भारत में ‘पढ़ने की संस्कृति’ को प्रोत्साहन कैसे दें?

पुस्तकालय के एक प्रशिक्षण में प्रतिभागियों ने अपनी पसंद की किताबों का नाम बताते हुए प्रतिभागियों ने महात्मा गाँधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’, गिजूभाई बधेका के दिवास्वपन, मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘बड़े भाईसाहब’, ईदगाह, गोदान, लायब्रेरी लायन, महाश्वेता देवी की ‘दबंग गाय’, रिक्की, खिचड़ी, पंचतंत्र की कहानियां, दो बैलों की कथा इत्यादि का जिक्र किया। इससे पढ़ने के प्रति उनके रुझान का एक पता चलता है।
हम सभी इस बात से सहमत होंगे कि भारत की संस्कृति मूलतः मौखिक संस्कृति रही है। बहुत सी लोक कहानियां, कविताएं, खेल और ज्ञान की बातें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक माध्यम से पहुंचती रही हैं। हमारे समाज में किताबें समाज के कुछ तबके तक ही सीमित रही है। लेकिन अब यह दायरा अपना स्वाभाविक विस्तार पा रहा है। पढ़ने की संस्कृति किसी समाज में कितनी रची-बसी है इसके ऊपर ही बच्चों को पढ़ने के लिए मिलने वाले अवसर और स्कूल व पाठ्यपुस्तक के अलावा कुछ पढ़ने के बारे में विचारों का निर्माण होता है।
पढ़ने की संस्कृति की प्रमुख बाधाएं क्या हैं?
आमतौर पर अभिभावक अपने बच्चों को पाठ्यपुस्तक के अलावा अन्य पुस्तकें नहीं पढ़ने देते और चाहते हैं कि हमारा बच्चा परीक्षा में सबसे ज्यादा नंबर लाए और क्लास में नंबर-1 रहे।। अन्य पुस्तकें पढ़ने पर उनको पाठ्यपुस्तक पढ़ने की तरफ लेकर आते हैं। संक्षेप में कहें तो जिन किताबों को पढ़ने से नंबर नहीं मिलते, उसको पढ़ने से हतोत्साहित किया जा सकता है। वहीं हमारे शिक्षक साथियों का पूरा ध्यान सिर्फ इस बात पर होता है कि पाठ्यक्रम समय से पूरा हो जाये, लेकिन बहुत से स्कूल और शिक्षक ऐसे भी हैं जिन्होंने लाइब्रेरी को अपने विद्यालय की दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बना दिया है। वे खुद किताबें पढ़ते हैं, बच्चों को कहानियां और कविताएं सुनाते हैं और पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यह बदलाव पढ़ने की संस्कृति के मजबूत होती बुनियाद का संकेत हैं।
अधिकांश लोग पढ़ाई को नौकरी से जोड़ते हैं। वे चाहते हैं कि बच्चे वही पढ़ें,जिससे कामयाबी मिले। इसलिए अभिभावकों द्वारा कोर्स की चीज़ों को ज्यादा से ज्यादा पढ़ने का दबाव बच्चों पर बनाया जाता है और यह प्रक्रिया स्कूल से लेकर कॉलेज शुरु करने तक भी जारी रहती है। अगर बच्चों के माता-पिता पढ़ाई को केवल पास-फेल का माध्यम समझेंगे, विद्यालय में किताबें आलमारी में बंद रहेंगी और शिक्षक केवल अपने विषय के लिए निर्धारित कोर्स की किताबें पढ़ाने पर ही केंद्रित रहेंगे तो पढ़ने की संस्कृति के निर्माण की प्रक्रिया भी बाधित होती है।

अब कुछ सवालों की बात करते हैं जो आमतौर पर पढ़ने की संस्कृति पर विचार करते समय हमारे सामने आते हैं जैसे बच्चों के सवालों पर बड़ों का जवाब क्या होता है? बड़े बच्चों के सवालों को कैसे देखते हैं? आम अनुभव के आधार पर हम कह सकते हैं कि बड़े बच्चों की बात ध्यान से नहीं सुनते हैं। बच्चे अगर कुछ प्रश्न करते हैं और उनका जवाब अभिभावकों के पास न हो तो बच्चों को डांट भी पड़ती है कि अरे! ये क्या बात कर रहे हो, फालतू के सवाल करते हो। तो क्या हमारे समाज में बच्चों के सवाल पूछने की संस्कृति है? उम्मीद है कि अबतक की बातचीत से पुस्तक संस्कृति या पढ़ने की संस्कृति को लेकर एक साझी समझ बनी होगी।
हमारे देश में पठन की संस्कृति अत्यंत विविधतापूर्ण है, जिसे इसकी बहुभाषी समाज व्यवस्था, मौखिक परंपराएं, शैक्षिक प्रणाली और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं ने आकार दिया है। भारत का साहित्यिक इतिहास अत्यंत समृद्ध रहा है—प्राचीन ग्रंथों और रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्यों से लेकर क्षेत्रीय लोककथाओं और आधुनिक साहित्य तक। फिर भी, औपचारिक शिक्षा के बाहर, स्वतंत्र और आनंद के लिए पढ़ने की आदत अभी भी विकसित हो रही है, विशेष रूप से ग्रामीण और संसाधन-विहीन क्षेत्रों में।
पाठ्यपुस्तक और परीक्षा केन्द्रित पढ़ना
भारत के अधिकांश हिस्सों में पढ़ना मुख्यतः शैक्षिक उद्देश्य से किया जाता है। इसका केंद्र बिंदु परीक्षा पास करने के लिए पाठ्यपुस्तकों का अध्ययन होता है, न कि जिज्ञासा या आनंद के लिए पढ़ना।
मौखिक परंपराओं का वर्चस्व
ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में मौखिक रूप से कहानी सुनाने की परंपरा आज भी जीवित है।
पुस्तकालयों की वर्तमान स्थिति
भारत के अधिकांश सरकारी विद्यालयों में पाठ्यपुस्तक के अलावा पुस्तकालय की किताबें मौजूद हैं। कुछ पुस्तकालय को बहुत सक्रिय हैं और अन्य को सक्रिय करने प्रयास जारी हैं। वहां किताबों का संग्रह तो मौजूद है लेकिन योजना बनाकर इन किताबों का लेन-देने और विद्यालय में पढ़ने का समय तय करके उनका सक्रिय इस्तेमाल नहीं हो रहा है। ऐसे माहौल में पुस्तकालयों को सक्रिय बनाने के लिए हमें मिलकर प्रयास करने होंगे।
विभिन्न राज्यों में भी पुस्तकालय के सक्रियता की स्थिति अलग-अलग है। ऐसे में हमें मिशन मोड में पढ़ने की संस्कृति को प्रोत्साहित करना होगा, तभी हम भारत में पढ़ने की संस्कृति को बड़े स्तर पर प्रोत्साहित कर पाएंगे। इसके लिए विद्यालय के साथ-साथ समुदाय में भी किताबों की पहुंच को प्रोत्साहन देने की जरूरत है।
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