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नई शिक्षा नीति-2019 के ड्राफ्ट में लाइब्रेरी को लेकर क्या ख़ास बात कही गई है?

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नई शिक्षा नीति-2019 के ड्राफ्ट में में प्राथमिक स्तर पर सीखने कीे संकट का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि प्राथमिक स्तर पर बच्चे भाषा व संख्या के अधिगम में पिछड़ रहे हैं, इसलिए टाइम टेबल में बुनियादी साक्षरता व संख्या ज्ञान को ख़ास महत्व देना चाहिए। बुनियादी साक्षरता को मजूबत करने की अपेक्षा लाइब्रेरी से की जा रही है, नई शिक्षा नीति के ड्राफ्ट को पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है।

इसमें कहा गया है, “पुस्तकालय के आसपास गतिविधियाँ की जानी चाहिए- जैसे कहानी, रंगमंच, समूह में पढ़ना, लिखना और बच्चों के द्वारा लिखी गई मौलिक सामग्री व कलाओं का प्रदर्शन करना।” यानि इस परिकल्पना में प्राथमिक स्तर के विद्यालयों में लाइब्रेरी की मौजूदगी को स्थान दिया गया है।

स्कूल व सार्वजनिक पुस्तकालयों को मिले महत्व

नई शिक्षा नीति-2019 का ड्राफ्ट उपरोक्त संदर्भ में कहता है, “स्कूल और सार्वजनिक पुस्तकालयों (सरकारी) को विस्तार देने एवं पढ़ने व संवाद करने की संस्कृति को विकसित करने की जरूरत है। इस संदर्भ में पढ़ने की संस्कृति विकसित करने के लिए, देश भर में सार्वजनिक और स्कूल पुस्तकालयों का विस्तार किया जायेगा।”

पुस्तकालयों में बच्चों की किताबें हो यह सुनिश्चित करने की बात नई शिक्षा नीति के ड्राफ्ट में कही गई है। इस उल्लेख कुछ इस तरीके से होता है, ” पुस्तकालयों में स्थानीय और क्षेत्रीय भाषाओं में – विशेष रूप से बच्चों की किताबें भी शामिल होंगी। स्कूल और स्कूल परिसरों में स्थानीय भाषाओं में पुस्तकों का बड़ा चयन किया जायेगा और शिक्षक सक्रिय रूप से बच्चों को किताबें पढ़ने और उन्हें घर ले जाने के लिए प्रोत्साहित करेंगे।

बच्चों को पुस्तकालय में मिले अभिव्यक्ति के अवसर

पठन कौशल का विकास, पढ़ने की आदत, भारत में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति, अर्ली लिट्रेसी

छात्रों को उनकी पसंदीदा पुस्तकों/कहानियों के अंश पढ़ने और मौखिक सारांश एवं स्वयं के विचारों को प्रत्येक सप्ताह या महीने में अपनी कक्षा के सामने प्रस्तुत करने के लिए कहेंगे। ताकि पढ़ने के साथ-साथ संवाद एवं बोलने का कौशल विकसित हो सके। चूंकि छात्र एक से अधिक भाषा सीखते हैं तो इन पाठ और प्रस्तुतियों को अन्य भाषाओं में भी तैयार किया जाएगा। (नई शिक्षा नीति ड्राफ्ट-2019, हिन्दी, पृष्ठ संख्या 83-84)”

आखिर में एक संक्षिप्त टिप्पणी

भारत में पुस्तकालयों को प्रोत्साहित करने की बात पूर्व की सभी शिक्षा नीतियों में की गई है। नई शिक्षा नीति-2019 ने भी पुराने प्रावधानों के साथ-साथ कुछ नए तत्वों को शामिल किया है। लेकिन पूर्व की नीतियों की भांति नई शिक्षा नीति के इस ड्राफ्ट में विस्तार का अभाव है। उदाहरण के तौर पर 1952 में बने मुदालियर आयोग ने पुस्तकालयों को लेकर विस्तार में रणनीति व योजना का जिक्र किया था। इसके प्रमुख बिंदु इस प्रकार थेः

  • पढ़ने की आदत का विकास
  • स्वतंत्र रूप से सीखने के लिए पुस्तकालय की आवश्यकता
  • पुस्तकालय की रूपरेखा (डिज़ाइन) कैसी हो
  • पुस्तकालय में फर्नीचर की व्यवस्था कैसी होनी चाहिए
  • क्लासरूम लाइब्रेरी का महत्व
  • पुस्तकालय प्रभारी के गुण व विशेषताएं

मुदालियर आयोग की रिपोर्ट में कहा गया कि पुस्तकालय को विद्यालय की सबसे आकर्षक जगह होनी चाहिए, ताकि सभी विद्यार्थी स्वाभाविक रूप से इसकी तरफ खिंचे चले आएं। यह एक ऐसे कमरे में होनी चाहिए जिसमें पर्याप्त रौशनी आती होगी, जिसकी दीवारों पर आकर्षक चित्र बने हों, फूलों व कलात्मक कलाकृतियों व प्रसिद्ध पेंटिंग्स लगी हुई हों।

पुस्तकालय के लिए फर्नीचर, बुक-शेल्फ, मेज, कुर्सियां, पढ़ने की मेज इत्यादि का चुनाव कलात्मक नज़रिये और व्यावहारिक उपयोगिता को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। किताबें बच्चों की पहुंचे में हों, इसके लिए खुली आलमारी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इससे बच्चे खुद से किताबों का इस्तेमाल करना सीख सकेंगे और अपने पसंद की किताब का चुनाव कर सकेंगे। पुस्तकालय की शुरुआत के पहले दिन से ही बच्चों का पूरा सहयोग लिया जाए ताकि बच्चे महसूस कर सकें कि यह उनका अपना पुस्तकालय है।

यह बात साफ तौर पर कही जा सकती है कि पुस्तकालय को लेकर इस तरह के विस्तार का अभाव नई शिक्षा नीति-2019 के ड्राफ्ट में दिखाई देता है। इसके साथ ही साथ बच्चों के किताबों के चुनाव के सवाल को भी अनदेखा किया गया है कि इसमें सरकारी व निजी दोनों तरह के प्रकाशनों की किताबें शामिल हों और साहित्य की गुणवत्ता को पठनीयत को महत्व दिया जाए।

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