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एक सवालः “जो बच्चे स्कूल आ रहे हैं, वे सीख रहे हैं क्या?”

स्कूली शिक्षा

राजस्थान के इस स्कूल में दूसरी कक्षा के बच्चे आत्मविश्वास के साथ हिंदी की किताब पढ़ते हैं।

एज्युकेशन मिरर की पिछली पोस्ट का सवाल था, “जो बच्चे स्कूल आ रहे हैं, वे सीख रहे हैं क्या?” इस सवाल के जवाब में कहा जा सकता है कि तमाम रिपोर्ट्स कहती हैं कि बच्चे सीख रहे हैं। अपनी कक्षा के स्तर तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। तो कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जो सीखने के मामले में बाकी कक्षाओं के स्तर से भी आगे हैं। मगर अफ़सोस की बात है कि किसी रिपोर्ट में ऐसे बच्चों का जिक्र नहीं होता। ऐसे शिक्षकों का जिक्र नहीं होता, जिनके कारण से बच्चों में अधिगम का स्तर इतना अच्छा हो पाता है।

अर्ली लिट्रेसी’ में इसी बात पर ध्यान केंद्रित क्या जाता है कि अगर बच्चे सही उम्र में पढ़ना-लिखना सीख लेते हैं तो उनके स्कूल नियमित आने और आगे की पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। सीखने के सवाल का जवाब सबसे पहले एक सकारात्मक उदाहरण से करते हैं क्योंकि हमारे आसपास नकारात्मक जवाबों की भरमार है।

दूसरी कक्षा के बच्चे पढ़ते हैं किताब

एक स्कूल में दूसरी कक्षा के बच्चे बड़े आत्मविश्वास के साथ किताबें पढ़ लेते हैं। आज दूसरी कक्षा के बच्चों से मिलने और उनसे बात करने का मौका मिला। पाठ को पढ़कर सुनाने की ऐसी दिलचस्पी देखकर अच्छी लगी। आने वाले दिनों में जब ये बच्चे कहानी की किताबों की दुनिया से रूबरू होंगे और पुस्तकालय की कक्षा में रोचक गतिविधियों में शामिल होंगे तो उन बच्चों में होने वाला बदलाव देखने लायक होगा। इन पंक्तियों को पढ़ते हुए, आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि क्या सभी बच्चे इसी आत्मविश्वास के साथ किताबें पढ़ पाते हैं?
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तो इसका जवाब है कि हाँ, इस कक्षा में ऐसे बच्चे भी हैं, जो वर्ण और मात्राएं तो पहचान लेते हैं और अभी पढ़ना सीख रहे हैं। लेकिन सबसे अच्छी बात है कि इस स्कूल के ‘भाषा शिक्षक’ को पूरी उम्मीद है कि वे बच्चे भी पढ़ना सीख जाएंगे। तो कहा जा सकता है कि बच्चे अगर स्कूल आते हैं, रोज़ाना स्कूल आते हैं तो वे सीखते जरूर हैं। लेकिन इसकी सबसे पहली शर्त शिक्षकों की तरफ़ से अपने काम को पूरी सक्रियता, ईमानदारी और दक्षता के साथ करना है। शिक्षकों की तरफ़ से मिलने वाला प्रोत्साहन बच्चों को आगे बढ़ने के लिए मदद करता है।
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‘बच्चे को गिनती लिखनी आती है, मगर…’

.अब बात एक ऐसे उदाहरण की जो तस्वीर के दूसरे पहलू की तरफ़ हमारा ध्यान खींचता है। एक स्कूल में दूसरी से पांचवी तक के बच्चों को पहली से सौ तक गिनती लिखना लिखना आता है। लेकिन बहुत से बच्चे ऐसे हैं जो गिनती पढ़ नहीं पाते। गणित पढ़ाने वाले शिक्षकों को पहले इस बात की ख़ुशी थी कि इन बच्चों को गिनती आती है तो फिर आगे काम करना उनके लिए आसान होगा। लेकिन कक्षा के दौरान बच्चों को लिखते हुए देखते समय शिक्षिका ने देखा कि बच्चे लिख तो पा रहे हैं। लेकिन उनको पढ़ने में दिक्कत आ रही है।

उन्होंने बच्चों के लिखने का तरीका देखा। बच्चे पहले 1 से 10 तक गिनती पहली पंक्ति में लिखते। फिर अगली पंक्ति में केवल 1 लिखते और उसके आगे 1 से 9 तक लिखकर नीचे वाली पंक्ति में 1 के बाद 2 लिखते और 0 लगाकर 20 लिखते। इस तरह से वे एक से सौ तक लिखते। गिनती लिखते समय वे एक-एक ग्यारह बोलते। जब बच्चों से शिक्षिका ने सवाल किया कि एक और एक कितने होते हैं तो कुछ बच्चों ने बड़े भरोसे के साथ कहा कि एक और एक मिलकर तो दो ही होते हैं।

‘शार्ट कट’ की ग़लती

इससे पता चलता है कि बच्चों को एक से सौ तक गिनती लिखने का जो ‘शार्ट कट’ बताया गया था। वह उनके मन में ऐसा बैठ गया कि इस ग़लती को सुधारने के लिए शिक्षक पिछले तीन महीने से जूझ रहे हैं। वे स्थिति को अभी भी सुधारने के लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हम बाकी कक्षाओं के बच्चों को एक साथ बैठकर काम नहीं कर सकते, क्योंकि अगर कोई अधिकारी आ जाए तो हम क्या जवाब देंगे। यानी स्थिति को यथास्थिति में तब्दील करने के लिए हमारी व्यवस्था की तरफ़ से शिक्षकों को मिलने वाला प्रोत्साहन भी जिम्मेदार है।
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गिनती की कहानी।

संख्या 10 में दस कहां से आया, इस सवाल के साथ बच्चों से बातचीत शुरू हुई थी।

आज जब चौथी कक्षा के बच्चों से गिनती के बारे में बात हो रही थी। तो बहुत से बच्चों को बोली गई संख्या लिखने में दिक्कत हो रही थी। यानी शिक्षिका की बात काफी हद तक सही थी। इसके बाद मैंने बच्चों को अपनी लिखी एक काल्पनिक कहानी ‘गिनतियों के गाँव में’ सुनाई। उसके बाद बच्चों से स्थानीय मान (प्लेस वैल्यू) के बारे में बात करके उनको यह समझाने का प्रयास किया कि इकाई वाले स्थान पर कम से कम शून्य और ज़्यादा से ज़्यादा 9 तक की संख्याएं साथ रह सकती हैं, इसके बाद कोई संख्या जुड़ने पर वे सभी संख्या एक साथ दहाई वाली जगह पर चली जाती हैं।

कहानी और बच्चों से बातचीत

इस बातचीत के बाद बच्चों ने इकाई वाली जगह पर संख्याओं की तरह से एक से नौ तक गिना और फिर दसवें बच्चे के शामिल होते ही दहाई वाले कोने में चले गये। यानी व्यावहारिक रूप से उनको दिखाई दिया कि दहाई वाले खाने में सारी संख्याएं एक साथ जाती हैं। व उनको एक लिखा जाता है, लेकिन वास्तव में वह एक दस ही होता है। इसीलिए 1 के दाहिनी तरफ़ ज़ीरो लिखने पर दस की संख्या बनती है, जबकि बायीं तरफ़ ज़ीरो लिखने से उस संख्या का मान एक ही होता है।
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गिनतियों के गाँव वाली कहानी में गिनतियों के घर इकाई, दहाई, सैकड़ा और हज़ार के नाम से होते हैं। जो क्रमशः बड़े होते जाते हैं। इसके बाद कुछ बच्चों ने दहाई तक की संख्याओं को बड़ी सहजता के साथ बोर्ड पर लिखा। तो कुछ बच्चों ने तो सैकड़े तक पूरे विश्वास के साथ संख्याएं लिखने की कोशिश करते हुए उनको पढ़कर बताया भी। इस कक्षा की एक बच्ची आशा ने तो हज़ार तक की एक संख्या लिखने का प्रयास किया। सबसे उम्मीद वाली बात बच्चों का प्रयास था कि वे इस सवाल का जवाब जानना चाहते थे कि संख्या (10) में दस कहाँ से आया, जबकि इसमें केवल एक और ज़ीरो ही हैं।
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