“पाँच तो एक से भी बड़ा है, फिर फर्स्ट आना क्यों जरूरी है?”
मैनपुरी जिले के शिक्षक रत्नेश कुमार ने विभाज्यता का महासूत्र एवम दशक नियम पर हिंदी और अंग्रेजी भाषा में एक किताब भी लिखी है, जिसे भारत सरकार ने कॉपीराइट रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट दिया गया जो 177 देशों में मान्य है। उन्होंने अपने बचपन के उन अनुभवों को एक डायरी के रूप में लिखा है, जिन्होंने गणित विषय और संख्याओं के साथ उनके जुड़ाव को एक मजबूत आधार दिया।
मुझे आज भी वह दिन याद है जब मैंने पहली बार विद्यालय में प्रवेश लिया था। सरस्वती शिशु मंदिर का वह छोटा-सा प्रांगण, कक्षा में रखी लकड़ी की बेंचें और नया प्रवेश लेने वाले बच्चों के बीच बातचीत की आवाज़ें। इस विद्यालय के माहौल ने मेरे भीतर चीजों को जानने की एक स्वाभाविक जिज्ञासा को जन्म दिया। मैं हर चीज़ को समझना चाहता था। क्या, कैसे और क्यों वाले प्रश्न मेरे मन में सदैव उठते और इन्हीं प्रश्नों ने मेरी सोच को एक नई दिशा दी। पढ़िए गणित विषय के शिक्षक के बचपन और गणित विषय से लगाव की कहानी उन्हीं के शब्दों में।
बचपन की जिज्ञासा
मेरा जन्म 5 जून 1983 को उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे, भोगांव में हुआ। परिवार में शिक्षा को काफी महत्व दिया जाता था। मेरे पिताजी श्री हरीराम शाक्य नेशनल इंटर कॉलेज में अंग्रेज़ी के अध्यापक थे। लेकिन उनकी गणित विषय पर भी मजबूत पकड़ थी। वे इंटर कॉलेज तक के छात्रों को गणित पढ़ाते थे और मुझे जोड़-घटाव के खेल सिखाने में विशेष रुचि लेते थे। वहीं मेरी माताजी श्रीमती शारदा देवी शाक्य कस्तूरबा गांधी बालिका इंटर कॉलेज में संगीत की शिक्षिका थीं। हमारे घर में संगीत की मधुर ध्वनियाँ गूँजती रहती थीं, जो शिक्षा के अनुशासन से मिलकर मेरे बचपन को विशेष बना देती थीं।

मुझे आज भी याद है जब पहली बार मैंने पिताजी से एक सरल, परंतु गहरा प्रश्न पूछा था। मैंने पूछा, “पाँच भी तो एक से बड़ा होता है, फिर कक्षा में प्रथम आना ही क्यों जरूरी है?” यह सवाल तब उत्पन्न हुआ जब मैं पहली कक्षा में पढ़ता था। पहले यूनिट टेस्ट में मेरा पाँचवाँ स्थान आया था। एक दिन हमारे विद्यालय के आचार्य जी मेरे घर आए।
उन्होंने माता-पिता से कहा कि यदि यह बच्चा थोड़ी और मेहनत करे तो कक्षा में पहला स्थान प्राप्त कर सकता है। यह बात मेरे लिए रहस्यमयी थी। पिताजी ने समझाया कि सबसे अधिक अंक लाने वाला विद्यार्थी प्रथम आता है। फिर क्या था, मेरी इस जिज्ञासा ने मेहनत की राह पकड़ ली। इसके बाद पहली कक्षा से पाँचवीं तक अच्छे नंबर लाना और हर वर्ष पहला स्थान प्राप्त करना मेरी आदत सी बन गई।
नवोदय विद्यालय में प्रवेश और गणित व संगीत से जुड़ाव
पाँचवीं कक्षा तक पढ़ाए जाने वाले विषयों में मेरी पकड़ मजबूत हो गई थी। लेकिन एक नई चुनौती मेरे सामने खड़ी थी, नवोदय विद्यालय में प्रवेश के लिए होने वाली परीक्षा को पास करना। हमारे स्कूल सरस्वती शिशु मंदिर में इस परीक्षा की तैयारी कराई जाती थी। मेरे पिताजी ने भी मुझे गणित और तार्किक प्रश्नों की तैयारी करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मेरी मेहनत सफल हुई और मेरा चयन जवाहर नवोदय विद्यालय भोगांव (मैनपुरी) में कक्षा-6 की पढ़ाई के लिए हो गया।
नवोदय विद्यालय का माहौल एकदम अलग था। यहाँ मैंने अनुशासन,अध्ययन,खेलकूद और संगीत का अद्भुत संतुलन अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में महसूस किया। मैं धीरे-धीरे खो-खो,कबड्डी,वॉलीबॉल, फुटबॉल और शतरंज जैसे खेलों में भाग लेने लगा। लेकिन शतरंज का खेल मुझे सबसे अधिक रोमांचित करता था। यह खेल मेरे गणितीय चिंतन (मैथमेटिकल थिंकिंग) और तर्क करने वाले मस्तिष्क के लिए मानो एक चुनौती थी। हर चाल को पहले से सोचना, भविष्य की स्थिति को समझकर रणनीति बनाना और हर मूव का विश्लेषण करना। मैं विद्यालय की शतरंज प्रतियोगिताओं में भी लगातार अव्वल आने लगा।

नवोदय में प्रवेश के बाद भी संगीत से मेरा जुड़ाव अटूट बना रहा। विद्यालय की प्रार्थना सभाओं में हारमोनियम बजाने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई,जो मेरे लिए गौरव की बात थी। यह मेरी माताजी से मिला एक अनमोल उपहार था,जिसे मैं संजोकर आगे बढ़ता रहा।
बचपन से मिले गणितीय संस्कार
शतरंज और संगीत के बीच गणित विषय सदैव मेरे जीवन का केंद्र बना रहा। जब पिताजी घर पर ट्यूशन पढ़ाते थे, तो मैं एक कोने में बैठकर उनकी शिक्षण शैली को ध्यान से देखता था। अंकों का यह संसार मुझे सम्मोहित करता था। मुझे स्पष्ट रूप से याद है, जब पहली बार पिताजी ने मुझे बताया कि शून्य का आविष्कार भारत में हुआ था,तो मैं घंटों तक हैरानी से सोचता रहा कि “कुछ नहीं” भी कुछ कैसे हो सकता है? गणित की यह गहराई मुझे मंत्रमुग्ध करने लगी।
नवोदय विद्यालय में अध्ययन करते हुए मुझे एहसास हुआ कि गणित केवल अंकों,समीकरणों या सूत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के हर क्षेत्र में विद्यमान है। खेल की रणनीतियों से लेकर संगीत की धुनों तक, समय प्रबंधन से लेकर दैनिक जीवन के निर्णयों तक—गणित हर जगह अपनी छाप छोड़ती है।
मेरे मन में हमेशा एक प्रश्न उठता था—”क्या कोई ऐसा सूत्र हो सकता है, जिससे हर गणितीय समस्या को सरलता से हल किया जा सके?” यही विचार मेरे अंदर निरंतर गूँजता रहा और मुझे गणितीय अनुसंधान की ओर प्रेरित करता रहा। बचपन की यही जिज्ञासा मुझे गणित की गहराइयों में ले गई और यही स्मृतियाँ मेरे भावी जीवन की नींव बनीं। गणित मेरे लिए मात्र एक विषय नहीं, बल्कि सोचने की एक कला, दुनिया को समझने का माध्यम और जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गई।
(लेखक रत्नेश कुमार वर्तमान समय में गणित अध्यापक के रूप में जनपद मैनपुरी मे कार्यरत हैं। गणित विषय में अपनी रुचि और स्वाध्याय के कारण वे विभिन्न नये तथ्यों को प्रकाश में लाने का प्रयास सतत करते रहते हैं।)
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