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स्कूल में हर बदलाव के लिए चुपचाप लड़ना होता है

स्कूली शिक्षा, बदलाव की कहानी, शिक्षक-प्रशिक्षक, भारत में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति

स्कूलों में बदलाव की शुरुआत रॉकेट के धुएं की तरह धुंधली होती है। जो वक्त के साथ विस्तार पाती है।

स्कूलों की वर्तमान परिस्थिति को प्रभावित करने वाले कारकों में सबसे बड़ा फैक्टर शिक्षकों-प्रधानाध्यापकों का व्यक्तित्व, नजरिया और व्यवहार भी है। शिक्षक-प्रशिक्षकों के लिए ऐसी स्कूलों में काम करना आसान होता है जहां स्टाफ का रवैया सहयोगात्मक होता है और प्रधानाध्यापकों का हमें सपोर्ट भी मिलता है। बाकी स्कूलों में काम का अनुभव हमें काफी कुछ सिखाता है।

स्कूलों में चीज़ें धीरे-धीरे बदलती भी हैं। इसके लिए धैर्य के साथ इंतजार करना होता है। मगर हर इंतज़ार की क़ीमत होती है। अगर कोई काम सीधे क्लासरूम से जुड़ा है तो उसका असर बच्चों की लर्निंग पर होता है। अगर कोई काम स्कूल सिस्टम से जुड़ा हुआ है तो सिस्टम सुधरने में समय लगता है, जिसका असर अन्य चीज़ों पर पड़ता है। हर स्कूल का एक अपना व्यक्तित्व होता है जो वहां काम करने वाले लोगों से मिलकर बनता है। कुछ ऑफिस ऐसे होते हैं जहां बैठकर आपको अच्छा महसूस होता है। तो कुछ जगहें ऐसी होती हैं जहां से आप बस निकल लेना चाहते हैं।

विविधता

कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनके साथ आपको बात करके मजा आता है। तो कुछ लोग ऐसे भी मिलते हैं कि लगता है कि बात किस बहाने से खत्म की जाये। कुछ लोगों का व्यवहार अच्छा होता है। हर बात में हाँ होती है, मगर काम की बात होते ही हाँ, न में तब्दील हो जाती है। इसके अलावा शिक्षकों की अपनी व्यस्तताएं होती हैं। उनको साफ तौर पर लगता है कि उनका वेतन जिस विभाग से आता है उसका काम प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर आता है।

जाहिर सी बात है कि यह नज़रिया शिक्षा तंत्र की एक सच्चाई बयान करता है कि प्राथमिकता में बच्चों का सीखना सिर्फ सैद्धांतिक तौर पर ही सबसे प्रमुख होता है। वास्तविकता में तो इसका स्थान तीसरे-चौथे कभी-कभी तो पांचवे छठें नंबर पर आता है। बाकी सारी प्राथमिकताएं स्कूली व्यवस्था, अन्य कागजी कार्रवाइयों व सूचनाओं के आदान-प्रदान, परीक्षाओं इत्यादि में खर्च हो जाती है। पढ़ाई का नंबर परीक्षाओं से पहले आता है। मगर आठवीं तक सबको पास कर देना है, इस गलतफहमी के कारण पढ़ाई भी परीक्षाओं की ओट में खड़ी हो गई है। जब पढ़ने-पढ़ाने का एक ही लक्ष्य हो परीक्षा पास करना तो ऐसे में कौन किसको समझाएगा कि पढ़ाई जरूरी है?

बच्चे को स्कूल भेजने जरूरत

घर वालों को भी लगता है कि जब बच्चा बग़ैर स्कूल गये पास हो सकता है तो फिर स्कूल भेजने की क्या जरूरत है? बेहतर है कि उसे काम पर भेजा जाये। या फिर घर पर ही रोक लिया जाये। बीच-बीच में कभी-कभार स्कूल भेज दिया जाये ताकि नाम बचा रहे। स्कूल में कुछ ड्राप आउट बच्चों का एडमीशन कराने के लिए एक संस्था से कुछ बच्चों को लेकर एक व्यक्ति स्कूल में आये थे। वे अपने साथ आए चार बच्चों के बारे में बता रहे थे कि इनका बड़ा मन है स्कूल में पढ़ने का।

शिक्षक उनको स्कूली वास्तविकताओं के बारे में बता रहे थे कि ये तो नाम लिखाकर गायब हो जाते हैं। हमारी तो परेशानी यही है कि बच्चे स्कूल नहीं आते। इसके कारण हमारी मेहनत खराब होती है। रजिस्टर लाल स्याही से भरे होते हैं। वे रजिस्टर दिखा रहे थे। पचास बच्चों की कक्षा से आधे से ज्यादा बच्चे छुट्टियों के बाद से स्कूल नहीं आ रहे थे। जब चौथी-पांचवीं में एडमीशन के लिए आये उन बच्चों को उन्होंने अखबार का एक शीर्षक पढ़ने के लिए कहा तो वे सहम-सहम कर पढ़ रहे थे। पहली कक्षा के बच्चों की स्थिति इन बच्चों से ज्यादा बेहतर थी, जिसे वे शिक्षक ही पढ़ाते हैं।

सुर्खी न बनने वाली बातें भी महत्वपूर्ण होती हैं

शिक्षकों की ऐसी सकारात्मक कोशिशें कहीं सुर्खी नहीं बनती। मगर उनका महत्व है। वे ऐसे शिक्षक है जो बच्चों को ज़िंदगी में पहली बार पढ़ना सिखा रहे हैं। जिनको वे बच्चे बड़े होकर याद करने वाले हैं। ऐसी बातों से मन को तसल्ली होती है कि सफर की दिशा सही है। हम जो सीख रहे हैं उसे शिक्षकों के साथ साझा करने की कोई हड़बड़ी नहीं है। बौद्धिक डर पैदा करने की कोई मंशा नहीं है। सहज शब्दों में क्लासरूम से जुड़े अनुभवों को साझा करते रहेंगे। उदाहरण होंगे उनके अपने ही बच्चे जिनके साथ वे काम करते हैं।

ताकि उनको ये न लगे कि यह सिद्धांत तो विदेश से आया है। यह बात तो सिटी में पढ़ने वाले बच्चों के साथ ही लागू होती है। उनके स्कूल में लागू नहीं हो सकती क्योंकि वहां तो बच्चों को दो-तीन लाइन के निर्देश हिंदी में समझते हुए परेशानी होती है। तो फिर हिंदी पढ़ना सीखने के सफर पर आगे बढ़ना उनके लिए कितना मुश्किल है। इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। आज शाम को होने वाली बातचीत में भाषा शिक्षक ने कहा, “अब बच्चों को पढ़ना सिखाना है।” तो उनकी इस बात से लगा कि शायद मैं इसी पल का इंतज़ार कर रहा था। अब मेरा आधा काम हो गया है। बाकी की औपचारिकताएं स्कूल आते-जाते पूरी होती रहेंगी।

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