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बाल-साहित्य में कविताएंः ‘एक पत्ते पर धूप रखी थी, एक पत्ते पर पानी’

वे कविताएँ जिन तक मैं पहुँच सका, लगभग 1700 कविताएँ पढ़ने का समय मिला। मुझे हैरानी हुई कि मात्र छह फीसदी कविताएं ही मुझे आनन्द दे सकीं। मैं यह मानता और जानता हूँ कि आनंद की अपनी सीमा है। हर किसी की अपनी मनोवृत्ति भी है।

यह क़तई ज़रूरी नहीं है कि मुझे पसंद आने वाली कविताएँ आपको भी पसंद आएँ। यह भी हुआ कि पढ़ते-पढ़ते मैं कई बार अपना बालमन छोड़कर बड़ापन में आ गया। कभी मुझे लगा कि ये कविता तो बड़ों की कविता है! कभी लगा कि ये कविता बच्चों के लिए हो ही नहीं सकती ! कभी-कभी लगा कि यह कविता तो सभी को अच्छी लगेगी। कभी-कभी ऐसी कविताएं भी आँखों के सामने से गुजरीं जिन्हें पढ़कर मन प्रसन्न हुआ।

सुशील शुक्ल बाल-साहित्य में नयापन तलाशते हैं। वे मानवीकरण के सशक्त हस्ताक्षर हैं। संवेदनाओं,भावनाओं,मानवीय संवेगों की सूक्ष्मता के लिए वे जाने जाते हैं। वह इस पूरी कायनात के हर कण की अस्मिता और अस्तित्व को जगह देने का सफल प्रयास करते हैं। वह इंसानों का इंसानों से और इंसानों को पक्षियों से रिश्ता ऐसे व्यक्त करते हैं जैसे वे एक ही पिता की संतानें हों।

एक अंश-

मेरे घर की छत के कांधे

सर रखकर एक आम

चिड़ियों से बातें करता है

रोज़ सुबह से शाम।

सुशील शुक्ल जहाँ चींटियों की परछाई को भी सुकून देने वाली जगह मानते हैं, वहीं वे छोटी-छोटी बेजान चीज़ों की आवश्यकता और मनोभावों को अलग पहचान देते हैं। वे निर्जीव चीजों,वस्तुओं,सेवाओं और उपेक्षित चीज़ों को भी अनमोल बताते हैं। एक अंश-

एक पत्ते पर धूप रखी थी
एक पत्ते पर पानी
धूप ने सारा पानी सोखा
हो गई खतम कहानी।n

‘लो यह टॉफी खाओ जी’

दामोदर अग्रवाल के पास बच्चों की भाषा है। उनकी दुनिया है। उनकी कविताएँ पढ़कर लगता है कि किसी बड़े ने नहीं बच्चे ने अपने लिए लिखी है। यह बड़ी बात है। अन्यथा कहने को तो कई बाल कविताएँ होती हैं, पर उसमें बालपन नहीं होता। पूरी कविता में बड़ापन ही दिखाई देता है। ऐसा भाव बोध आम तौर पर पढ़ने को कम ही मिलता है। एक अंश-

छुट्टी जी, ओ छुट्टी जी
लो यह टाॅफी खाओ जी
बस, इतनी सी विनती है
जल्दी-जल्दी आओ जी।

जयप्रकाश भारती की रचनाओं में पारम्परिक भाव-बोध अधिक पढ़ने को मिलते हैं। लेकिन उनकी ध्वन्यात्मक कविताओं का अंदाज़ अलग ही है। ऐसी कविताएँ बच्चों की दुनिया की ही हैं और बच्चों को ख़ूब पसंद आती है। ‘सड़क पर भीड़’ कविता पूरा चित्र उकेरती है-

पीं पीं पीं पीं
भों भों भों भोें
हों हों हों हों
खों खों खों खों

बच्चे जिस तरह से घर की,संबंधों की, चीज़ों की,रिश्तों की पड़ताल कर लेते हैं। पूछ-पूछ कर अपनी जानकारी को समृद्ध कर लेते हैं। यह बच्चे ही कर सकते हैं। इस मायने में दामोदर अग्रवाल बच्चों के मन को पढ़ने में सफल रहे हैं।

शेरजंग गर्ग की एक छोटी-सी कविता है-

गुड़िया है आफ़त की पुड़िया
बोले हिंदी,कन्नड़, उड़िया
नानी के संग भी खेली थी
किंतु अभी तक हुई न बुढ़िया।

‘हिलमिल रहो सभी के साथ’

‘कहते हमसे’ रमेश कौशिक की एक कविता है। यह कविता इस बात का पुख़्ता प्रमाण देती है कि बच्चों को बच्चा समझना भारी भूल है। बाल मनोविज्ञानी मानते भी हैं कि बच्चे दो साल की आयु से ही घर-बाहर श्रम की महत्ता तक को समझने लगते हैं। वह उससे स्वयं को जोड़ने का प्रयास भी करने लगते हैं। फिर वे बड़ों के मनोभावों को क्यों नहीं समझते होंगे? समझते हैं-
मम्मी-पापा कहते हमसे
हिलमिल रहो सभी के साथ
लेकिन वे आपस में दोनों
लड़ते रहते हैं दिन-रात।

शंकर सुल्तानपुरी की कविताएँ बच्चों के लिए एक तरह से बौद्धिक खुराक मानी जाती है। सूचना के साथ वह जानकारी देने वाली कविताएं लिखते रहे हैं। बालमन की आवाज उनकी कविताओं में भी दिखाई देती है। एक कविता के अंश-
आसमान में कहीं नदी है
उसमें कितना कितना पानी
सारी दुनिया पर बरसाता
कौन भला है ऐसा दानी?

बाल-साहित्य के लिए राष्ट्रबंधु ने अथक प्रयास किए। समागमों की पहल करने वालों में वे भी थे। उनकी एक कविता बच्चों के जीव-जन्तु प्रेम का दर्शाती है। एक अंश-

पप्पू बुला रहा चिड़िया को
मीठा गाना गाओ।
चिड़िया बोली बिना पेड़ के
कहाँ रहूँ बतलाओ।

प्रयाग शुक्ल ने बाल-साहित्य को बेहतरीन रचनाएँ दी हैं। धम्मक धम्मक जाता हाथी, ऊँट चला भई ऊँट चला और टूटी पेंसिल उनकी बेहतरीन कविताएं हैं। ‘कहाँ नाव के पाँव’ भी एक शानदार कविता है। एक अंश-

बहती जाती नाव
कहाँ नाव के पाँव !
कोई जान सके ना।
देखो उसका बहना।

रोहिताश्व अस्थाना बच्चों के समक्ष आदर्शवादी स्थितियां नहीं गड़ते। वे बताना चाहते हैं कि बच्चे भी वैज्ञानिक विचारधारा के पक्षधर हैं। एक अंश-

परी कथाएँ हमें न भातीं
भूत-प्रेत बाधा भरमातीं
हम वैज्ञानिक युग के बच्चे
है विज्ञान हमारी थाती

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Shruti

बेहद सुंदर लेख एवं कविताएं👏👏👏👏

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