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स्कूल और कॉलेजः परीक्षाओं का डर आख़िर कब तक?

परीक्षाओं के लेकर छात्रों में जो ख़ौफ़ या डर होता है वह बोर्ड परीक्षाओं के दौर से उनके मन में आकर लेता था, लेकिन अभी तो इसकी बुनियाद बचपन से ही पड़ने लगी है। दादी जी बच्चे से पूछती हैं कि इस बार क्लास में तुम्हारी कौन सी पोजीशन रही, तो नंबर कम आने पर पापा की धमकी, मम्मी की उलाहना अलग कि अरे सारा दिन तो वीडियो गे खेलता या गली में बच्चों के साथ धमाचौकड़ी करता है/ या करती है तो नंबर कम नहीं आएंगे। बहुत से परिवारों से में तो यह सिलसिला दसवीं-बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं के बाद भी जारी रहता है। इसके बात जब प्रतियोगी परीक्षाओं की दुनिया से सामना होता है चाहे वह नवोदय विद्यालय में प्रवेश के लिए हो, सैनिक स्कूल में दाख़िले के लिए या फिर किसी अच्छे कॉलेज और विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए होने वाली परीक्षाएं हों। छात्रों का भारी हुजूम देखकर तो बहुत सारे लोगों का हौसला जवाब दे जाता है।

इसकी एक बड़ी वजह छात्रों को मिलने वाले गाइडेंस का अभाव है। इसके पीछे कई बार यह भी वजह होती है कि बहुत से छात्र अपने परिवार से विश्वविद्यालय, कॉलेज या अपने शहर से बाहर पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए जाने वाले पहले छात्र होते हैं। तैयारी एक प्रक्रिया है, इस बात को समझने की कोशिश बहुत से कम अभिभावक करते हैं। वे बच्चों से सदैव परीक्षाओं के पहले हौसला बढ़ाते हैं और परीक्षा के बाद परिणामों के बारे में सवाल करते हैं। परिणाम अनुकूल न होने पर जाने-अनजाने अपने बच्चों को हतोत्साहित भी करते हैं। शायद ऐसे समय में अगर छात्रों को अपने पैरेंट्स का हौसला मिले तो उनका आत्मविश्वास ज़्यादा बेहतर करने के लिए प्रेरित करे। लेकिन सौभाग्य से सभी छात्रों को इस तरह की पैरेंटिंग नहीं मिलती है। भारत के लिए पैरेंटिंग का कांसेप्ट काफ़ी नया है। शहरों में यह लोगों की व्यवस्थिति ज़िंदगी की हिस्सा बन रहा है तो वहीं गाँवों की तरफ़ लोग अब भी कहते हैं कि बच्चे पालना कौन सी बड़ी बात है? लेकिन बाकी बच्चों से जब वे अपने बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, रहन-सहन, समझ और दुनियादारी की बातों में प्रवीणता देखते हैं तो उनको शायद अपनी परिस्थिति पर थोड़ा-थोड़ा तरस भी आता है।

कई बार गाँवों से शहरों की तरफ़ आने वाले बच्चों के अभिभावक अपने छोटे-छोटे दबावों से छात्रों का हौसला कुचलते चले जाते हैं और जिन छात्रों में कुछ बड़ा करने की संभावनाएं होती हैं, वे भी अवसरों की संभावनाओं से समझौता करने को मजबूर हो जाते हैं। ऐसे छात्रों के साथ अपने सपनों को पूरा न कर पाने का मलाल भी होता है जिसका सामना बहुत से छात्रों को ताज़िंदगी करना पड़ता है। एक दौर था जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्र दाल-भात-चोखा (जिसे संक्षेप में वे डीबीसी व्यंजन) खाने वाले छात्रों का चयन सिविल सर्विसेस में होता था और उससे प्रेरणा लेकर बाकी छात्रों को पढ़ने का उत्साह और प्रेरणा मिलती थी। इस कारण से बहुत से छात्रों ने अपने जीवन में सामान्य से लेकर विशिष्ट सभी तरह की उपलब्धियां अर्जित कीं। कुछ शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे हैं तो बाकी अन्य क्षेत्रों में अपना योगदान दे रहे हैं। कुछ ऐसी ही बात जेएनयू के बारे में कही जाती थी कि अच्छे छात्रा सिविल सर्विसेस में चले जाते, बाकी प्रोफ़ेसर बन जाते और कुछ लोग मीडिया में काम करते तो बाकी राजनीति और अन्य क्षेत्रों में काम करने को लेकर आगे बढ़ जाते थे।

केंद्रीय विश्वविद्यालयों और राज्य विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले बहुत से छात्रों का कहना है कि वहां के प्रोफ़ेसर के पढ़ाने के तरीका और माहौल के कारण अपने जीवन में वह हासिल करने का मौका मिला जो आज वह हैं। दिल्ली विश्वविद्याल के हिंदू कॉलेज के बारे में यही बात कही जाती है कि वहां हॉस्टल में रहकर अध्ययन करने वाले बहुत से छात्रों का चयन सिविल सर्विसेस और बाकी सेवाओं में होने के कारण बाकी छात्रों पर एक सकारात्मक दबाव बनता था और सीनियर्स का गाइडेंस भी मिलता था आगे की तैयारी के लिए। यह सारी बातें प्रेरित करने वाली हैं। लेकिन वर्तमान की एक सच्चाई यह भी है कि कोचिंग सेंटर्स की फ़ीस दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। जब लाख रूपए सिविल सर्विसेस की तैयारी की फ़ीस होगी तो भी दाल-भात-चोखा खाकर पढ़ाई करने वालों के हौसलों पर क्या असर पड़ेगा? यहां दाल-भात-चोखा एक प्रतीक मात्र है क्योंकि नई पीढ़ी अपने में कुछ लोग अब भी अपने स्वास्थ्य और भावी जीवन की चुनौतियों को लेकर सजग हैं और उस दृष्टिकोण से अपनी तैयारी कर रहे हैं।

आज की युवा पीढ़ी के सामने अवसरों की भरमार है तो उलझने भी बहुत ज़्यादा हैं। विकल्पों के कारण बहुत से लोगों को सही चुनाव में देरी होती है क्योंकि मनोविज्ञान के भूल और सुधार फॉर्मूले के तहत वे जीवन में उद्देश्यों की तलाश करते हैं। इसके विपरीत निरंतर एक दिशा में सही तरीके से औऱ सही गाइडेंस के साथ तैयारी करने वाले छात्रों का आत्मविश्वास मजबूत होता है। प्रतियोगी परीक्षाओं और बाकी परीक्षाओं के दबाव को वे ख़ुद पर हावी नहीं होने देते। इस तैयारी में उनके दोस्तों की भी बड़ी भूमिका होती है जो निरंतर अध्ययन करने, सफल होने की उम्मीद देते हैं और जीवन की समस्याओं का सही तरीके से सामना करने में मदद करते हैं। इतनी सारी कोशिशों के बावजूद जीवन की तीसरे दशक तक परीक्षाओं के भूत का साए की तरह पीछा करना एक अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता है। आने वाले समय में उच्च शिक्षा में महत्वपूर्ण बदलाव करने की जरूरत है ताकि चीज़ों को आसान बनाया जा सके और जीवन के व्यावहारिक पहलुओं को शिक्षा का हिस्सा बनाया जा सके और छात्र-शिक्षक दोनों परीक्षाओं और ग़ैरजरूरी मूल्यांकन के बोझ से मुक्त हो सकें।

शायद इसी डर के कारण बहुत से छात्र चीटिंग करने की दिशा में सोचते हैं…क्योंकि अंत में तो नंबर नज़र आते हैं। लेकिन ऐसे में हमारी नज़र परिणाम पर होती है और प्रक्रिया को हम नज़र-अंदाज कर देते हैं जिसकी खामियाजा हमें आने वाले समय में भुगतना पड़ता है। भारत में रटने की परंपरा का निर्वहन अभी भी एक बोझ की तरह हो रहा है। परीक्षाओं के इसी डर की सकारात्मक शक्ति का दोहन करने का हवाला देते हुए लोग तीसरी,पाँचवीं और आठवीं में भी बोर्ड परीक्षाओं के वापसी की माँग कर रहे हैं और अफ़सोस की बात है कि कुछ राज्य इस दिशा में क़दम बढ़ाने के लिए तत्पर भी हो गए हैं। इस तरह की सैद्धांतिक पढ़ाई, आदर्शवादी माहौल और वास्तविकता से कटा हुए शैक्षिक माहौल भविष्य में छात्रों के सामने तमाम तरह की मुश्किलें पेश करता है। पढ़ाई से उनका मोहभंग भी होता है कि जो पढ़ाई उन्होंने सालों-साल की…वह तो मेरे किसी काम नहीं आ रही है।

बहुत से छात्र इस सच्चाई को स्वीकार करते हैं कि स्कूल से कॉलेज तक की पढ़ाई के दौरान जो बहुत से तथ्य रटवाये और रटे गए थे वे सारे तथ्य तो भूल गए। लेकिन इस दौरान लोगों के साथ सामाजिक परिवेश में सही व्यवहार करने की सीख, लिखना, पढ़ना और चीज़ों को अलग-अलग नज़रिए से देखने और व्यवस्थित तरीके से काम करने की ट्रेनिंग ही उनके काम आती हैं। अपने प्रोफ़ेशनल करियर के दौरान उनको सारी चीज़ें नए सिरे से सीखनी पड़ती हैं। ऐसे में शिक्षण संस्थाओं के उद्देश्यों पर भी सवाल उठता है कि आख़िर वे अपन लक्ष्यों को हासिल करने में कहाँ तक सफल हो रही हैं? या फिर ऐसी संस्थाओं के प्रोफ़ेसर अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए परीक्षाओं के डर, नंबर काट लेने के भय और परियोजना कार्य के माध्यम से चक्रव्यूह में उलझाने वाले हथकंडों से छात्रों के मन में भय पैदा करते हैं। इस भय से रवींद्रनाथ टैगोर की एक पंक्ति याद आती है कि जहां मन भय से मुक्त है….हमारी शिक्षण संस्थाओं को ऐसा माहौल बनाना होगा, जहाँ सृजनात्मकता को बढ़ावा मिलता हो।

ताकि हमारे शिक्षण संस्थान ऐसी जगह बन सकें जहां छात्रों के सवालों को सुना जाता हो और उनका जवाब दिया जाता हो। उनकी जिज्ञासाओं को दबाने की जगह उनको उभारने और उनको दिशा देने का प्रयास किया जाता हो ताकि छात्र और प्रोफ़ेसर दोनों साथ-साथ सीख सकें और सही दिशा में आगे बढ़ सकें। अपनी शिक्षा और अध्ययन के माध्यम से समाज के सामने मौजूद वर्तमान चुनौतियों का समाधान खोजने की दिशा में प्रयास कर सकें और हमारी शिक्षण संस्थाएं सिर्फ़ चिंतन और विचार का केंद्र भर न रहें, वहां पर जीवन की सच्चाइयों से जुड़े रहते हुए विचार के साथ-साथ समाधान की दिशा में भी एक सार्थक पहल हो सके।

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