चों को आठवीं तक किसी भी क्लास में फ़ेल न करने का भी प्रावधान है। यानि किसी बच्चे की कॉपी में कुछ लिखा है या कॉपी बिल्कुल खाली है, इस बात का बच्चे के अगली कक्षा में जाने से कोई रिश्ता नहीं है। इस प्रावधान पर फिर से विचार हो रहा है। इस नो डिटेंशन पॉलिसी को खत्म करने की बात कही जा रही है ताकि शिक्षा के स्तर में सुधार किया जा सके।

संवेदनशील बनें शिक्षक

ज़मीनी स्तर पर इसके नतीजे साफ़-साफ़ दिखाई दे रहे हैं आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों का जो स्तर पहले होता था। अब उसमें गिरावट आ रही है। स्थिति यह हो गई है कि नौवीं कक्षा में बड़े पैमाने पर छात्र फेल हो रहे हैं। दसवीं में फेल होने वाले बच्चों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी हुई है। पासबुक पर छात्रों की निर्भरता बढ़ी है। क्योंकि उनका पठन स्तर या समझ का विकास कक्षा के अनुरूप नहीं है। बच्चों की बुनियाद कमज़ोर होने के नाते नौवीं-दसवीं क्लास में पढ़ाए जाने वाले विभिन्न टॉपिक को छात्र नहीं समझ पाते, यह बात सीनियर सेकेण्डरी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक कहते हैं।

बच्चे, पढ़ना सीखना, बच्चे का शब्द भण्डार कैसे बनता हैशिक्षक एक बात और कहते हैं, “हम अपनी पूरी क्षमता के अनुसार नहीं पढ़ा पा रहे हैं। क्योंकि छठीं क्लास में जिन बच्चों का प्रवेश होता है, वे बहुत सी बुनियादी बातें सीखे बग़ैर यहां तक आ जाते हैं। आप बच्चों को पाँच साल में जो चीज़ सीखनी चाहिए, सीधे एक साल में सिखा नहीं सकते।”

शिक्षक साथियों की तरफ़ से आने वाली बात हमें उस सवाल की तरफ ले जाती है कि जो पूछती है कि बुनियाद तैयार करने वाले शिक्षक कहाँ हैं? प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ाने वाले शिक्षकों को समझना चाहिए कि वे जो विषय पढ़ा रहे हैं, उसे बच्चों को दसवीं या बारहवीं तक पढ़ना है और यही उनके कॉलेज में पढ़ाई की आधार बनने वाले हैं। इस समग्रता में बच्चों की पढ़ाई की यात्रा को देखने वाला नज़रिया शिक्षकों को अपनी भूमिका के प्रति ज्यादा संवेदनशील होने की गुजारिश करता है।

प्राथमिक शिक्षा में मॉनिटरिंग जरूरी

प्राथमिक स्तर पर शिक्षा की स्थिति को पुख्ता बनाने के लिए प्रयास करने और विद्यालयों की सतत मॉनिटरिंग करके उचित फीडबैक देने की जरूरत है। ताकि पहली-दूसरी कक्षा के बच्चे किताब पढ़ना, अपनी बात को अच्छे तरीके से बोलकर बताना और गणित के बुनियादी कौशलों का विकास कर सकें।

इसके लिए शिक्षकों के प्रशिक्षण को ज्यादा प्रभावशाली बनाने और क्लासरूम स्तर पर होने वाले प्रयासों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। इसके साथ ही वहां पेश आने वाली समस्याओं को सुलझाने के लिए विभिन्न शिक्षक साथियों के बीच संवाद का एक सेतु बनना चाहिए। इससे समाधान का एक सिलसिला शुरू होगा जो एक स्कूल के शिक्षक से होते हुए, दूसरे स्कूल के शिक्षक तक पहुंचेगा।

अभिभावकों की भूमिका क्या हो?

बच्चे स्कूल में पढ़ने के लिए आएं, यह सुनिश्चित करना अभिभावक की जिम्मेदारी होनी चाहिए। निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावक अपनी इस भूमिका को बेहतर ढंग से निभा रहे हैं। भले ही वे दबाव में ऐसा कर रहे हों, मगर सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को अभिभावकों का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है। या उनके अभिभावक यह मानकर चलते हैं कि बच्चों को पढ़ाने और उनको स्कूल तक बुलाने की जिम्मेदारी भी शिक्षक की ही है। वे बच्चों को जब मन होता है, घर पर रोक लेते हैं। क्योंकि उनको लगता है कि बच्चे स्कूल जाएं या न जाएं उनको तो पास होना ही हैष। यह बात एक शिक्षक ने अभिभावकों की भूमिका के संदर्भ में बातचीत के दौरान कही।

कुल मिलाकर निष्कर्ष यही है कि प्राथमिक स्तर की शिक्षा की मजबूत नींव पर ही उच्च शिक्षा की कहानी लिखी जा सकती है। इसलिए प्राथमिक स्तर पर बच्चों की पढ़ाई पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इससे उनको उच्च-प्राथमिक स्तर पर मदद मिलेगी और वे सेकेण्डरी या हायर सेकेण्डरी स्तर पर कक्षा के अनुरूप प्रदर्शन कर पाएंगे। इससे उन शिक्षकों को मदद मिलेगी जो सच में पढ़ाना चाहते हैं। अपने छात्रों को भविष्य में उच्च शिक्षा के लिए तैयार करना चाहते हैं।

ऐसे माहौल का निर्माण माध्यमिक स्तर पर पढ़ाने वाले शिक्षकों को उनको अपनी क्षमता के अनुसार पढ़ाने और नए विचारों को क्लासरूम में लागू करने के लिए प्रेरित करने में मदद करेगा।

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बाबूराव अंबले

बिल्कुल सही है, प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर प्रश्न चिन्ह बरसों से उठ रहा है। छात्रों की कक्षा बदल रही है, आयु बढ रही है व, परंतु माध्यमिक पाठशाला के पाठ्यक्रम के स्तरानुकूल उनकी क्षमता का विकास हो नहीं पा रहा। आठवीं तक बिना मूल्यों के निरंतर छात्रों को भेजना, परिष्कृत सोच की आवश्यकता है।.. .. ….. मानिटरिंग की व्यवस्था भी केवल नाम के लिये ही है।
बाबूराव अंबले, चिटग़ुप्पा, कर्नाटक

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