लेख: 21वीं सदी के बच्चों के लिए कैसी हो बुनियादी शिक्षा?

जब हम बुनियादी स्तर (फाउण्डेशन स्टेज/NCF-FS) पर बच्चो की शिक्षा को लेकर सोचते हैं तो कई सवाल हमारे मन में उठते हैं। जैसे भविष्य की बुनियाद रखने वाले बच्चे कैसे तैयार होंगे? वे किस प्रकार भविष्य की चुनौतियों से जूझने और आगे बढ़ने का साहस व आत्मविश्वास हासिल कर सकेंगे? इन सवालों के जवाब हमें तभी मिल सकेंगे जब सबसे पहले हम यह विचार करें कि हम कैसे इंसान और कैसे समाज का निर्माण करना चाहते हैं? इस उद्देश्य को पाने के लिए किस तरह की शिक्षा की आवश्यकता होगी।
हम एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जो न्यायसंगत हो और समता, बराबरी, व्यक्ति की गरिमा व स्वतंत्रता तथा तर्क के मूल्यों पर आधारित हो। हमारे संविधान के माध्यम से भी ऐसे ही समाज का सपना देखा गया है और यहीं से ऐसे इंसान की कल्पना जन्म लेती है जो इस तरह के समाज का सपना पूरा करेंगे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में ये कहा गया है कि शिक्षा का उद्देश्य ऐसे इंसान विकसित करना है जो विचार और कर्म के स्तर पर तार्कित हों, करुणा व समानुभूति से भरे हों,साहसी व लचीले हों, वैज्ञानिक नज़रिए व रचनात्मक कल्पना वाले हों,साथ ही जो अच्छे नैतिक विचार व मूल्य रखते हों।
समाज और इंसानों के बारे में हमारे संविधान और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 द्वारा प्रस्तुत परिकल्पना को ध्यान में रखकर विचार करेंगे। हम 21वीं शताब्दी में बच्चों के सामने पेश चुनौतियों के संदर्भ में भविष्य की आवश्यकताओं को रेखांकित करते हुए बुनियादी स्तर पर बच्चों, शिक्षक और कक्षा के बारे में हमारे विज़न (दृष्टि) को अभिव्यक्त करने की कोशिश करेंगे।
21वीं शताब्दी में बच्चे और बुनियादी शिक्षा
21वीं सदी में दुनिया तेजी से बदल रही है। हम डिजिटल युग में जी रहे हैं जहाँ तकनीक समाज के हर क्षेत्र में अपने पैर पसार रही है। मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे शब्द अब हर तरफ सुनाई देने लगे हैं और इनके असर से कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं है। ऐसे में हमारे बच्चों को विद्यालय से बाहर कदम रखते ही एक नई दुनिया का सामना करना होगा और इसके लिए व्यक्तियों में विभिन्न नए किस्म के कौशलों, क्षमताओं और दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी, जो उन्हें इस दुनिया के साथ तालमेल स्थापित करने, लगातार सीखते रहने और अपना रचनात्मक योगदान देने के काबिल बनाएँगे।
रोजगार और वैश्विक परिस्थितियों में तीव्र गति से आ रहे परिवर्तनों की वजह से यह जरूरी हो गया है कि बच्चों को जो कुछ सिखाया जा रहा है, उसे तो सीखें ही और साथ ही वे सतत सीखते रहने की कला भी सीखें। बच्चे समस्या-समाधान और तार्किक एवं रचनात्मक रूप से सोचना सीखें, विविध विषयों के बीच अंतर्संबंधों को देख पाएं, नई जानकारी को नई या बदलती परिस्थितियों में उपयोग में ला पाएं। (राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020)
यद्यपि गलाकाट प्रतिस्पर्धा और एक-दूसरे को पीछे छोड़ देने की होड़ इस बदलाव के कुछ दुष्परिणाम भी हैं और इनके लिए भी बच्चों को तैयार करने की आवश्यकता होगी। इसलिए आज जिन्हें हम 21वीं शताब्दी के कौशलों के नाम से जानते हैं उन पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इन कौशलों में शामिल हैं – चिंतन, समस्या समाधान, सृजनात्मकता, साझेदारी, सम्प्रेषण और करुणा व समानुभूति। ऐसी परिस्थितियों में यह भी जरूरी है कि बच्चे सामजिक-भावनात्मक रूप से कुशल हों और शारीरिक तथा मानसिक रूप से तंदुरुस्त और पुष्ट हों। ताकि वे स्व-जागरूकता के साथ स्वयं को और दूसरों को समझते और भावनात्मक रूप से संभालते हुए दुनिया में बेहतर रिश्ते बना सकें। इसके साथ ही समस्याओं और चुनौतियों के समाधान हेतु अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए निर्णय ले सकें।
इन कौशलों से बच्चों का परिचय सबसे बेहतर तरीके से बुनियादी स्तर पर ही करवाया जा सकता है क्योंकि यही वह उम्र होती है जब बच्चों के मस्तिष्क का विकास सबसे तेजी से हो रहा होता है।
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