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क्लासरूम में बच्चों की भागीदारी बढ़ाने के 10 ख़ास तरीके

1.हर बच्चे की क्षमता पर पूरा भरोसा करना। बच्चों को स्केफोल्डिंग (मैं करता हूँ, हम करते हैं, तुम करो) के माध्यम से कालांश में भागीदारी का मौका देना। यह तरीका शुरूआती स्तर पर भाषा शिक्षण के लिहाज से बेहद कारगार माना जाता है।

2.हर बच्चा विशिष्ट है और उसके सीखने का तरीका भी विशिष्ट हो सकता है। इसलिए हर बच्चे को उसकी आवश्यकतानुसार सपोर्ट करना और उसे सीखने का अवसर उपलब्ध कराना बच्चे को खुद से समझकर पढ़ना सीखने और आत्मविश्वास के साथ कक्षा में भागीदारी करने को प्रोत्साहित करता है।

3. क्लासरूम का उचित प्रबंधन (क्लासरूम मैनेजमेंट) बच्चों की भागीदारी को बढ़ाने में सहायक होता है। ऐसे में शिक्षक साथी बच्चों को यू आकार में या गोले में या फिर अन्य तरीके से बैठा सकते हैं ताकि वे हर बच्चे तक पहुंच सकें और बच्चों के लिए उनके साथ बातचीत करना सुगम हो।

4Thane-Municipal-Corporation-school. हर बच्चे को उसके नाम से बुलाना भी भागीदारी देने के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण बात है ताकि हर बच्चे को एक पहचान मिले। इसके साथ ही उसकी प्रगति के बारे में जानकारी एक शिक्षक को बच्चे तक विशिष्ट फीडबैक पहुंचाने का रास्ता भी देती है। इसका असर बच्चों को सकारात्मक स्व-विकास में सहायक होता है।

5. बच्चों की सीखने में भागीदारी कितनी है? , यह जानने का प्रयास करें। इसके लिए बच्चे किसी टॉपिक को कितना समझ पाए हैं, इससे जुड़े सवाल पूछने चाहिए। ताकि बच्चों को उसकी आवश्यकतानुसार मदद की जा सके।

6. कालांश में बच्चों को अन्य बच्चों से सीखने के लिए (पियर लर्निंग) प्रोत्साहित करना भी भागीदारी को बढ़ाने की दृष्टि से मददगार साबित होता है। ऐसे कई उदाहरण भाषा कालांश के दौरान देखने में आए। एक बार पहली कक्षा में पढ़ने वाली एक छात्रा अन्य छात्रा को लिखने में मदद कर रही थी। ऐसे उदाहरण पियर लर्निग के महत्व को रेखांकित करते हैं।

7. किसी कालांश में बच्चों की समस्या को अनदेखा न करना। इससे किसी बच्चे को सीखने की प्रक्रिया में आने वाली परेशानी को समझने और उसका निदान निकालने में मदद मिलती है। जैसे एक छात्रा ने बातचीत के दौरान शिक्षक को बताया कि वह हिंदी में किसी शब्द के ऊपर लगी मात्राओं को पढ़ पाती है, मगर नीचे लगी मात्राओं को पढ़ने में उसे परेशानी होती है। ऐसी बातचीत से शिक्षक को उस छात्रा को पढ़ना सिखाने के लिए सपोर्ट करने में मदद मिली।

8. किसी कालांश को सफल बनाने में अच्छे निर्देशों की बड़ी सकारात्मक भूमिका होती है। ऐसे में जरूरी है कि एक शिक्षक के निर्देश स्पष्ट हों जो बच्चों को अच्छे से समझ में आएं।

9. शिक्षक के सामने बच्चों के सीखने से संबंधित लक्ष्य स्पष्ट होने चाहिए। इससे शिक्षक बच्चों के सामने स्पष्ट अपेक्षाएं रख पाते हैं। इससे बच्चों में सीखने की ललक बढ़ती है और वे कठिन चुनौतियों का सामना करने के लिए मनोवैज्ञानिक तौर पर तैयार होते हैं। उस चुनौती को पार करने के बाद वे आत्मविश्वास से भरे और संतुष्ट महसूस करते हैं।

10. अपने कालांश के अनुभवों पर विचार करने की प्रक्रिया में शिक्षक चिंतन का अभ्यास कर रहे होते हैं। एक शिक्षक ने कहा, “जब हम अपने कालांश के अनुभवों पर सोचते हैं तो हमें पता चलता है कि क्या अच्छा हो रहा था और कहां पर सुधार करने की गुंजाइश थी। इस विचार प्रक्रिया में ही नवाचार संबंधी विचार मन में आते हैं, जिनके इस्तेमाल कालांश का संचालन ज्यादा बेहतर ढंग से किया जा सकता है।

जैसे एक शिक्षक ने पहली-दूसरी के बच्चों को लायब्रेरी का इस्तेमाल करने का ज्यादा मौका दिया। इस दौरान उन्होंने देखा कि बच्चों में अटक-अटक कर पढ़ने का समस्या का समाधान हो रहा है। बच्चों में अनुमान का कौशल विकसित हो रहा है। बच्चे एक-दूसरे के साथ अपने विचारों व जिज्ञासा को साझा कर रहे हैं इससे बच्चों में मौखिक अभिव्यक्ति के कौशलों का विकास हो रहा है।

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