Trending

‘सीखना केवल निर्धारित समय में पाठ्यक्रम पूरा करना भर नहीं है’ – जया प्रभा महतो

सांस्कृतिक गतिविधियाँ बच्चों के समग्र विकास की वह कुंजी हैं, जो उनके व्यक्तित्व को आत्मविश्वास, रचनात्मकता, नेतृत्व और मूल्यों से समृद्ध करती हैं।एजुकेशन मिरर के लिए इस अनुभव को राँची से शिक्षिका जया प्रभा महतो ने लिखा है।  

कल्चरल कनेक्टके मायने 

कल्चरल कनेक्टकार्यक्रम में विद्यालय की सभी सहशैक्षिक गतिविधियों को एक साझा मंच पर करने को प्रोत्साहित किया जाता है। जब मैंकल्चरल कनेक्टके तीन दिनों के सघन अनुभवों को याद करती हूँ, तो मेरा मन गर्व, आश्चर्य और गहन आत्मचिंतन से भर जाता है।

यह केवल एक वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रम भर नहीं था, बल्कि एक ऐसा अनुभव था जिसने मुझे हमारे विद्यार्थियों की छिपी हुई प्रतिभा, सामूहिकता की भावना और आत्मनिर्भरता को प्रत्यक्ष रूप से देखने का मौका दिया।

कल्चरल कनेक्टका हिन्दी में अर्थ हैसांस्कृतिक जुड़ावयासांस्कृतिक संबंध विभिन्न संस्कृतियों के बीच आपसी समझ, संवाद, सम्मान और सहयोग को बढ़ावा देने के प्रयासों को सांस्कृतिक जुड़ाव की गतिविधि के रूप में देखा जाता है। यह अवधारणा लोगों और समुदायों (वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों) को सांस्कृतिक रूप से एकदूसरे के करीब लाने और सांस्कृतिक समझ का आदानप्रदान कने को सुगम बनाने से जुड़ी है।

यह कार्यक्रम राँची के जिला शिक्षा अधीक्षक (DSE Ranchi)की एक प्रेरणादायक पहल थी। इसमें सभी विद्यालयों को SA-2 की परीक्षाओं के बाद छात्रों के लिए एक रचनात्मक मंच प्रदान करना था। इस तीन दिवसीय सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत वार्षिक उत्सव के रूप में आयोजित किया गया। हमारे समस्त स्टाफ मे मिलकर नवीन आरक्षी विद्यालय मेंकल्चरल कनेक्टकार्यक्रम को पूरे उत्साह, तैयारी और समर्पण के साथ मनाया।

मासूमियत से सामाजिक चेतना तक

पहले दिन के कार्यक्रम की शुरुआत के.जी. और कक्षा 1 के बच्चों के फैंसी ड्रेस शो से हुई। बच्चों ने फल, सब्जियाँ, जानवर और मोबाइल फोन, डस्टबिन जैसी वस्तुओं के रूप में सजधज कर रैंप वॉक किया।

बच्चों ने जिस तरह पूरे आत्मविश्वास से मंच पर आकर अपने किरदार को निभाया और संवाद बोले जैसेमैं सेव हूँ, मुझे खाओ और स्वस्थ रहो”,“मैं डस्टबिन हूँ, मुझेमें कूड़ा डालो बच्चों की इस प्रस्तुति ने सभी का दिल जीत लिया।

यहाँ एक ग़ौर करने वाली बात है कि ये मंचन मनोरंजक होने के साथसाथ एक सामाजिक संदेश को भी अपने आप में समेटे हुए थे। इससे यही पता चला कि अगर छोटे बच्चों को मंच मिले तो वे तल्लीनता के साथ विभिन्न भूमिकाओं को खुशीखुशी निभाते हैं।

इसके बाद कक्षा 5वीं से 8वीं तक के छात्रछात्राओं द्वारा प्रस्तुत नाटक ऐसी सामाजिकसमस्याओं पर आधारित थे, जो हमारे आसपास दिखाई देती हैं। कक्षा 5वीं ने अशिक्षा, कक्षा 6 ने मानव तस्करी, कक्षा 7 ने नशा मुक्ति और कक्षा 8वीं ने डायन प्रथा पर अपने नाटक प्रस्तुत किए। बच्चों ने अपनी प्रस्तुति के माध्यम से इन मुद्दों पर गहरी संवेदना और समझ दिखाते हुए दर्शकों को झकझोर दिया।

मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि इतनी कम उम्र में भी ये बच्चे कितनी गंभीरता और भावनात्मक गहराई से अपने संवाद बोल सकते हैं। उनके प्रदर्शन से मुझे भी यकीन हो गया कि किताबों से ज्यादा सीख बच्चों को मंचन के अवसरों से मिलती है।

लोक संस्कृति की रंगबिरंगी झलक

दूसरे दिन का कार्यक्रम भारतीय लोकनृत्यों की झलकियों से सजा था। बच्चों ने महाराष्ट्र की लावणी, गुजरात के गरबा, झारखंड के नागपुरी और संथाली नृत्य की प्रस्तुति दी।

इसमें सबसे खास बात यह रही कि बच्चों ने अपनी पूरी प्रस्तुतिनृत्य के चुनाव, कोरियोग्राफी, वेशभूषा और श्रृंगार जैसे सभी काम स्वयं से किए।

इसके लिए तो अलग से कोई पैसे इकट्ठे किए गए और ही किसी बाहरी व्यवस्था का सहारा लिया गया।

मैंने निजी विद्यालयों में 10 वर्षों तक कार्य किया है, जहाँ हर वार्षिक उत्सव में परिधान के नाम अभिभावकों से अतिरिक्त शुल्क लिए जाते हैं और वो पोशाकें कभी दोबारा उपयोग भी नहीं होतीं। वहीं पिछले 9 वर्षों से मैं सरकारी विद्यालय में कार्यरत हूँ, और मैंने यहाँ देखा कि हमारे सरकारी स्कूल के बच्चे सीमित साधनों में भी अपनी प्रतिभा से कमाल कर सकते हैं। इन बच्चों ने स्वयं ही अपनी पारंपरिक वेशभूषा तैयार की, गीतों के अनुसार श्रृंगार किया और पूरे मनोयोग से नृत्य प्रस्तुत किया। यह आत्मनिर्भरता और टीम वर्क का बेहतरीन उदाहरण था।

अभिव्यक्ति, बौद्धिकता और सम्मान

तीसरे दिन “Ranchi Speaks” कार्यक्रम के अंतर्गत छात्रों ने महिला सशक्तिकरण, होली एवं ईद पर्व जैसे विषयों पर अपने विचार बड़ी स्पष्टता और आत्मविश्वास से प्रस्तुत किए।

यह देखकर हर्ष हुआ कि हमारी युवा पीढ़ी सामाजिक विषयों पर केवल सोचती है, बल्कि उसे अभिव्यक्त करने का साहस भी रखती है।

क्विज प्रतियोगिता में सबकी सक्रिय भागीदारी और हाजिरजवाबी ने बच्चों की बौद्धिक क्षमता को उजागर किया। इसमें विभिन्न रोचक राउंड रखे गए जैसे विषय आधारित प्रश्नोत्तरी, बजर राउंड, मिक्स फेस पहचान राउंड और रैपिड फायर राउंड। क्विज या प्रश्नोत्तरी में प्रत्येक बच्चे ने बढ़चढ़कर प्रतिभाग लिया। इसके साथ ही पूरे विद्यालय के बच्चों ने मिलकर झारखंड की पारंपरिक सोहराय पेंटिंग को बनाने में सक्रिय भागीदारी के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक जड़ों को भी पूरा सम्मान दिया।

तीसरे दिन के समापन सत्र में पुरस्कार और प्रमाण पत्र वितरण समारोह ने बच्चों के उत्साह को और बढ़ा दिया। बच्चों के चेहरों पर जो गर्व और संतोष की चमक थी, वह किसी भी अंकपत्र से कहीं अधिक मूल्यवान थी।

एक शिक्षक के रूप मेंमेरी सीख

इन तीन दिनों के अवलोकन, अनुभव और उस चिंतन ने मुझे बहुत कुछ सिखने का मौका दिया। मेरे लिए सबसे बड़ा सबक यह था कि जब बच्चों को स्वतंत्रता, ज़िम्मेदारी और मंच दिया जाता है, तो वे केवल अच्छे विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता, रचनात्मक सहयोगी और समस्यासमाधानकर्ता बनकर उभरते हैं। अब मैं स्वयं से यह प्रश्न करती हूँक्या मैं इस उत्साह, सहयोग और नेतृत्व को अपनी कक्षा में भी ला सकती हूँ? क्या मैं बच्चों को छोटेछोटे समूहों में बाँटकर उन्हें एकदूसरे से सीखने, संदेहों (सवालों) पर चर्चा करने और स्वयं से समाधान खोजने के अवसर दे सकती हूँ?

कल्चरल कनेक्ट” (Cultural Connect) ने मुझे यह समझाया कि सीखना केवल पहले निर्धारित समयावधि में पाठ्यक्रम को पूरा करना और सवालों का जवाब याद करवा देना भर नहीं है, बल्कि यह वास्तव में बच्चों की प्रतिभा को समझने, निखारने और उसके लिए मंच देने की एक सतत प्रक्रिया है। जहाँ बच्चों के सोचने, काम करने के तरीके और व्यवहार में वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत होती है। यह शिक्षा का एक वास्तविक, आनंदमयी और परिवर्तनकारी स्वरूप है।

मेरे लिए सबसे गर्व की बात लगती है कि हमारे सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे संसाधनों की कमी के बावजूद प्रतिभा से भरपूर हैं। हमारे बच्चे प्रत्येक क्षेत्र में बेहतर करने की संभावनाओं से भरे हुए हैं। वे केवल अवसर और सच्चे विश्वास के भूखे हैंऔर जब उनको यह दिया जाता है, तो वे हर चुनौती को एक अवसर में बदल देने का साहस रखते हैं।

(लेखक परिचय: जया प्रभा महतो, सहायक अध्यापिका के रूप में राजकीय मध्य विद्यालय नवीन आरक्षी,राँची में कार्यरत हैं। आपके पास निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रों में 20 वर्षों से ज्यादा शिक्षण का अनुभव है। वर्ष 2023 में राष्ट्रपति द्वारा आपको अस्मिता आइकॉन अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसके साथ ही आपने बाल साहित्यरुगड़ालिखा है और JCERT की प्रमुख रिसोर्स पर्सन के रूप में शैक्षणिक सामग्री के विकास में योगदान भी दिया है। इसके साथ ही विभिन्न शिक्षण प्रशिक्षणों में भी सत्रों का संचालन राज्य स्तर पर किया है।)

(आप एजुकेशन मिरर से फ़ेसबुकएक्स और यूट्यूब पर जुड़ सकते हैं। रेगुलर अपडेट के लिए हमारे  WhatsApp चैनल को फॉलो करें। आप अपने लेख, अनुभव, विचार हमें ईमेल कर सकते हैं educationmirrors@gmail.com पर।)

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

8 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
Anonymous

आप के द्वारा लिखें इस लेख को पढ़, आपका बच्चों के प्रति लगाव अपनापन एवं उनके उज्जवल भविष्य को लेकर आपकी सजगता का पता चलता है।

Anonymous

बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों का होना आवश्यक है। ज्यादातर सरकारी विद्यालयों में इस तरह कार्यक्रम नहीं होता जबकि वहीं निजी विद्यालयों में बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए समय-समय पर निरंतर कार्य कार्यक्रम उपलब्ध करवाए जाते हैं और बच्चे बढ़ -चढ़कर भाग भी लेते हैं परंतु मुझे बहुत अच्छा लगा कि आप सरकारी विद्यालय में होते हुए भी अपने बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करवाते रहती हैं। आपकी यह कोशिश एक न एक दिन जरुर रंग लाएंगी। इस लेख से तथा आपके कार्यों से भविष्य में जरूर कोई न कोई शिक्षक प्रेरित होंगे।

Anonymous

Jaya dii your perception is nice and also you are a good thinker and observer….and you are an exceptional personality in this field……… But aapne jo apne anubhavo se jo samjha or likha usme shi mayne me hamare bachho or sarkari schoolo me sansadhan simit hai or aap jaisi shikshika is cultural connect ke madhyam se samaj ke un sabhi tabke ke jo garib or jo pichad gaye is chakachound ki duniya me…. or waise bachho ko app manshik chetna or jagrukta dene ka kaam kar rhi ho wo kabliye tarif hai Jaya dii … Aap jaisi shikshika samaj ke navin pidhi ko nai disha or urja pradan karegi…. God bless you and your team …………………………..

Always keep continue
Or
Shikte rho yahi jeevan hai…

quicklywidget6761195ee5

जया मैम, आपके बारे में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है । वैसे एक बात आपने बहुत अच्छी कहीं कि हमारे सरकारी विद्यालयों के बच्चों में प्रतिभा तो अनंत होती है लेकिन शायद कहीं हम शिक्षकों के उत्साह में कमी होती है और हम अपेक्षित प्रयास नहीं करते हैं कि इस तरह के कार्यक्रमों में हमारे विद्यार्थी भी खुलकर शिरकत करें और अपनी प्रतिभा को निखारें ।वैसे अब आपके विचारों को पढ़कर मुझे ऐसा लगा कि मुझे भी इसी तरह से जोश और ऊर्जा के साथ अपने विद्यालय में भी “कल्चरल कनेक्ट” के कार्यक्रम करवाने होंगे ताकि मेरे विद्यालय के बच्चों को भी एक मंच मिल सके और उनकी प्रतिभा भी खुलकर सामने आ सके तो इस प्रभावशाली और उत्साहवर्धन प्रयास के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
अनुपमा , चाईबासा

Anonymous

यह लेख हमारे सरकारी विद्यालयों की सच्चाई को दर्शाता है। हमारे विद्यालय में बच्चे बहुत ही अप्रतिम, अद्वितीय गुणों से भरे पड़े हैं। यह मानना कि केवल प्राइवेट स्कूल के बच्चे हीं तेज है ,यह लेख इस बात को खंडित करता है ।हमारे यहां के बच्चों में वह क्षमता है कि हम उन्हें थोड़ा सा विश्वास से भर दें तो वे हर कार्य चौगुने मनोबल के साथ करने के लिए तैयार होते हैं । जया मैंम ने अपने विद्यालय में इस कल्चरल इवेंट को करवाकर और समय-समय पर ऐसे ना जाने कितने इवेंट्स करवा कर यह साबित किया है की हमारे यह बच्चे विशेष आवश्यकता वाले तो जरूर हैं पर विशेष, विलक्षण प्रतिभाओं तथा गुणों से भरे हुए हैं। हम सभी को एक शिक्षक होने के नाते अपने बच्चों के इन गुणों को पहचानना , निखारना
और उसे सूर्य की भांति चमक प्रदान करना चाहिए।

Anonymous

बहुत ही सुन्दर है l इसी तरह कलम की ताकत का असर होता है l continue….

Sangeeta

Miss Jaya, your experience sharing beautifully captures the true essence of learning as a holistic process that goes far beyond the completion of a prescribed syllabus. In the context of our state, where government schools are continuously striving to nurture creativity and confidence among children with limited resources, such initiatives are highly valued. The “Cultural Connect” programme reflects how schools can become vibrant spaces of expression, collaboration, and value-based education. The efforts of teachers and school leaders in creating such opportunities are praiseworthy. They have not only provided a platform for children to showcase their hidden talents but have also empowered them to think critically, express freely, and connect with their cultural roots. This is a shining example of how dedicated educators can transform schools into centers of joyful and meaningful learning, inspiring both students and the community at large. Well said that resources are though important but even without that, the genuine instinct and interest to participate and perform well, becomes the single factor to overcome and override any obstacle. Our learners just need an opportunity to shine, and you and your team has strived to give them what they thrust for. Well done!!! Keep going

शुक्रिया इस रिफ़्लेक्शन को लिखने के लिए। जया मैम, इसे पढ़ते हुए बच्चों की शानदार तैयारी और अद्भुत प्रस्तुति को महसूस करने का मौका मिला। मुझे तो ऐसा लगा जैसे किसी अख़बार में सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति की खबर लिख रहा हूँ। पत्रकारिता की पढ़ाई में मेरा एक पेपर सांस्कृतिक रिपोर्टिंग का भी था, मुझे उसकी स्मृति हो आई। सांस्कृतिक कार्यक्रम से भी सीखने के लिए कितना कुछ है यह आपके अनुभव को पढ़ते हुए पता चला, अगर हम ऐसे अवसर कक्षा-शिक्षण में भी शामिल कर लें तो बच्चों के सीखने के अनुभव जीवन के करीब और रचनात्मक होंगे, मुझे इस बात का पूरा यकीन है। बच्चों की क्षमता पर विश्वास वाली बात से मैं भी सहमति रखड़ा हूँ।

8
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x