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भाषा में सृजन की अनंत संभावनाएं हैं!

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भाषा के रचनात्मक इस्तेमाल का एक उदाहरण यह भी है।

एक बच्चे के रूप में हमारे संवाद की शुरूआत ‘घर की भाषा’ में होती है। घर की यही भाषा हमारे सपनों की भाषा भी होती है विद्यालय में जाने और अन्य लोगों के साथ संपर्क में आने के बाद एक बच्चे के शब्द भण्डार में वृद्धि होती है। वह किसी बात को अभिव्यक्त करने के अनगिनत तरीकों से रूबरू होता है।

इसके साथ ही बच्चा नई भाषा भी सीखता है और घर की भाषा के नियमों का इस्तेमाल नई भाषा को सीखने के लिए स्वाभाविक ढंग से करना सीखता है। मनोविज्ञान में भाषा और संचार का अध्ययन भी किया जाता है।

पढ़िएः बहुभाषिकता का महत्व क्या है?

मूर्त और अमूर्त विचारों की अभिव्यक्ति का जरिया है भाषा

11वीं कक्षा के लिए मनोविज्ञान की एनसीईआरटी की किताब के अनुसार, “भाषा के उपोग की योग्यता मनुष्य को दूसरे प्राणियों से अलग करती है। भाषा के जरिये हम स्वयं से और दूसरे लोगों के साथ बातचीत करते हैं। भाषा प्रतीकों की एक व्यवस्था है, जिसका उपयोग हम एक-दूसरे के साथ संचार के समय करते हैं। रोज़मर्रा के जीवन में दिखाई देने वाली चीज़ों के अलावा अमूर्त विचारों जैसे सौंदर्य एवं न्याय को व्यक्त करने में भी भाषा हमारी मदद करती है।”

‘भाषिक सार्वभौम’ क्या है?

भारत के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे।

सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे अपना लिखा हुआ दिखाते हुए।

सभी मानव भाषाओं की सामान्य विशेषताओं को ‘भाषिक सार्वभौम’ के नाम से जाना जाता है। जैसे सभी भाषाओं में अभिव्यक्ति की मूल इकाई वाक्य होते हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण किसी एक भाषा की समझ से दूसरी भाषाओं को सीखने में मदद मिलती है। एक भाषा का दूसरी भाषा में अनुवाद करने में मदद मिलती है।

भाषाओं की अपनी ध्वनि और प्रतीक होते हैं, जो वस्तुओं, घटनाओं, विश्वासों, इच्छाओं, रूझानों से जुड़े होते हैं। ये प्रतीक अर्थ को दूसरों तक पहुंचाते हैं। हालांकि इन प्रतीकों तथा इसके अर्थों के बीच अनिवार्य रूप से जुड़ाव हो, यह भी जरूरी नहीं है। समय और परिस्थिति के अनुरूप इसमें बदलाव होते रहते हैं।

भाषा एक सृजनशील प्रक्रिया है

बच्चे पढ़ना कैसे सीखते हैं, पठन कौशल, पढ़ना है समझनाभाषा एक अत्यंत सृजनशील प्रक्रिया  है। उदाहरण के लिए, आप उस वाक्य को भी समझ जाते हैं, जिसको पहले कभी आपने न देखा न सुना था। इसके साथ ही आप ऐसे अनोखे वाक्य बोल या लिख सकते हैं, जिसको आपने पहले सुना ही नहीं था।

भाषा की इस सृजनात्मकता को अनंत उत्पादनशीलता कहा जाता है। यह व्यक्ति की उस योग्यता को व्यक्त करती है, जिससे वह सीमित नियमों एवं शब्दों की सहायता से असीमित अर्थवान वाक्यों का सृजन कर सकता है।

हमारे लेखन और विचार प्रक्रिया पर लोगों से संवाद और पढ़ने का भी गहरा असर पड़ता है। इसलिए भाषा के संदर्भ में इसके महत्व को भी कम करके नहीं देखा जाना चाहिए। अगली पोस्ट में भाषा के अन्य पहलुओं की चर्चा करते हैं     —-

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