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पहली कक्षा में भाषा शिक्षण की 10 ख़ास बातें।

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प्रोफ़ेसर अग्निहोत्री कहते हैं, “ध्वनि-संरचना का जटिल संसार बच्चा स्वयं बिना किसी की मदद के सुलझा लेता है।”

प्रोफ़ेसर रमाकांत अग्निहोत्री कहते हैं, “जब हम स्कूल में बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने का प्रयास करते हैं तो अक्सर भूल जाते हैं कि हर बच्चे में भाषा सीखने की असीम क्षमता होती है।” इन पंक्तियों का जिक्र उनके आलेख ‘बच्चों की भाषा सीखने की क्षमता’ में आता है।

इस पोस्ट में हम भाषा शिक्षण की उन दस ख़ास बातों की चर्चा करेंगे जो बच्चों को पढ़ाते समय हमें ध्यान रखनी चाहिए।

सबसे पहली बात

बच्चे पढ़ने के दौरान वर्ण और मात्राओं को आपस में मिलाकर बोलते हैं। पहचाने हुए वर्ण और मात्राओं से मिलकर बनने वाले शब्दों को बच्चे पढ़ पाते हैं। अगर वे वर्ण में मात्रा लगने के बाद उसमें होने वाले बदलाव को समझ पाते हैं।

ऐसा भी हो सकता है कि बच्चे शुरुआत में हर वर्ण को अलग-अलग पढ़ने की कोशिश करें। जैसे एक को ए, क पढ़ें। इसके लिए बच्चों को वर्ण मिलाकर शब्द बनाने का मौखिक और लिखित अभ्यास करवाया जा सकता है। अभ्यास के बाद बच्चों को ख़ुद से ऐसा करने के लिए काम दिया जा सकता है और उसे करने के दौरान बच्चे के पास जाकर देखा जा सकता है कि वह ख़ुद से वर्णों को आपस में मिला पा रहा है या नहीं।

दूसरी बात

हमें कक्षा में घूमकर देखना चाहिए कहीं बच्चे केवल लिखने का काम तो नहीं कर रहे हैं, इसके लिए बच्चों से पूछा जा सकता है कि वर्णों को आपस में मिलाने पर बनने वाला शब्द क्या है? वे उसे बोलकर बताएं। अगर बच्चा नहीं बोल पाए तो उसे बोलकर बताएं। हमारे बताने का तरीका अगर प्रासेस के ऊपर केंद्रित होगा तो उससे बच्चों को समझकर सीखने में मदद मिलेगी, जिसे वे ख़ुद अभ्यास करके ज़्यादा पुख़्ता बना पाएंगे।

तीसरी ध्यान देने वाली बात है कि कुछ वर्णों में मात्राओं का प्रयोग नहीं होता है जैसे आ, ऐ, ई, ओ, औ। इनके साथ मात्राओं का ज्ञान बच्चों को नहीं करवाया जा सकता है। इसलिए मात्रा ज्ञान करवाने से पहले बच्चों को ऐसे वर्ण जरूर सिखाएं जिनके साथ बच्चे मात्राओं का आसानी से प्रयोग कर सकें।

चौथी गौर करने वाली बात है कि बहुत से बच्चों के लिए वर्णों को लिखना बहुत आसान सी बात होती है क्योंकि वे आकृतियों को बड़ी आसानी से पहचान पाते हैं। लेकिन हर बच्चे को वर्ण लिखने में सहूलियत हो, इसके लिए वर्ण लिखने का तरीका (स्ट्रोक्स बनाना) बता सकते हैं। इससे उनको लिखने का एक तरीका मालूम हो जाएगा। इसके बाद बच्चा स्वयं अपने लिखने का तरीका खोज सकता है।

पांचवी मगर सबसे ध्यान देने वाली बात, “भाषा की कक्षा में बच्चों को अपनी भाषा में अभिव्यक्ति का ज्यादा से ज्यादा मौका दें। हर बच्चे को यह अवसर मिले इस बात का विशेष ध्यान रखें और कक्षा के तीन-चार बच्चों की आवाज़ को पूरी क्लास की आवाज़ न समझें।”

हर बच्चे के सीखने की रफ्तार अलग होती है

छठीं बात में हम आपका ध्यान इस बात पर दिलाना चाहते हैं कि हर बच्चे के भाषा सीखने की गति अलग-अलग होती है। इस नज़रिये से हर बच्चे को मिलने वाला सपोर्ट भी अलग-अलग स्तर का होगा। इसलिए हर बच्चे की कॉपी चेक करें। इससे आपको यह जानने में मदद मिलेगी कि किस बच्चे को कहां पर सपोर्ट की जरूरत है।

सातवीं बात यह कि हमें पहली कक्षा के बच्चों को अपने घर की भाषा में संवाद करने का मौका देना चाहिए। इससे वे क्लास में सहज महसूस करेंगे। भाषा कालांश के दौरान अगर कोई निर्देश बच्चों को समझ में नहीं आता है तो आप बच्चों के घर की भाषा में उनसे बात करें। इससे बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ता है और वे क्लास में सहज महसूस करते हैं।

आठवीं बात: वर्णों की पहचान के लिए एक या दो वर्णों पर लगातार काम करें। जिन वर्णों या अक्षरों की बनावट एक जैसी हो उनके पढ़ाने में थोड़ा अंतराल रखें। बच्चों को एक साथ पूरी वर्णमाला रटाने की कोशिश न करें, इससे बच्चों को वर्णों की पहचान में समस्या हो सकती है। हर वर्ण एक आवाज़ का प्रतीक है। इसलिए वर्णों को लिखने का अभ्यास करवाते समय वर्णों का सही उच्चारण करें। इससे बच्चों को वह वर्ण पहचानने में आसानी होगी।

नौवीं बात: पहली-दूसरी के बच्चों को मात्रा सिखाते समय, एक मात्रा पर दो-तीन दिन लगातार काम करें। ताकि बच्चे मात्रा लगने के बाद वर्ण की आवाज़ में होने वाले बदलाव को समझ सकें। मात्राएं सिखाने का सही तरीका है कि बच्चों को पहले मात्राओं के प्रतीक बताएं और उसकी आवाज़ से परिचित कराएं। इसके बाद किसी वर्ण के साथ मात्रा लगाकर उसकी आवाज़ में होने वाले बदलाव के बारे में बच्चों से पूछें जैसे क में ई की मात्रा लगने के बाद हो गया की, इसके बाद की में मात्रा हटाकर बताएं कि ये है ‘क’। इसके बाद आप बच्चों को ख़ुद से जवाब देने के लिए कह सकते हैं। हर बच्चे के साथ व्यक्तिगत तौर पर इस तरह की प्रक्रिया अपनाने से बच्चा आसानी से मात्राओं का इस्तेमाल करना सीख पाएगा। इससे बच्चों को बारहखड़ी रटने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

और आखिर में

अगर हम पहली कक्षा के बच्चों को हिंदी पढ़ाते समय सुनकर समझने की क्षमता विकसित करने का मौका देना जरूरी है। इससे आगे जाकर बच्चों को बोलने और पढ़ने में मदद मिलती है। इसके लिए बच्चों को कहानी सुनायी जा सकती है। कहानी सुनाने के बाद इसके मूल संदेश को बच्चों की भाषा में भी बताया जा सकता है। इससे बच्चों को भाषा सीखने के आनंद से जुड़े रहने का मौका मिलता है। बालगीत और कविताओं के इस्तेमाल से भाषा कालांश की रोचकता और सार्थकता बढ़ जाती है, इसलिए भाषा शिक्षक को चाहिए कि इनका भरपूर इस्तेमाल करें।

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