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बेहतर समय प्रबंधन से शिक्षण को प्रभावशाली कैसे बनाएं?

सीखने की प्रक्रिया, बच्चों से बातचीत, शिक्षा में बातचीत की भूमिका, भारत में प्राथमिक शिक्षा, एजुकेशन मिररकिसी भी विषय के कालांश में समय बचाने के लिए पहले दिन से रूल सेटिंग का काम कर सकते हैं। हम बच्चों में ऐसी आदतें विकसित कर सकते हैं जिससे कालांश के समय का काफी अच्छे से उपयोग किया जा सके।

उदाहरण के लिए एक सरकारी स्कूल में शिक्षक के पास पहली, दूसरी और तीसरी कक्षा की जिम्मेदारी थी। बच्चों की कुल संख्या 115 थी। पहली कक्षा में 40 से ज्यादा बच्चे थे। ऐसे में वे कालांश को ज्यादा बेहतर ढंग से संचालित करने के लिए कक्षा के ज्यादातर बच्चों की भागीदारी सुनिश्चित करते थे।

बच्चों की भागीदारी का तरीका

एक बच्चे के पास सबको नोटबुक देने की जिम्मेदारी थी। दूसरा बच्चा पेंसिल और रबर इत्यादि देता था। वहीं तीसरा बच्चा सभी बच्चों को किताबें देता था। इससे शिक्षक का काफी समय बच जाता था और वे बच्चों को पढ़ाने के ऊपर ध्यान दे पाते थे। बच्चों के पास जिम्मेदारी होने के नाते क्लास का माहौल तुलनात्मक रूप से शांत होता था। वहां बहुत ज्यादा शोरगुल नहीं होता था। इस तरह के माहौल के कारण बच्चों में लीडरशिप के गुणों का विकास संभव हुआ।

इस कक्षा के बच्चों का आत्मविश्वास बाकी बच्चों की तुलना में ज्यादा है। वे अन्य बच्चों का पढ़ाई में सहयोग करते हैं। क्योंकि शिक्षक की तरफ से सहयोग करने वाली प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया गया। क्योंकि शिक्षक जानते थे कि सारे बच्चों तक पहुंचना उनके लिए संभव नहीं है। ऐसे में बच्चों की भागीदारी बढ़ाने और उनको स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर देने के अलावा उनके पास ज्यादा विकल्प नहीं थे। क्योंकि पहली से आठवीं तक के स्कूल में मात्र पांच शिक्षक ही थे।

शिक्षण के लिए क्लास से पूर्व तैयारी करें

ज्यादातर सरकारी स्कूलों में स्टाफ की कमी और संसाधनों का अभाव है, यह एक वास्तविक सच्चाई है जिससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है। मगर बच्चों की पढ़ाई का काम भी ऐसा है, जिसे भविष्य के लिए टाला नहीं जा सकता है। बतौर शिक्षक आप यह नहीं कह सकते हैं कि हम स्कूल में सभी बच्चों को तब पढ़ाएंगे जब स्टाफ पूरा हो जाएगा। या संसाधन पूरे हो जाएंगे। मानवीय संसाधन जरूरी है, मगर जो मानवीय संसाधन हमारे पास है, उसका विवेकपूर्ण ढंग से इस्तेमाल करना भी जरूरी है।

ऐसे स्कूल भी हैं, जहां पर पर्याप्त स्टाफ होने के बावजूद बच्चों के अधिगम का अपेक्षित स्तर काफी कम है। इसलिए जरूरी नहीं हैं कि संसाधन होने से पढ़ाई की गुणवत्ता और बच्चों के अधिगम में अपेक्षित सुधार हो ही जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि ऐसे शिक्षक जो स्कूल में मौजूद हैं उनका कितना समय बच्चों को मिल पा रहा है। शिक्षक क्लास में कितनी तैयारी के साथ जा रहे हैं, बच्चों को किन क्षेत्रों में सपोर्ट करना है, इस बात की कितने अच्छे से पहचान कर पा रहे हैं। यानि सारा मामला क्लास से पूर्व तैयारी का है।

क्लास के बाद उसके अनुभवों पर विचार करने और अगली क्लास में ज्यादा व्यवस्थित और बेहतर ढंग से बच्चों को पढ़ाने का है ताकि बच्चों में विभिन्न तरह की अवधारणाओं (कांसेप्ट) का निर्माण हो सके। बच्चों को कांसेप्ट काफी अच्छे से याद भी रहते हैं क्योंकि वे व्यावहारिक अनुभवों से जुड़े होते हैं। उदाहरण के तौर पर अदर किसी बच्चे को मात्रा का कांसेप्ट समझ में आ जाए तो फिर उसे बारहखड़ी रटने की जरूरत नहीं होगी। अगर किसी बच्चे को टेंस का कांसेप्ट समझ में आ जाए तो उसे हिंदी से अंग्रेजी में ट्रांसलेशन करते समय उतनी ज्यादा चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

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