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शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

कविताः आज ये दुनिया बनी जंगल है

यह कविता वीरेंद्र कुमार, रिटायर्ड प्रवक्ता, गणित द्वारा रचित है। ज़िंदगी के प्रति अपने अनुभवों को उन्होंने रचनात्मक तरीके से अभिव्यक्ति किया है।

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जिंदगी यूँ ही सभी जीते हैं
ख़ुशी की चाह में ग़म पीते हैं
यहाँ की रीति बड़ी अनोखी है
यहाँ पर सबके अलग फीते हैं
मिला है धोखा हमें दुनिया में
बड़ी मुश्किल से दिवस बीते हैं
सभी ने लूटा हमें जमकर के
मगर भूखे हैं हाथ रीते हैं
आज ये दुनिया बनी जंगल है
फटे मुँह हैं घूमते चीते हैं।

(लेखक परिचयः यह कविता वीरेंद्र कुमार, रिटायर्ड प्रवक्ता, गणित द्वारा रचित है। आपने 20 के करीब गणित पर पुस्तक, 50 से अधिक रिसर्च पेपर और लेख लिखे है। इन्हें 2012 में रामानुजन पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इस कविता में एक शिक्षक के रचनात्मक पक्ष को देखा जा सकता है।)

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