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इंग्लिश मीडियम की बैंड बजाने आ रही है – हिन्दी मीडियम !

hindi-mediumआजकल शिक्षा के बाज़ार में ‘मीडियम’ ही बिकता है। यह एक सच्चाई है। मगर इस ,सच्चाई के साथ जीना कैसा होता है, इसकी एक झलक दिखाई देती है इरफ़ान ख़ान की आगामी फ़िल्म ‘हिंदी मीडियम’ के एक ट्रेलर में।

सच्ची घटनाओं पर आधारित इस  वाक्य के साथ शुरू होता है फ़िल्म हिंदी मीडियम का ट्रेलर। इसमें इंग्लिश मीडियम स्कूल में दाख़िले के लिए माता-पिता अपनी बेटी के साथ बैठे होते हैं। काऊंटर के दूसरी तरफ़ से आवाज़ आती है, “वी आर वेरी ब्लेस्ड टू हैव ‘पिया‘ ऐज़ अवर डॉटर…।”

इस वाक्य को सुनने के बाद अभिभावक की भूमिका में इरफ़ान और सबा कमर हैरानी के साथ एक दूसरे का चेहरा देखते हैं। जबकि लड़की सामने वाली डेस्क पर बैठे इंग्लिश में बोलने वाले व्यक्ति को बिना पलक झपकाए निहार रही होती है।

‘सरकारी स्कूल में जाएगी तो…’

इसके बाद पिता की भूमिका निभा रहे इरफ़ान कहते हैं, “क्या बात है सर, क्या बात है सर, ये बात है। पहचान में नहीं आ रही है कि हमारी बच्ची है कि किसी और की बच्ची है।” अज़नबी भाषा से सामना होने पर बच्चों की क्या हालत होती है, इस पर यह एक बेहद सटीक टिप्पणी है।

ट्रेलर के एक संवाद में सबा कमर कहती हैं, “सरकारी स्कूल में जाएगी तो कुछ नहीं सीख पाएगी। कोई अंग्रेजी में बात करेगा तो उसकी रूह कांप जाएगी। फ़िट नहीं हो पाएगी सोसायटी में तो डिप्रेस हो जाएगी….अगर उसने ड्रग्स लेना शुरू कर दिया तो।”

सरकारी स्कूल के बारे में इस टिप्पणी को सुनकर सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों और वहां पढ़ने के लिए अपने बच्चों को भेजने वाले अध्यापकों को जरूर धक्का लगेगा। इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है। यह सरकारी स्कूलों की छवि पर एक प्रत्यक्ष हमले जैसा ही है।

इरफ़ान अभिनीत नई फ़िल्म ‘हिंदी मीडियम’ के इस ट्रेलर पर लक्ष्मी शरण शर्मा लिखते हैं, ” इंग्लिश मीडियम की बैंड बजाने आ रही है – हिन्दी मीडियम ! 12 मई को रिलीज हो रही इरफान की नई फिल्म का ट्रेलर।” इस ट्रेलर में इरफान खान एक डायलॉग बोलते हैं- इंग्लिश एक जुबान नहीं एक क्लास है, टुडे इंडिया इज इंग्लिश एंड इंग्लिश इज इंडिया।

इस फ़िल्म का ट्रेलर हिंदी और अंग्रेजी मीडियम के द्वंद में उलझे अभिभावकों की परेशानी को बयान करता है। इस बहाने मीडियम को लेकर फ़ेसबुक पर होने वाली बहस पर एक नज़र डालते हैं।

अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम में पढ़ा रहे हैं

राजेंद्र गुप्ता जी फे़सबुक पर लिखते हैं, “हिंदी मीडियम के बच्चे अंग्रेजी को लेकर अक्सर एक जुमला बोला करते थे — टम टमाटर टम, टमाटर खाएं हम, अंग्रेज के बच्चे क्या जाने, अंग्रेजी जाने हम। भले ही हम बच्चे अंग्रेजी में फिसड्डी रह गए, लेकिन जीने की कला बखूबी सीखी हमने, क्योंकि अंग्रेजी जानने की अकड नहीं थी हममें। जहां तक एक भाषा की बात हो तो ठीक, लेकिन यदि वह भाषा अहंकार पैदा करे, नौकरी की बैसाखी बन जाए, मौलिक चिंतन से दूर ले जाए तो ऐसी भाषा की ऐसी की तैसी।”

बच्चे की भाषा में हो पढ़ाई, मीडियम और मैसेज की लड़ाई, भारत में प्राथमिक शिक्षावे आगे लिखते हैं, “सरकार की नीतियों ने नौकरी को प्राथमिकता की सूची में शीर्ष पर ला दिया, वर्ना हमारे यहां तो कहावत थी— उत्तम खेती, मध्यम बान (व्यापार), करे चाकरी कुकर निदान। उनकी (मैकाले) शिक्षा नीति नौकर पैदा करने के लिए ही थी और आज वे सफल हुए क्योंकि हर जगह नौकरी की ही मारा मारी है। अंग्रेजों के देश में ऐसा कोई विज्ञापन नहीं मिलेगा जिसमें लिखा हो कि हिंदी हो अच्छी, तो नौकरी पक्की। हालांकि परदेस खासकर जर्मनी में संस्कृत के ज्ञाताओं की मांग बढ रही है। उन्हें पता है कि ज्ञान का खजाना इसी में है, बाकी तो सब छूछै है।”

साहित्य और सिनेगा पर अपनी अलहदा राय रखने वाले पत्रकार रंगनाथ सिंह लिखते हैं, “एक ज़माने में बहुत सारे छोटे-बड़े मठाधीश हिन्दी-हिन्दी रो कर अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम में पढ़ाते रहे. पिछले कुछ सालों में कुछ लोग भोजपुरी-अवधी-मगही-मैथिली रो-रो कर अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम में पढ़ा रहे हैं. इसे किस तरह लिया या दिया जाए….या क्या कहा या सुना जाए… #जानेभीदोयारों”

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