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बच्चों के साथ संवादः “भारी बस्ता और भरी कापियां”

बच्चे पढ़ना कैसे सीखते हैं, पठन कौशल, पढ़ना है समझना

“और आज स्कूल में तुमने क्या किया?”

“बातें”

हाथ धोते वक्त मिनी ने झट से मुस्कुरा कर बस एक शब्द कहा। यह सुनकर माँ को थोड़ा आश्चर्य महसूस हुआ।

थकी हुई मिनी को माँ ने आदत डाली थी कि स्कूल से आते ही वह दिन भर की घटनाएँ ज्यों कि त्यों माँ को सुनाये। धीमे से  स्वर में कपडे बदलते हुए या खाना खाते वक़्त रोज़ तो मिनी आकर हर पीरियड के बारे में विस्तार से बताती थी। मैडम के साडी के रंग से लेकर, सर ने सन्डे को बालो में डाई करी भी है या नहीं, यह सब भी बता देती। हालांकि इन सब बातों से माँ को कुछ ख़ास अंदाजा नहीं लगता था कि स्कूल में क्या हो रहा है। लेकिन जब उस पूरी बात में पढाई के कुछ  शब्द उनके कान में पड़ते तो वह समझती की स्कूल में सब ठीक चल रहा है।

इसके अलावा दोपहर को जब मिनी सो जाती तो कापी में मिले होमवर्क और मिनी की सब बातों में कुछ मेल देखा करती, तब उसे पूरी  तसल्ली हो जाती की स्कूल में पढाई लिखाई का माहौल तो है।

मिनी अब मौन थी, उसने हाथ धोकर कपडे बदले और आँगन में चटाई बिछा कर खाने के लिए  बैठ गयी। वहीँ दूसरी ओर माँ उस शांति से व्याकुल हो रही थी।

खाने के दो निवाले जो मिनी के गले से नीचे उतरे, उसने बिना सांस लिए बातों की झड़ी लगा दी।

बच्चों के अवलोकन

“नीमा मैडम के जाने के बाद ना माँ, उनकी जगह हमारे एक नए सर आये हैं। वो मुझसे बहुत सारी बातें करते हैं। हाँ पर वो सिर्फ मुझसे नहीं, सब से बातें करते हैं। वो दूसरी बेंच वाला सचिन है ना माँ, जो कभी कुछ नहीं बोलता, सर उससे भी बातें करते हैं। और तो और, सचिन भी उनसे उतनी ही बातें करता हैं। आज तो उन्होनों सुनीता को भी बोलना सिखा दिया। पता है सुनीता का घर कहाँ है? उसके दादा के भी दादा जी हुबली के पास के एक गाँव से आये थे। नए सर बता रहे थे की हुबली कर्नाटक का एक बड़ा शहर है। विजयनगर के राजा ने वहां बहुत से सुन्दर मंदिर बनवाये। वहां न एक झील भी है, कुछ उन्कल नाम बताया था उन्होंने। वह हमारी झील से भी बहुत पुरानी है। सुनीता यह भी कह रही थी कि तब उसके घर वालों को यहाँ की भाषा नहीं आती थी, पर अब उनके घर के सब लोग गढ़वाली जानते हैं । वैसे तो सुनीता को चैसू पसंद है पर उसके यहाँ ज्यादातर दिन में सांभर और भात खाते हैं। उसको अपने पापा के हाथ का साम्भर ज्यादा अच्छा लगता है।”

ये कहते ही मिनी ने राजमा की थाल बेमन से आगे खिसका दी ।

“तुम भी कभी सांभर बनाओ ना, नए सर कह रहे थे उसमें दाल के साथ बहुत सारी सब्जियां भी डाली जाती है और वह स्वादिष्ट बनता है।”

“बनाउंगी- बनाउंगी कभी। अभी मेरा दिमाग न खा। कबसे खाना ठंडा हो रहा है चल झटपट खा। । तेरी बातें तो खत्म होने का नाम ही न ले रही।”

“तुम तो मुझे जब देखो तब चुप करा देती हो। पूरी बात भी नहीं करने देती हो। लेकिन नए सर ऐसा कुछ भी नहीं कहते। वो किसी से नहीं कहते कि चुप हो जाओ। वो सब बच्चों की बातें सुनते हैं । उनकी कक्षा में हमें कॉपी पेन की भी ज़रूरत नहीं पड़ती, बस बातें करनी होती हैं, खूब सारी। आज जब मैं शीतल को अपनी झगुली के बारे में बता रही थी, जो तुमने इस रविवार बिट्टू दीदी की शादी के लिए दिलाई थी ना। तब पीछे बैठा रोहित और उसके दोस्त हंस रहे थे। उनको समझ ही नहीं आया की मैं क्या कह रही हूँ।

पर फिर नए सर ने मेरी बात सुनी और वो मुस्कुराने लगे। उनको तो झगुली के बारे में भी मालूम है। वो कहते की इसे अंग्रेजी में फ्रॉक कहते हैं और यह शब्द जर्मन भाषा से आया हुआ है। ऋतु ने जब नए सर से पूछा की उनको इतना सब कैसे मालूम है?”

तब उन्होंने बोला, “बातें कर के।”

‘मैं बाते करके ही सब सीख गयी तो’

“माँ कितना अच्छा है ना, अगर मैं बाते करके ही सब सीख गयी तो फिर किताबों की ज़रूरत ही नहीं होगी। फिर तो क्या तुम भी पढ़ी लिखी हो जाओगी ना, हमारी कुछ मैडम जी जैसे? अबसे मैं तुमसे वो सारी बातें करुँगी जो नए सर मुझसे कक्षा में करते हैं ।”

“अच्छा चुप कर! नौनी इतक्या नि बोल्दी (लडकियों को इतना नहीं बोलना चाहिए)। गप्पे लगा के कोई बड़ा न बना आज तक छोरी ।जल्दी खा कर सोजा थोड़ी देर। फिर शाम को कॉपी निकाल कर काम करने बैठ जाना ।”

मिनी की इतनी सारी बातें सुन कर माँ को कुछ समझ नहीं आ रहा था। चहकती मिनी को देखकर उसे अच्छा तो लगा पर आज उसने किसी पाठ की बात नहीं करी, बस नए सर-नए सर का ही जाप जप रही थी। जब माँ ने मिनी की सामाजिक विज्ञान की कॉपी खोली तो वह भी खाली पड़ी हुई थी, सिर्फ आज की तारीख और पाठ 2-विविधता नाम का शीर्षक पड़ा हुआ था। कोरी कॉपी देख माँ को लगा व्यर्थ ही हो गया आज का दिन।

इससे अच्छा तो आज मिनी घास ही काटने चलती!

एक ग्रामीण क्षेत्र में बच्चे अगर घर आते ही पुस्तक में लीन हो जाए और कॉपी में लिखने लगे तो उन्हें पढने लिखने वाला माना जाने लगता है। माता पिता को भी लगता है कि बच्चा पढ़ रहा है और कुछ न कुछ तो बन ही जाएगा। पन्ने पलट के जब अभिभावक कापी देखते हैं तो उनको तसल्ली देने के लिए बस भरे हुए पन्ने और लाल सिहाई से कुछ टिक के निशान ही काफी हैं।

स्कूल में अगर किसी दिन बच्चा न जाए तो एक चिंतित और सचेत माता पिता का मकसद एक ही होता है, कि उसका काम पूरा हो जाए। कॉपी में शिक्षक ने जो कुछ भी लिखाया, वो हु-ब-हू बच्चे की कॉपी में भी उतर जाये।

“अजी मेरा बेटा तो स्कूल से आते ही लिखने बैठ जाता है।”

“न जाने ये क्या लिखते रहते हैं, बहुत पढाई है आज कल तो।”

अक्सर अभिभावको से बात करने में कुछ ऐसी बातें सुनने में आती हैं।

‘पढ़ना, लिखे हुए को देखकर उतारना और इसकी तसल्ली”

लेकिन सवाल ये है कि असल में वो क्या पढ़ रहा है? या बस केवल उतार रहा है? सोचने की बात यह है की उतार लेने भर से ही अभिभावकों को इस बात की तसल्ली क्यों हो जाती है की स्कूल में पढाई हो रही है और उनका बच्चा सब कुछ सीख रहा है? जबकि एक बछा सिर्फ लिखने भर से ही नहीं सीखता। उसका सीखना तो उसके परिवेश से शुरू होता जाता है और क्या ज्ञान कक्षा दर कक्षा नहीं बढता परन्तु उसके अपने परिवेश में घुलने मिलने और समझ विक्सित करने से सृजित होता है।

किताबों और कापियों में लिखी बहुत सारी बातें एक कक्षा से ऊपर की कक्षा में ज्यादातर नहीं जा पाती फिर भी ऐसा माना जाता है कि भारी बस्ता और भरी कापियां ही पढ़ा हुआ होने का एक मुख्य परिचय कराती हैं। हम कितनी सुंदर लेखनी में कापियां भर ले, पर उसके कोई मायने नहीं अगर उसकी एक समझ न बन पायें । हैरानी की बात यह है कि अब बच्चे भी इसी ढर्रे में रम चुकें हैं । स्कूल में अक्सर वो शिक्षक के आगे पीछे “काम दो, काम चेक कर लीजिए” आदि कहते घूमते रहते हैं ।

उनका उद्देश्य काम को समझना नहीं बल्कि उसको एक सुंदर लिखाई में ज्यों का त्यों उतार कर किसी तरह से शिक्षक से एक गुड पाने तक रह गया है। शिक्षक द्वारा दी गए गुड या अच्छी टिपण्णी भी एक प्रोत्साहन का जरिया कम और अन्य छात्रों के सामने इतराने का एक माध्यम बन गए हैं।

लेकिन आज मिनी में, स्कूल से घर आने के बाद एक अलग उत्साह था। वह उत्साह उसकी बातों में दिख रहा था। घर लौटते ही रोज़ जो उसके लिए एक यांत्रिक प्रक्रिया थी कि माँ को सब बताना, उस प्रक्रिया में आज कुछ जोश था। उसके पास नई नई बातें और नए सर के किस्से तो थे ही, साथ साथ वह सब बताने की एक नयी सी चाह भी थी।

‘कोरी कॉपी देखकर हुई हैरानी’

स्कूल में बच्चे कई प्रकार के संवाद करते हैं, पर वह सारे उस प्रकार से घर में खुल नहीं पाते क्योंकि घर में उस संवाद का उद्देश्य कुछ और ही होता है। बच्चों में इतनी समझ विकसित हो जाती है कि उन्हें कौन सी बात बतानी है और कौन सी नहीं । लेकिन आज स्कूल में हुई बातें वैसे के वैसे ही घर में खुल पायीं क्योंकि वो कहीं न कहीं कक्षा में हुए औपचारिक संवाद का एक हिस्सा थी और शिक्षक की एक गतिविधि से जुडी हुई थी ।

मिनी की माँ को कोरी कॉपी देखकर कुछ हैरानी तो ज़रूर हुई। कई बार शिक्षा व्यवस्था को एक जटिल नियम कायदे के दायरे में सीमित कर दिया जाता है जिससे शिक्षक और बच्चों में खुल कर ज्यादा संवाद की ना ही ज्यादा जगह होती है और कई बार इसे बहुत अच्छा नहीं माना जाता । माँ को मिनी का ज्यादा बात करना पसंद भी नहीं आया, न ही नए सर का गप्पे लडाना । शायद उसे अगर होमवर्क मिला होता तो माँ को नए सर की कक्षा अच्छी लगती। कहने को तो मिनी की कॉपी में बस शीर्षक था पाठ 2- “विविधता” पर नए सर की बातों ने ही बच्चों को विविध तरह की जानकारी दे डाली थी ।

कक्षा में संवाद का महत्व

कभी न बोलने वाली सुनीता से बुलवाने के अलावा, पूरी कक्षा हुबली तक की सैर कर आयी। एक तरफ उन्होंने दक्षिण भारत से सांभर और गढ़वाल से चैसू का स्वाद समझा। वहीं दूसरी ओर बातों ही बातों में उनकी चर्चा फ्रॉक से उनके विभिन्न नाम और उद्भव तक जा पहुंची। दरअसल कक्षा में विविधता की बात तो हो रही थी, बस बिना पाठ पढ़े और कॉपी भरे। चर्चा ने तो भोजन, भाषा, कपडे, झीलों और राजा तक को अछूता न छोड़ा। सोचने की बात यह है, कि मिनी और शायद कुछ और बच्चो को यहाँ अनौपचारिक रूप से घटित कक्षा का संवाद याद रहा होगा और साथ ही साथ उसमें चर्चा करे गए सन्दर्भ भी ।

कक्षा में संवाद और उसके तरीके न सिर्फ बच्चों के साथ विषय को खोलते हैं बल्कि उनकी रूचि को भी जगाते हैं। नए सर का आना विद्यालय में न सिर्फ एक नये शिक्षक को लेकर आया, वह लाया शिक्षा के नये तरीकों को भी। जिसमे बच्चे केवल संवाद ही नहीं कर रहे, उसके साथ साथ वो चर्चा कर रहे हैं नए विषयों की। वे न सिर्फ बोलना सीख रहे हैं, पर वह सीख रहे हैं अपने सहपाठियों को सुनना और उनसे सीखना। पाठ्य पुस्तकों में दीये गए पाठों का उद्देश्य यह नहीं होता कि विद्यार्थियों को उसमे दी हुए सारी चीज़े पता होनी चाहिए। बल्कि कोई भी टॉपिक अवसर देता है कि उस चर्चा को विस्तृत रूप से न केवल कक्षा में खोला जाए बल्कि बच्चे को उस विषय के बारे में सीखने हेतु अपने परिवेश में भी भरपूर अवसर प्रदान हों। राष्ट्रीय पाठचर्या- 2005 स्वयं या कहती है, “ पाठ्यचर्या का इस प्रकार सम्वर्धन हो कि वह बच्चों को चहुँमुखी विकास के अवसर मुहैय्या करवाए बजाय इसके कि वह पाठ्यपुस्तक- केन्द्रित बन कर रह जाये।”

सामाजिक विज्ञान का एक विषय के रूप में लक्ष्य है कि मनुष्यों और समाज में मौजूद मानव समूहों की एक सम्मान्य और समीक्षात्मक समझ विकसित करना। कक्षा कक्ष में किए गए संवाद जब विषय से सम्बंधित और सरल होते है तो न केवल बच्चे की रूचि बढती है, पर साथ ही साथ  वह उस विषय और चर्चा के बारे में स्कूल के बाहर भी विचार करता है। ज्ञान केवल पुस्तकों तक ही सीमित नहीं है, परन्तु इसकी रचना एक निरंतर प्रक्रिया है, जिसका रास्ता  कक्षा से स्कूल के आंगन तक, आँगन से गेट के बाहर तक और फिर घर व समुदाय के बीच तक जाता है।

रही बात नए सर की, तो ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि आने वाले हफ्ते में नए सर शायद पुस्तक को नहीं खोलेगें और माँ और बाकी अभिभावकों की बेचैनी भी बढ़ रही होगी कि स्कूल है या गप्पे लड़ाने का अखाड़ा। पर सोचने वाली बात यह भी है, कि क्या उस शिक्षा के मायने है जो भरी कॉपी और भारी बस्ते से तो लदी हुई हैं, जिससे  बच्चों में बोलने का उत्साह तक न रह जाए और कक्षा में हो रही पढाई के एक यांत्रिक प्रणाली के रूप में ही बन कर रह जाए।

(परिचयः लेखिका क्रतिका वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन से समबद्ध हैं। उन्होंने बच्चों के साथ होने वाले संवाद को जीवंतता के साथ इस लेख में प्रस्तुत किया है।

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अब्बास शाह
अब्बास शाह
6 years ago

लेखपढकरमनकोबड़ाशूकूनमिलाबच्चोसेकक्षामेसंवादउनकीपढाईमेबड़ासहायकहै

Durga thakre
Durga thakre
6 years ago

बहुत खूब मैंम । प्रेरणादायक लेख ।
शिक्षा में बदलाव आवश्यक है । ऐसे शिक्षक ही बच्चों के मन से भारी बस्ते का बोझ कम कर सकते हैं ।

Nivedita Negi
Nivedita Negi
6 years ago

बहुत ही सुंदर लेख। काश ऐसे सर हमारे सभी स्कूल में हों। आज की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए ऐसे ही शिक्षकों की ज़रूरत है।

Education Mirror
Reply to  Nivedita Negi
6 years ago

बहुत-बहुत शुक्रिया निवेदिता जी। इस लेख को हमारे बीच में लाने के लिए क्रतिका जी का शुक्रिया कि उन्होंने इस महत्वपूर्ण पहलू की तरफ हम सबका ध्यान दिलाया।

Anonymous
Anonymous
6 years ago

बेहद खुबसूरत आलेख , आलेख को संवेदनशीलता की चाशनी में जो आपनें डुबोया है उससे आलेख और भी स्वादिष्ट [रोमांचकारी] हो जाता है l नयें शिक्षक नें विविधता की कक्षा में संवाद के अनुप्रयोग सराहनीय हैं . संवाद कक्षा में अभिव्यक्ति को खोलते ही हैं साथ ही साथ अवधारणा को और भी गहराई से बच्चों के दिल में समाहित होते जाते हैं .

Aman Ali
Aman Ali
6 years ago

बहुत ही ज़रूरी आर्टिकल है ये। आज के समय में ये ज़रूरी है की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव आये और ये बदलाव अगर ग्रामीण क्षेत्र से आता है तो और भी कारीगर होगा। लेखक को हार्दिक शुभकामनाये।

Anonymous
Anonymous
6 years ago

बहुत खूबसूरत लिखा है कृतिका ने …!! बहुत संवेदनशील आलेख…

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