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“पापा कहते हैं, वह पढ़ने में तुक्के लगाती है”

“बच्चों को हिंदी में पढ़ना सिखाना बहुत आसान काम है। लेकिन हिंदी में लिखना सिखाना काफी मुश्किल काम है।” यह कहना है एक शिक्षक का। उनका कहना है कि उनको ख़ुद लिखने के दौरान काफ़ी समस्याओं का समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मात्राओं की ग़लतियां होती हैं। उनकी बेटी जो अभी दूसरी कक्षा में पढ़ रही है, उसे अच्छे से हिंदी पढ़ना आता है। लेकिन हिंदी में लिखने के दौरान वह कुछ ख़ास ग़लतियां करती है जैसे ज और च को लिखने में उसे मुश्किल होती है।

‘पढ़ने के दौरान तुक्के’

इसका एक कारण तो यहां की स्थानीय भाषा का असर है, यहां पर लोग स को च बोलेते हैं और हिंदी जैसी बोली जाती है वैसी लिखी जाती है। अपनी समझ के अनुसार तो उसका लिखना काफी सहज प्रतीत होता है। लेकिन बच्ची के पापा कहते हैं, “वह पढ़ने के दौरान तुक्के लगाती है।” इससे उसके सीखने की प्रगति को लेकर उनको चिंता होती है कि वह आगे पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन कैसे कर पाएगी।

उन्होंने कहा, “हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसमें लिखना पहले और पढ़ना बाद में सीखा जाता है।” हालांकि इस बात को लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं कि पढ़ना सीखने के बाद लिखना बहुत आसानी से सिखाया जा सकता है। लेकिन वह इस बात को लेकर काफी परेशान हैं कि अपनी बेटी को अच्छी हिंदी में लिखना कैसे सिखाएं ताकि उसकी मात्राओं की ग़लती को कम से कम किया जा सके। इसके लिए कुछ हमारे बीच होने वाली बातचीत से कुछ व्यावहारिक सुझाव निकलकर सामने आए कि उसे पाठ या कोई कहानी पढ़कर सुनाया जाए और हिंदी में बात जाए ताकि इस भाषा का मौखिक अनुभव ज़्यादा हो सके।

‘वह सीख नहीं पाएगी’

उसे मात्राओं की समझ है, इसलिए सार्थक शब्दों के माध्यम से उसे मात्राओं का अभ्यास करने का मौका दिया जा सकता है और बोलकर लिखने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। और सबसे ख़ास बात उसके सामने यह न कहा जाए कि वह सीख नहीं पाएगी। क्योंकि अगर यही बात बार-बार उसके सामने दोहराई जाएगी तो उसके मन में यह बात घर कर जाएगी कि उसके लिए लिखना सीखना काफ़ी मुश्किल है।

इस बच्ची का पसंदीदा विषय हिंदी है। मगर गणित की शिक्षिका के पढ़ाने का तरीका उसे काफ़ी पसंद आता है। आज पहली बार होने वाले परिचय में उसने ढेर सारे सवाल पूछे। अपनी सारी किताबें दिखाईं। उसने पर्यावरण वाली कॉपी ख़ासतौर पर दिखाई, जिसमें उसने अच्छे-अच्छे चित्र बना रखे थे। इस विषय को लेकर उसका आत्मविश्वास कॉपी में किए गए क्लासवर्क और होमवर्क में दिखाई दे रहा था। अभी पहली कक्षा के साथ भाषा को लेकर काम करने के दौरान मिले अनुभवों से प्रतीत होता है कि शुरुआती उम्र के अनुभव भाषा के साथ सहज होने में मददगार साबित होते हैं।

‘मुझे अंग्रेजी पढ़ना सिखाओ’

चौथी कक्षा के एक बच्चे को अंग्रेजी पढ़ने की ललक है। उसने अपनी यह इच्छा मुझे बताई। चौथी क्लास की उसकी अंग्रेजी भाषा की किताब देखकर हैरानी हुई कि हमारे समय में ऐसे पाठ आठवीं कक्षा में हुआ करते थे। ऐसा लगता है जैसे राजस्थान बोर्ड की किताबें बनाते समय इस बात का ध्यान नहीं रखा गया कि यह किताब जिन बच्चों के लिए बनाई जा रही है, उनमें से बहुत से बच्चों के लिए अंग्रेजी तीसरी-चौथी भाषा है।

ऐसे में बच्चे के लिए यह पहचानना भी मुश्किल होता है कि अंग्रेजी के लेटर A का अंग्रेजी में उच्चारण कैसा होता है, उसकी आवाज़ कैसे आती है, अलग-अलग लेटर्स की आवाज़ें आपस में मिलकर कैसे कोई शब्द बनाती हैं।

इस मसले पर बच्चे के साथ होने वाले अभ्यास में एक बात समझ में आई कि सबसे पहले हम अंग्रेजी के शब्दों में आने वाले लेटर्स को कैसे बोलते हैं, इसके ऊपर काम करेंगे फिर हम उन लेटर्स की आवाज़ों को मिलाकर शब्द बनाना सीखेंगे और फिर आसान शब्दों के माध्यम से अंग्रेजी सीखने के सिलसिले को थोड़ा आगे बढ़ाएंगे। जब पढ़ना नहीं आता है तो शुरुआत तो वहीं से करनी होगी, जहां से इस सफ़र की कड़ी टूटी है।

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