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रिसर्च पेपर: “छोटे स्कूलों को मजबूत किया जाए, न कि बंद”

Rationalisation of Schools and Its Impact on Children’s Right to Education: Narratives of Violation of the RTE Act 2009 रिसर्च पेपर को अपराजिता शर्मा और सुष्मिता मित्रा ने लिखा है। यह लेख में भारत में स्कूलों के समेकन (स्कूल विलय) की नीति की आलोचनात्मक समीक्षा करता है, विशेष रूप से राजस्थान के सात दक्षिणी जिलों में किए गए अध्ययन के आधार पर। ग़ौर करने वाली बात है कि इन जिलों में से अधिकांश आदिवासी बहुत आबादी वाले जिले थे। 

स्कूलों के विलय वाली नीति कम नामांकन वाले स्कूलों को बंद या मिलाकर संसाधनों का कुशलतम उपयोग करने के लिए शुरू की गई थी, लेकिन इसका सबसे बड़ा प्रभाव हाशिए पर रहने वाले बच्चों की शिक्षा के अधिकार पर पड़ा है।

पृष्ठभूमि और उद्देश्य

तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय की 2017 की गाइडलाइंस के आधार पर शुरू की गई इस नीति का उद्देश्य था कि छोटे स्कूलों को बड़े स्कूलों में मिलाकर शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर की जाए। लेकिन अध्ययन से पता चला कि यह प्रक्रिया बिना किसी पूर्व तैयारी व्यवस्थित योजना के, असंगत तरीके से लागू की गई और इसके कारण शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE Act, 2009) का कई बार उल्लंघन हुआ।

अध्ययन विधि

इस अध्ययन के लिए बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, सिरोही, जालोर, चित्तौड़गढ़ और प्रतापगढ़ जिलों का चयन किया गया। ये सभी जिले आदिवासी बहुल हैं। जानकारी एकत्र करने के लिए केस स्टडी, फील्ड विजिट, साक्षात्कार, समूह चर्चा और सरकारी आंकड़ों (DISE 2014–2020) का प्रयोग किया गया।

मुख्य निष्कर्ष

  1. बिना सलाह और पारदर्शिता के निर्णय
    स्कूलों को बंद करने से पहले समुदाय, SMC या शिक्षकों से कोई चर्चा नहीं की गई। ग्राम पंचायत प्रमुख तक को जानकारी नहीं थी।
  2. RTE कानून का उल्लंघन
    बच्चों को पास के स्कूलों में नामांकन का अधिकार है (प्राथमिक के लिए 1 किमी, उच्च प्राथमिक के लिए 3 किमी), लेकिन कई बच्चे नालों, जंगलों और राजमार्गों को पार करके स्कूल जा रहे थे।
  3. बढ़ता ड्रॉपआउट
    अनुसूचित जाति/जनजाति, गरीब और लड़कियों के बीच स्कूल छोड़ने वालों की संख्या बढ़ी है। इसके प्रमुख कारण थे दूरी, असुरक्षा की भावना और मातापिता की आर्थिक परेशानियां।
  4. अनियमित उपस्थिति और बाल श्रम
    स्कूलों के विलय के कारण कई बच्चों की उपस्थिति अनियमित हो गई और कुछ ने बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ दी। इसके अलावा कई बच्चे खेती, पशुपालन या अन्य घरेलू काम में लग गए।
  5. परिवहन सुविधा का अभाव
    MHRD की गाइडलाइन में परिवहन सुविधा का प्रावधान किया गया था, लेकिन अध्ययन क्षेत्र में कहीं भी इसका पालन नहीं किया गया था।
  6. निजी स्कूलों की ओर झुकाव
    कई बच्चों ने निजी स्कूल ज्वाइन किए क्योंकि वहां टेम्पो/बस की सुविधा थी, जिससे मातापिता के ऊपर आर्थिक बोझ बढ़ा। जिन गरीब परिवार रे बच्चों को कोई विकल्प नहीं मिला वे शिक्षा की पहुंत से बाहर हो गए।
  7. असंगत ‘Receiving’ स्कूल
    कई जगहों पर नए बच्चों के लिए जिन स्कूलों में विलय किया गया, वहां बुनियादी सुविधाएं ही नहीं थीं शिक्षक, भवन, शौचालय।

प्रभाव

  • तात्कालिक: कुछ बच्चे निजी स्कूल चले गए, कुछ ने बीच में स्कूल छोड़ दिया, कुछ बच्चे स्कूल में अनियमित हो गए।
  • दीर्घकालिक: शैक्षिक असमानता बढ़ी, बाल श्रम बढ़ा, और बच्चों की शिक्षा के अधिकार का हनन हुआ।

प्रमुख सुझाव

  • जिन क्षेत्रों शिक्षा का अधिकार कानून के मानक के विपरीत स्कूल बंद होने से बच्चों का अधिकार छिना है, वहां स्कूल दोबारा खोलें जाएं।
  • स्कूल विलय से पहले समुदाय और विद्यालय प्रबंधन समिति (SMC) से परामर्श अवश्य करें।
  • RTE मानकों को पूरा करें।
  • दूर के विद्यालयों में जाने वाले बच्चों को परिवहन की सुविधाएं अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराएं।
  • प्रशासनिक लाभ और वित्तीय बचत से अधिक शिक्षा के अधिकार को प्राथमिकता दें।

निष्कर्ष

यह अध्ययन दिखाता है कि स्कूल समेकन या विलय की नीति, शिक्षा के अधिकार अधिनियम-2009 के मूल उद्देश्य को ही कमजोर करती है। ग्रामीण, आदिवासी अंचल और हाशिए पर रहने वाले बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिले और वे शिक्षा के अधिकार से वंचित हो जाएं इसलिए जरूरी है कि छोटे स्कूलों को मजबूत किया जाए, कि बंद।

(आप एजुकेशन मिरर से फ़ेसबुकएक्स और यूट्यूब के जरिए भी जुड़ सकते हैं। अपने लेख, कक्षाशिक्षण के अनुभव भेजें educationmirrors@gmail.com पर।)

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