Trending

शिक्षक इंटरव्यू सिरीज़ः ‘मैंने पिता से गणित विषय से प्रेम करना और हिन्दी शिक्षक से लिखने का हुनर सीखा’

एजुकेशन मिरर की ‘शिक्षक इंटरव्यु सिरीज़’ का उद्देश्य शिक्षकों के संघर्ष, जिजीविषा, नेतृत्व, जूझने और सीखने की ऐसी कहानियों को सामने लाना है जो सच में प्रेरित करने वाली हैं। शिक्षक के पेशे के प्रति नई उम्मीद जगाती हैं। शिक्षकों को वास्तविक नेतृत्वकर्ता के रूप में देखती हैं, जो नेपथ्य में भी नेतृत्व की असीम संभावनाओं का निर्माण करते हैं।

WhatsApp Image 2020-04-05 at 1.29.09 AM

इंटरव्यु सिरीज़ की तीसरी कड़ी में पढ़िए दिल्ली के शिक्षक राजेश कुमार ठाकुर से एजुकेशन मिरर की बातचीत। डॉ. राजेश कुमार ठाकुर वर्तमान में राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय , रोहिणी , सेक्टर 16 दिल्ली -110089 में बतौर शिक्षक काम कर रहे हैं।

आपकी गणित विषय पर 60 पुस्तकें , 500 गणितीय लेख, 400 से अधिक ब्लॉग व 10 रिसर्च पेपर प्रकाशित हो चुके हैं। शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर लेखन और चिंतन आपकी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा है।

एजुकेशन मिररः आपका बचपन कहाँ बीता और उन दिनों को आप कैसे याद करते हैं?

राजेश कुमार ठाकुरः मैं एक साधारण परिवार में बिहार के भागलपुर में पैदा हुआ और पिता जी के नौकरी के बाद मैं भगैया (झारखंड) में उनके साथ चला गया जहाँ मेरा पूरा बचपन बीता. पहले के बचपन में चुहलबाजी थी. मस्ती थी जो आजकल खो गयी है. पहले बच्चे अपने माँ- बाप के अलावा आस पड़ोस के बड़े बुजुर्ग से भी डरते थे, पुरा समाज उनके लिए एक शुभचिंतक था पर आज बच्चे माँ- बाप के पकड़ से दूर होते जा रहे हैं.

एजुकेशन मिररः स्कूली दिनों की कोई ख़ास घटना जो किसी शिक्षक या बच्चों से जुड़ी हुई हो अबतक आपको याद आती हो?

राजेश कुमार ठाकुरः हां, मैं बचपन में काफी शरारती था. पढाई में अव्वल होने की वजह से अपने दोस्तों में प्रिय था और मेरे दोस्त ही दोपहर को मेरे नाश्ते का प्रबंध करते थे. मेरे कक्षा में एक छात्र संदीप था जिसके मिठाई की दुकान थी मैं परीक्षा में उसे सारे वस्तुनिष्ठ प्रश्न बता देता था और पुरे साल जब मन करे मुफ्त में उसके दुकान पर मिठाई और नाश्ता मिलता था. यही हाल मेरे मित्र कन्हैया का था. हम दोनों की दोस्ती बड़ी गहरी थी. स्कुल दिनों में कक्षा 6 में हमें अंग्रेजी बोलने की इच्छा हुई और मैंने और मेरे मित्र संतोष ने कक्षा 6 से टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलना जो शुरू किया वो कॉलेज तक अनवरत जारी रहा .

एजुकेशन मिररः आपके बचपन के दिनों में पाठ्य पुस्तकों के अलावा किस तरह की सामग्री आपको पढ़ने के लिए मिलती थी? अभी बच्चों को किस तरह का अवसर मिल रहा है, इस बारे में अपने अनुभव बताएं।

राजेश कुमार ठाकुरः मेरे पिता श्री परमानंद ठाकुर को पुस्तकों से बड़ा लगाव था और उस समय गीताप्रेस की कई धार्मिक किताबें, विज्ञान प्रगति और अविष्कार जैसी पत्रिका हर महीने में मेरे घर आती थीं. गीता मैंने तीसरी कक्षा से पढ़नी शुरू की. लिखने-पढ़ने की रूचि विज्ञान प्रगति से शुरू हुई. आजकल की तरह टेलीविजन तो था नहीं और ना ही मोबाइल इसलिए अपनी सारी जानकारी के लिए पुस्तकों को पढ़ना पड़ता था. आज छात्र गूगल के भरोसे हैं, किताब की जगह ई-बुक ने ली है, मेहनत से दूर होते जा रहे हैं. पहले प्रश्न का उत्तर लिखने के लिए भी मेहनत करनी पड़ती थी अब तो बने-बनाये नोट्स मिल जाते हैं और इस कारण छात्र पढाई से दूर होते जा रहे हैं.

याद आते हैं हिन्दी पढ़ाने वाले शिक्षक

लाइब्रेरी के माध्यम से पढ़ने की आदत को प्रोत्साहित किया जा सकता है।

बच्चों में पढ़ने की आदत का विकास करने के लिए लाइब्रेरी जरूरी हैं।

एजुकेशन मिररः स्कूली दिनों के कोई शिक्षक जिनके पढ़ाने का तरीका आपको बेहद पसंद आया हो? उनके साथ जुड़ी कोई रोचक घटना साझा करें।

राजेश कुमार ठाकुरः मुझे श्री परशुराम यादव जी का हिंदी पढ़ाने का तरीका बेहद पसंद था. वो एक कविता को समझाने के लिए उनसे जुड़े प्रसंग. कई-कई किताबों पर जानकारी देकर पढ़ाई में रोचकता ला देते. हिंदी की बारीकियां मैंने उनसे ही सीखी. मेरे लेखन में आने का श्रेय मैं अपने पिता की प्रेरणा के साथ-साथ अपने शिक्षक श्री परशुराम जी को दूंगा. शब्दों की गहराई, वाक्यों का सामंजस्य और तारतम्यता सब उनकी देन है.

WhatsApp Image 2020-05-07 at 2.00.23 AM

अपने गुरू परशुराम यादव जी के साथ।

एजुकेशन मिररः अक्सर कहा जाता है कि हमारा प्रिय विषय वही होता है जिसे हमारे प्रिय शिक्षक या फेवरेट टीचर पढ़ा रहे होते हैं। इस विचार को लेकर क्या कहना चाहेंगे?

राजेश कुमार ठाकुरः शिक्षक का प्रभाव आपके विषय पर जरुर पड़ता है. मेरे पिताजी मुझे गणित की इतनी बारीकियां समझाते थे, अपने से कई साल आगे की कक्षा की गणित पुस्तक पढ़कर मेरे अंदर उन्होंने गणित से प्रेम करना सिखा दिया और इसी का नतीजा है की मैंने अपनी 60 से अधिक पुस्तक गणित पर ही लिखीं।

एजुकेशन मिररः आपके मन में शिक्षक बनने का विचार कब आया? क्या इस विचार के पीछे किसी शिक्षक की प्रेरणा थी या इस क्षेत्र में जॉब की संभावनाओं ने आपको क़दम बढ़ाने के लिए प्रेरित किया?

राजेश कुमार ठाकुरः मैं शिक्षक बनना तो चाह नहीं रहा था. 1997 में IIT कानपूर में एमएससी में परीक्षा पास करने के बावजूद पारिवारिक स्थिति के कारण दाख़िला नहीं ले पाया तो मन टूट गया और फिर दिशा भटक दिल्ली विश्वविधालय से ऑपरेशन रिसर्च किया और फिर प्राइवेट कंपनी में नौकरी. घर वाले सरकारी नौकरी चाहते थे उम्र भी बढ़ रही थी इसलिए फिर टीचर ट्रेनिंग की और शिक्षक बन गया.

शिक्षण का पहला अनुभव

एजुकेशन मिररः जब आपको पहली बार किसी स्कूल में पढ़ाने का मौका मिला तो आपके कैसे अनुभव रहे?

राजेश कुमार ठाकुरः मैंने अपनी नौकरी सरकारी विद्यालय से शुरू की और यहाँ अक्सर गरीब और माध्यम वर्ग के छात्र आते हैं जिन्हें एक योग्य शिक्षक की जरूरत है। क्योंकि निजी स्कूलों में छात्रों के पास अपार सम्भावनाये हैं. वो अच्छी किताबे, ट्यूशन का खर्च उठा सकते है पर सरकारी विद्यालय में कई छात्रों के पास दोनों समय खाने के पैसे नहीं होते और वो अपने परिवार की मदद सब्जी बेच, दुकान में नौकरी कर, छोटे-मोटे रोजगार के साथ करते हैं। इसलिये एक सरकारी अध्यापक का दायित्व अधिक है और सबको इसे ईमानदारी से निभाना चाहिए पर होता विपरीत है, सरकारी नौकरी के बाद उदासीनता घर कर जाती है और कुछेक अपने दायित्वों से विमुख हो जाते हैं. मैंने करीब 400 निजी स्कूलों में शिक्षकों और छात्रों को अलग- अलग विषयों पर संवोधित किया और ये दावे के साथ कह सकता हूँ की सरकारी विद्यालयों में अगर छात्रों को मौका दिया जाए और उनके सामने विपन्नता ना हो तो ये छात्र भी किसी से कम नहीं हैं।

एजुकेशन मिररः शुरूआती दिनों में शिक्षण के दौरान किस तरह की चुनौतियां आपके सामने आयीं और आपने कैसे उनका समाधान किया?

राजेश कुमार ठाकुरः मैंने ख़ुद सरकारी विद्यालयों में एक ग्रामीण क्षेत्र में पढाई की है. मेरा विद्यालय वन प्रवासी उच्च विद्यालय पहाड़ों के बीच बसा था जिसमे आदिवासी छात्र भी पढ़ते थे और चुनौतियाँ देखकर ही बढे इसलिए शिक्षक बनने के बाद कोई परेशानी नहीं हुई.

एजुकेशन मिररः आपके अनुसार शिक्षा के क्या-क्या उद्देश्य हो सकते हैं? शिक्षा किसी बच्चे को जीवन के लिए कैसे तैयार करती है?

राजेश कुमार ठाकुरः शिक्षा का अर्थ छात्र को चुनौतियों के लिए तैयार करना है सफलता और असफलता को समान रूप से प्यार करने के लिए प्रेरित करना है. ज्ञान को अंक की तराजू में नही तौल सकते पर आज सबकुछ अंको तक सिमट गया है जिसे सामाजिक और मानवीय स्तर पर दूर करने की जरूरत है.

एजुकेशन मिररः शिक्षा मनोविज्ञान के सिद्धांत और व्यवहार में आपने कैसे सामंजस्य स्थापित किया? भावी शिक्षकों के लिए आप क्या सुझाव देंगे?

राजेश कुमार ठाकुरः शिक्षक होना एक जिम्मेदारी का कार्य है. मैं भावी शिक्षकों से इतना ही कहूँगा की अपने विषय पर उनकी पकड़ अच्छी होनी जरूरी है. विषय के साथ , विषय के बाहर और सीखने की भूख नही मरने देने की प्रवृति को जागरूक करने की जरूरत है. आप हमेशा एक छात्र रहें क्योंकि तभी आपके अंदर खोजी प्रवृति पैदा होगी.

‘गणित से साथ इतिहास पढ़ने की चाह रही अधूरी’

एजुकेशन मिररः स्कूलों में होने वाली परीक्षा को आप किस नज़र से देखते हैं? क्या स्कूलों में परीक्षा के तरीके में बदलाव होना चाहिए?

राजेश कुमार ठाकुरः परीक्षा का सतत मुल्यांकन हो जिसमे छात्र की योग्यता सिर्फ अंकों में नही तौली जाये. मैं भारतीय परीक्षा प्रणाली से अधिक खुश नही हूँ क्योंकि यहाँ स्वतंत्रता नहीं है. विदेशों में आप गणित के साथ म्यूजिक और मनोविज्ञान भी पढ़ सकते है। पर यहाँ गणित के साथ आपको भौतिकी और रसायनशास्त्र पढना पड़ेगा. मुझे गणित के साथ बी एस सी में भौतिकी और रसायन नही पढ़ना था बल्कि इतिहास पढ़ना था, मेरे जैसे कई लोगो को इच्छा के विरुद्ध विषय पढ़ना पड़ा होगा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 इन विसंगतियों को दूर करेगी।

WhatsApp Image 2020-05-07 at 2.00.22 AM

एजुकेशन मिररः नंबरों के भूत का जो आतंक हर बच्चे और अभिभावक पर हावी है एक शिक्षक के पढ़ाने के तरीके, योजना और काम को कैसे प्रभावित करता है?

राजेश कुमार ठाकुरः आजकल ये अंको की बीमारी सी हो गयी है. जैसे आपकी सम्पत्ति आपके मित्रों और चिर परिचितों में आपकी शान पैदा करता है। वैसे ही आपके अंक आपके माँ-बाप , परिवार के सर को ऊँचा उठाने में मदद करता है.

मैं तो कई ऐसे लोगों को जानता हूँ जो दोयम दर्जे के कॉलेज से पढ़े , अच्छे अंक भी नही थे पर काफी सफल रहे. आजकल अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों से निकली बीमारी जहाँ LKG में भी 90% अंक उस समय दे दिए जाते हैं जब आपको अच्छे से गिनती भी नहीं आती इसकी जड़ को गहरा करता है. फिर आजकल सभी बोर्ड में अंको को देने की बारिश होती है जो अच्छी बात नहीं है.

आधुनिक शिक्षा में अंको का खेल ऐसा मायाजाल बन गयी है जिसमे अभिभावक, छात्र, कोचिंग, स्कूल और तमाम बोर्ड अंको की बारिश में भींगकर मदमस्त होना चाहती है और इस उहापोह में वास्तविक शिक्षा खो रही है क्योंकि शिक्षा ज्ञान का साधन नही अंक का पैमाना बन गया है जो कमजोर छात्रों को हतोत्साहित कर रही है

एजुकेशन मिररः अभी तीसरी कक्षा से बच्चों के लिए गाइड्स और पासबुक आ रही हैं? इसको एक शिक्षक के रूप में आप कैसे देखते हैं? क्या इनका असर क्लासरूम में होने वाली पढ़ाई और बच्चों के सोचने-समझने की क्षमता पर पड़ा है?

राजेश कुमार ठाकुरः इन गाइड्स ने बच्चों की कल्पनाशीलता पर कुठाराघात किया है. आज अधिकांश छात्र उतना नही लिख पाते जितना आप उनसे अपेक्षा करते है. इसमें शिक्षक का भी दोष है जो सारा काम गाइड से करने को बढ़ावा देते हैं. गाइड लिखने वाले के पास कोई अनुभव नही होता , इसकी भाषा भी कोई वैज्ञानिक नही है और ना ही ये क्रियाशीलता और कल्पनाशीलता की दृष्टि से सही है पर आजकल रेडीमेड का जमाना है सबको पका-पकाया चाहिए और इसलिए इनका बाजार फल-फूल रहा है.

मेरी पसंदीदा किताबें

एजुकेशन मिररः बतौर शिक्षक आपकी पसंदीदा किताबें कौन-कौन सी हैं?

राजेश कुमार ठाकुरः मैं शिक्षक होने के साथ-साथ एक लेखक भी हूँ. लेखन मेरी आमदनी का एक हिस्सा है. आज देश के कई सौ स्कूलों में, दर्जनों विश्वविधालय में व्याख्यान दे चुका हूँ, इसलिए किताबों का काफी संग्रह है मेरे पास। पर इनमे अधिकांशतः गणित और इनके इतिहास से सम्बंधित, गणितज्ञों और वैज्ञानिकों की जीवनी है जिन्हें मैं रोज़ पढ़ता हूँ।

एजुकेशन मिररः एक शिक्षक के रूप में खुद को अपडेट रखने के लिए आप किन-किन माध्यमों का इस्तेमाल करते हैं? (जैसे वेबसाइट्स, पत्रिका इत्यादि, नाम शेयर करें।)

राजेश कुमार ठाकुरः मैं कई गणितीय संस्थाओं से जुड़ा हूँ इनके जर्नल, वेबिनार, में श्रोता और वक्ता के रूप में जुड़ता हूँ. शिक्षकों के लिए – विज्ञान प्रगति, अविष्कार, वैज्ञानिक , टीचर प्लस, मैथमेटिक्स टुडे, विज्ञान आपके लिए, राईट एंगल, ड्रीम 2047 जैसी पत्रिका, विकिपीडिया और मैकतुइटर, वोल्फ्राम जैसे वेबसाइट्स काफी जरूरी हैं।

(शिक्षा से संबंधित लेख, विश्लेषण और समसामयिक चर्चा के लिए आप एजुकेशन मिरर को फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो कर सकते हैं। एजुकेशन मिरर के यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करने के लिए यहां क्लिक करें। एजुकेशन मिरर अब टेलीग्राम पर भी उपलब्ध है। यहां क्लिक करके आप सब्सक्राइब कर सकते हैं। एजुकेशन मिरर के लिए अपनी स्टोरी/लेख भेजें Whatsapp: 9076578600 पर, Email: educationmirrors@gmail.com पर।)

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

4 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
योगेश कुमार सिंह

एक महान गणितज्ञ की कई विशेषताएं समेटे हुए हैं आप। छात्र कल्याण के निमित्त शुभकामनाएं।

Satyendra Satyarthi

बहुत सारगर्भित और महत्त्वपूर्ण लेख

Durga thakre

देश के विभिन्न राज्यों ,क्षेत्रों के शिक्षकों के कार्यों ,हुनर अन्य गतिविधियों के इस लेख में राजेश ठाकुर जी के बारे में पढ़कर प्रसन्नता हुई ।

राजेश जी, आपके बारे में जानकर प्रसन्नता हुई ।
ईश्वर आपको आशीष दें।।

4
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x