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सरकारी स्कूलों की खराब स्थिति में बदलाव के लिए किन प्रयासों की जरूरत हैँ?

सबसे ख़ास बात राजस्थान के स्कूलों की स्थिति उत्तर प्रदेश के स्कूलों से बहुत  बेहतर है. यहाँ पर अध्यापक स्कूलों में मन से पढ़ाते हैं और ट्रेनिग के लिए भी जाते हैं. पर सभी स्कूलों के हालात एक जैसे नहीं हैं. यह बात भी हमें स्वीकार करनी चाहिए . इसके विपरीत यूपी में ट्रेनिंग का दिन छुट्टी के दिन जैसा होता है. अध्यापक  वहां जाने से कतराते हैं और स्कूलों में अपनी जगह किसी और को भेजते हैं.  सौदेबाजी करके और पैसा देकर विना गए काम चला लेते हैं.यह बात उत्तरप्रदेश के एक अध्यापक ने कही जो यहाँ पर काफी लम्बे अर्शे से पढ़ा रहे हैं. 
वे शिक्षा में अमीर गरीब के बीच होने वाले भेद- भाव से भी काफी नाराज थे. उनका मानना है कि जबतक बड़े घरों के बच्चे निजी स्कूलों में अच्छी शिक्षा के लिए जायेंगे और केवल गरीब और वंचित तबके के बच्चे  सरकारी स्कूलों में आयेंगे तब तक सरकारी स्कूलों कि स्थिति अच्छी नहीं हो सकती. सरकार अगर केवल स्कूलों की भौतिक जरूरतों (कमरे,लैब, खेल का सामान  और किताबें ) और पर्याप्त शिक्षकों की तैनाती सुनिश्चित कर दे तो भी स्कूलों की बदहाली वाली स्थिति को समाप्त किया जा सकता है.

प्रशासनिक व्यवस्था देखने के लिए हेड मास्टर को कागजी कार्यवाही और क्लास से थोड़ी छोट देनी चाहिए ताकि वह अपनी जिम्मेदारी का अच्छे से निर्वहन कर सके.साथ ही बाक़ी बचे कार्यों के लिए अलग से स्टाफ होना चहिये.तब ही स्कूल में शिक्षा का स्तर सुधर सकता है.बच्चे सीख सकते हैं और किताबों के पाठ्यक्रम के अनुरूप उनको पढ़ाया जा सकता है.  सत्तर फीसदी सुधार तो मात्र कड़ाई से एक दिन में हासिल किया जा सकता है.लेकिन प्राथमिक शिक्षा को लेकर इतना  गंभीर कौन है? यह सोचने वाली बात है.

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