कोविड-19 के दौर में बच्चों तक पहुंच बना रहे हैं ‘सामुदायिक पुस्तकालय’

पुस्तक संस्कृति का विकास, पिठ्ठू पुस्तकालय

भारत के विभिन्न हिस्सों में बच्चों तक पहुंच बनाने और उनको शिक्षा से जोड़े रखने के लिए बहुत से प्रयास हो रहे हैं। इसी में से एक मुहिम है सामुदाय में किताबों की पहुंच सुनिश्चित करने और उनके साथ पुस्तकालय से संबंधित गतिविधियां संचालित करने की। उत्तराखण्ड के नानकमत्ता पब्लिक स्कूल के बच्चों ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है।

उन्होंने समुदाय में खुद के प्रयासों से बच्चों तक पहुंचने और उनको किताबों स जोड़ने का काम किया। इसी के साथ-साथ उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश में ग़ैर-सरकारी संस्थाओं ने भी इस दिशा में उल्लेखनीय प्रयास किये हैं। बच्चों तक ई-बुक और यू-ट्यूब लिंक के माध्यम से पहुंचने की भी कोशिश हुई है, लेकिन जो असर प्रत्यक्ष रूप से किताबें हाथ में लेकर पढ़ने और प्रयास करने का होता है वह ज्यादा महत्वपूर्ण है।

पीठ में पिट्ठू और पिट्ठू में पुस्तकालय

उत्तराखण्ड में पुस्तकालय को लेकर होने वाले प्रयासों पर शिक्षक और ‘शिक्षा के सवाल’ पुस्तक के लेखक महेश पुनेठा लिखते हैं, ” बच्चे खुद तो पढ़ ही रहे हैं । साथ में अपने छोटे भाई-बहनों को भी पढ़ा रहे हैं। यह देखना सुखद है । बड़े अपनी गपशप में तो बच्चे अपनी कहानी में मगन है। ऐसा नहीं है कि किसी ने इन्हें पढ़ने के लिए बैठाया हो। मन हुआ अपने आप चले आए हैं यहां। पिट्ठू को खोलते हैं, किताबों से खेलते हैं और खेलते-खेलते पढ़ने-पढ़ाने लग जाते हैं।”

वे आगे कहते हैं, “जो बच्चे अभी पढ़ना नहीं जानते हैं बड़ों से पढ़कर सुनाने की जिद करते हैं। किताबों से इस तरह बच्चों को दोस्ती करते देखना आनंद दे जाता है। यही तो कोशिश है ‘पीठ में पिट्ठू और पिट्ठू में पुस्तकालय’ की। ध्यान रहे यदि बच्चों को जबरदस्ती किताबों के साथ बैठाने की कोशिश करेंगे तो वे दूर भागेंगे। खुद आजमा कर देख लीजिए।”

भारत के दूरदराज के क्षेत्रों में पुस्तक संस्कृति की मुहिम को जीवंत रखने और उसे आगे बढ़ाने में ऐसे प्रयासों की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत के अन्य हिस्सा में काम करने वाले लोगों के लिए ऐसे प्रयास वास्तव में काफी कुछ सिखाने वाले और ऐसे प्रयासों को प्रोत्साहित करने वाले हैं।

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