कहानी: ज्ञानी चाचा और बच्चे

‘ज्ञानी चाचा’ कहानी में प्रकृति के साथ बच्चों के परिचय को प्रवाहपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
कई दिनों से रुक रुक कर हो रही बारिश आज जब थमी, तो मौसम एकदम सुहावना हो चला था। ठंडी-ठंडी मस्त हवा बह रही थी । सूरज दादा लगभग अपने घर की ओर प्रस्थान करने को अस्ताचल की ओर बढ़ रहे थे । आसमान में इंद्रधनुषी छटा बिखर रही थी , तभी कानों में मधुर बांसुरी की धुन सुनाई दी । बांसुरी की धुन से समझ आ गया कि यह तो ज्ञानी चाचा की बांसुरी है।
ज्ञानी चाचा की बांसुरी बजते ही गांव के सब बच्चे बरगद के नीचे इकट्ठा हो जाते थे । ज्ञानी चाचा हमारे ही गांव के हैं, वास्तव में वे एक स्कूल में शिक्षक हैं। लेकिन वे अक्सर गाँव में भी प्रकृति एवं विज्ञान के रहस्यों और तथ्यों के बारे में बच्चों को अक्सर अपनी जादुई पोटली की मदद से समझाते हैं, और इसी वजह से सब उनको ज्ञानी चाचा कहकर बुलाते हैं।
ज्ञानी चाचा की बांसुरी सुनकर सब बच्चे बरगद के नीचे इकट्ठे हो गए। पिंकी जोर से बोली, “चाचा आज क्या निकल रहे हो पोटली से।” सारे बच्चे बैठे हुए थे, तभी ज्ञानी चाचा ने पोटली से कुछ रंग-बिरंगा सा निकाला। पिंकी बोली यह रंग बिरंगी चीज तो बड़ी अच्छी लग रही है ,जब वह पकड़ने के लिए हाथ आगे बढ़ाने लगी, तभी तितली उड़ गई। अंकित बोला देखो वह तो वह तितली उन फूलों पर जाकर बैठ गई है । तभी ज्ञानी चाचा बोले यह तितलियां न होती तो बहुत सारे फूल कभी नहीं खिलते, और हम इतने सारे रंग नहीं देख पाते ।

अब यह क्या बच्चों ने ज्ञानी चाचा के हाथ में लगे दूसरे डिब्बे को देखा मीनू बोली चाचा इसमें कैसी तितलियां है ? यह तो इतनी सुंदर नहीं लग रही हैं। उसकी बात सुनकर चाचा बोले बच्चों यह तो तितली नहीं मधुमक्खी है जो फूलों के रस से शहद बनाती है। बच्चों तुम सब बताओ कि शहद का स्वाद कैसा होता है? सब बच्चे एक सुर में बोले “मीठा”। अब ज्ञानी चाचा ने पेड़ के ऊपर लगे छत्ते की ओर इशारा करते हुए कहा कि इस प्रकार का छत्ता मधुमक्खी का घर होता है, और शहद का भी।
चाचा यह बात ही रहे थे कि तभी इल्मा की लगभग चीख निकल गई वह चीखते हुए बोली चाचा साँप , ज्ञानी चाचा ने साँप को अपने हाथ में उठाया और हंसते हुए बोले डरो मत यह सांप नहीं यह तो हमारा दोस्त केंचुआ है जो हमारे खेतों की मिट्टी को उपजाऊ बनाने में सहयोग करता है, और हम सभी इसे किसान मित्र के नाम से जानते हैं।
तभी महेश काका गोबर, गाड़ी में भरकर लाए और पास के घूरे के ढेर पर पलट दिया , वंशिका नाक-भौं सिकोड़ते हुए बोली, ” कितनी बदबू आ रही है ।” तभी ज्ञानी चाचा बोले यही गोबर कुछ दिनों के बाद खाद बन जाता है, और खेतों में डाला जाता है।

तब इस खाद को डालने से हमारे खेतों के मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ जाती है और खेतों में पैदा होने वाले मक्का, ज्वार ,बाजरा, गेहूं सरसों ,कपास ,दालें आदि की फसल बहुत अच्छी होती है जिसे हम सबका पेट भरता है।
अब चाचा ने इशारा किया तो बच्चों का काफिला गांव के बाहर वाली नहर की ओर बढ़ चला। नहर के किनारे पहुंचकर चाचा ने मुँह पर उंगली रखकर सभी को शांत रहने का इशारा करते हुए कहा, “ध्यान से इन आवाजों को सुनो की बहुत सारी आवाज़ आ रही थी ।” सभी बच्चे एक साथ बोल उठे चाचा यह तो मेंढक की आवाजें हैं ।
तभी मोनू ने ईंट का एक टुकड़ा पानी में बैठे मेंढक की ओर फेंका तो ज्ञानी चाचा मना करते हुए बोले कि हमें किसी जीव जंतु को ऐसे नहीं मारना चाहिए सभी प्रकार के जीव जंतु और पेड़ पौधों से मिलकर ही तो हम सब की रंग बिरंगी दुनिया बनी है अब लगभग अंधेरा हो चला था ज्ञानी चाचा ने यह कहते हुए गांव की ओर चलने का इशारा किया कि कल ज्ञान की पोटली के नए ज्ञान के साथ फिर मिलेंगे अपने बरगद के नीचे । बच्चे खुशी खुशी अपने घर की ओर चले गए।
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(परिचय: संजीव कुमार शर्मा, उत्तर प्रदेश के राज्य अध्यापक पुरस्कार प्राप्त शिक्षक हैं। आपने उच्च प्राथमिक विद्यालय (1_8) राजमार्गपुर, ब्लॉक अतरौली जनपद अलीगढ़ से जुड़े हैं। वर्तमान में आप उत्तर प्रदेश राज्य संदर्भदाता समूह (SRG) के सक्रिय सदस्य के रूप में अलीगढ़ जनपद में काम कर रहे हैं। शैक्षणिक नवाचारों में आपकी गहरी रुचि है और शिक्षकों के अच्छे प्रयासों को आपने अपने जनपद में निःसंकोच सहयोग और प्रोत्साहन दिया है।)
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बहुत-बहुत बधाई संजीव सर, इस शानदार कहानी और लाजवाब स्टोरी लाइन के लिए। संवाद की शैली ने भारत के कहानी परंपरा की याद दिला दी। 🌸🌸😊🎉🎉
अच्छी कहानी है