पुस्तक चर्चा: ‘फिलॉसफी इन प्रेक्टिस’ पुस्तक की ख़ास बातें

‘Philosophy in Practice’ एक व्यावहारिक दर्शनशास्त्र की पुस्तक है। इसके लेखक हैं अडम मॉर्टन। यह पुस्तक दर्शनशास्त्र को केवल सिद्धांतों तक सीमित न रखते हुए, इसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जोड़ती है। यह पुस्तक उन विद्यार्थियों और पाठकों के लिए उपयोगी है जो दर्शन को न केवल एक अकादमिक विषय के रूप में, बल्कि एक जीवंत, प्रासंगिक और उपयोगी रूप से ‘सोचने की एक शैली’ के रूप में समझना चाहते हैं।
यह पुस्तक मुख्य रूप से दर्शन के चार प्रमुख क्षेत्रों – ज्ञानमीमांसा (epistemology), तर्कशास्त्र (logic), नैतिकता (ethics), और अस्तित्व संबंधी प्रश्नों (metaphysics) – को व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत करती है। इससे दर्शन की जटिल अवधारणाओं को स्वयं से सोचकर, तर्क करके और संवाद के माध्यम से समझ में मदद मिलती। इस पुस्तक में अनेक गतिविधियाँ, सोचने के लिए सवाल और केस स्टोरी दी गई हैं।
दर्शन ‘एक सोचने की शैली’ है
मॉर्टन दर्शन को ‘सोचने की एक शैली’के रूप में देखते हैं। यानि यह एक ऐसा अभ्यास है जो किसी निश्चित उत्तर की अपेक्षा नहीं करता। बल्कि हमारे सोचने की प्रक्रिया को स्पष्ट और गहन बनाता है। मॉर्टन दिखाते हैं कि दर्शन का विषय केवल पुराने दार्शनिकों के विचारों को पढ़ने तक सीमित नहीं है। बल्कि यह निर्णय लेने, अपनी नैतिक दुविधाओं को समझने और विचारों की समालोचना करने का एक सशक्त माध्यम है।
यह पुस्तक हमें खुद से प्रश्न पूछने और उनके उत्तर खोजने के लिए प्रेरित करती है। उदाहरण के लिए, “क्या हमें हमेशा सच बोलना चाहिए?”, “क्या जानवरों के भी अधिकार होते हैं?”,”क्या हम किसी चीज को तब भी जान सकते हैं जब हम गलत भी हो सकते हैं?” ऐसे सवाल हमें सोचने पर मजबूर करते हैं।’Philosophy in Practice’ किताब में लेखक जटिल विचारों को सरल भाषा में इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कि दर्शन की पढ़ाई एक रोचक और बौद्धिक अभ्यास बन जाती है। यह पुस्तक उन सभी के लिए उपयोगी है जो जीवन, नैतिकता, ज्ञान और वास्तविक जीवन के गहरे प्रश्नों पर विचार करना चाहते हैं। इस किताब का प्रकाशन Blackwell Publishing ने किया है।
अडम मॉर्टन की पुस्तक ‘Philosophy in Practice’ के 10 मुख्य बिंदु:
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दर्शन एक अभ्यास है, न कि केवल सिद्धांतों का अध्ययन – यह पुस्तक दर्शन को एक व्यावहारिक सोचने की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करती है, जिसमें तर्क, विश्लेषण और आत्ममंथन शामिल हैं।
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प्रश्न पूछना दर्शन की शुरुआत है – लेखक मानते हैं कि अच्छे दार्शनिक बनने के लिए पहले हमें अच्छे प्रश्न पूछना आना चाहिए, जैसे – “क्या हमें हमेशा नैतिक होना चाहिए?”, “ज्ञान क्या है?”, आदि।
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तर्क और विवेक की शक्ति पर ज़ोर – पुस्तक में तर्कशक्ति (reasoning) और तार्किक विश्लेषण (logical analysis) को चिंतन की आधारशिला बताया गया है।
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ज्ञान की प्रकृति पर चर्चा – इसमें यह विचार किया गया है कि हम कैसे जानते हैं कि कुछ सच है? और क्या हमारे विश्वास ज्ञान कहलाने योग्य हैं?
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नैतिक निर्णयों की जटिलता – नैतिकता के अध्यायों में लेखक यह दिखाते हैं कि सही और गलत का निर्णय लेना कितना कठिन हो सकता है और इसके लिए सोच-समझकर तर्क करना ज़रूरी है।
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स्वतंत्रता और जिम्मेदारी का संबंध – पुस्तक में व्यक्ति की आज़ादी और उसके कार्यों की नैतिक जिम्मेदारी पर गहन चर्चा की गई है।
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आत्मा, अस्तित्व और पहचान के प्रश्न – “मैं कौन हूँ?”, “क्या आत्मा होती है?”, जैसे दार्शनिक प्रश्नों को व्यावहारिक उदाहरणों से समझाया गया है।
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दर्शन संवाद से विकसित होता है – यह पुस्तक पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि बहस, संवाद और गतिविधियों में भाग लेने के लिए भी आमंत्रित करती है।
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सोचने की शैली विकसित करना – लेखक का ज़ोर है कि दर्शन का अध्ययन व्यक्ति की सोचने की शैली को परिष्कृत और गहरा बनाता है।
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दर्शन का जीवन से सीधा संबंध – पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि दर्शन केवल क्लासरूम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रोज़मर्रा के निर्णयों, रिश्तों, और सामाजिक मुद्दों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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