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शिक्षा क्षेत्र में बड़े काम की हैं ये 5 बातें

बच्चे की भाषा में हो पढ़ाई, मीडियम और मैसेज की लड़ाई, भारत में प्राथमिक शिक्षाशिक्षा का क्षेत्र एक गतिमान क्षेत्र है। बदलते दौर की राजनीति, अर्थव्यवस्था, तकनीक, जीवन दर्शन और विज्ञान की खोजों के साथ इस क्षेत्र का भी निरंतर विस्तार हो रहा है। कभी बच्चे के मन को कोरी स्लेट या कोरा कागज कहकर पुकारा जाता था।

मगर आज के दौर में ये विचार बासी हो गए हैं। अब इसकी जगह नए संप्रत्ययों ने ले ली है। अब माना जाता है कि हर बच्चे में सीखने की स्वाभाविक इच्छा और रूचि होती है। बस हमें उसे सही दिशा देने और प्रोत्साहित करने की जरूरत होती है। बाकी का काम बच्चे स्वतः कर लेते हैं। अगर आप ऐसे क्षेत्र में काम कर रहे हैं तो ये 10 बातें आपके लिए बड़े काम की हो सकती हैं

1.स्वाध्याय है जरूरी – मेडिकल और लॉ की तरह शिक्षा भी एक पेशा है। जिसमें टिके रहने के लिए आपको निरंतर अपने ज्ञान और समझ को अपडेट करने की जरूरत होती है। इसलिए इस क्षेत्र में होने वाले शोध और आलेखों के अध्ययन और उससे जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए वक़्त जरूर निकालें।

बहुत से शिक्षक साथी दस सालों के करियर में 10 किताबें पढ़ने का मौका नहीं खोज पाते। ऐसा ही हाल शिक्षक प्रशिक्षकों व शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले साथियों का होता है, वे बहुत से कांसेप्ट और विचारों का नाम तो लेते हैं। कई इस बात की संभावना बहुत कम होती है कि वे विस्तार से उन चीज़ों को समझें और अपने अनुभवों को दूसरों के साथ साझा करने का समय निकाल पाएं। दोनों की तरफ से समय की कमी की बात बार-बार दोहराई जाती है।

2.ज़मीनी स्थितियों को समझें – शिक्षा के क्षेत्र में विचारों की बाढ़ हैं। बहुतायत विचार तो ऐसे हैं जो भारतीय संदर्भ और सच्चाई से कटे हुए हैं। ऐसी स्थिति में किसी विचार को क्रियान्वित करने के लिए ज़मीनी स्थिति की सटीक समझ का होना जरूरी है। इसके लिए अपनी आँख और कान खुले रखने की जरूरत है। ऐसे लोगों से संवाद का अवसर न गंवाएं जो शिक्षा के क्षेत्र में सीधे बच्चों व शिक्षकों के साथ काम कर रहे हैं। या फिर शिक्षा के क्षेत्र में शोध कर रहे हैं। ऐसे लोगों से होने वाला संवाद आपको ज़मीनी सच्चाइयों से जोड़ता है और आप विभिन्न संप्रत्ययों को भारतीय संदर्भ में समझने की अंतर्दृष्टि विकसित करते हैं।

3.अख़बारों और पत्रिकाओं की पड़ताल करें – भारतीय मीडिया में एजुकेशन रिपोर्टर जैसी कोई ख़ास पोस्ट नहीं है। न ही इस तरह के बीट की कोई ट्रेनिंग होती है कि शिक्षा के किसी मुद्दे को कैसे रिपोर्ट किया जाए। इसके बाद भी समय-समय पर विभिन्न अख़बारों, पत्रिकाओं और रिसर्च जर्नल में शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत सामग्री प्रकाशित होती रहती है। इसका अध्ययन जरूरी है ताकि हम खुद को अपडेट रख सकें और इस क्षेत्र की प्रमुख समस्याओं की अपनी समझ और विशेषज्ञों की नज़र से पड़ताल कर सकें। जैसे बीते दिनों में हरियाणी में एक हाईस्कूल को इंटर कॉलेज में तब्दील करने की माँग उठी थी। इसे मीडिया ने बड़ी प्रमुखता से प्रकाशित किया था।

4.शिक्षकों से सतत संवाद करें – जमीनी सच्चाइयों को समझने। समाधान का रास्ता तलाशने का इससे बेहतर विकल्प शायद ही कोई हो सकता है। बहुत से कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने से पहले शिक्षकों की राय नहीं ली जाती। एक प्रोफ़ेसर ने साफ़-साफ़ कहा कि शिक्षकों को किस चीज़ की जरूरत है, ऐसा कोई अध्ययन व्यापक स्तर पर होता ही नहीं। इसके बग़ैर ही बहुत सी योजनाओं को क्रियान्वित किया जाता है। ऐसे माहौल में शिक्षकों से संवाद जरूरी है। शिक्षकों से संवाद के लिए जरूरी है कि हम खुले मन के साथ उनके संवाद करें और अपने पूर्वाग्रहों को अपनी बातचीत पर हावी न होने दें।

5.शिक्षक-छात्र रिश्ते को समझें – शिक्षक और छात्रों के बीच कैसा संवाद होता है? शिक्षक अपनी क्लास या स्कूल के बच्चों के प्रति कितने संवेदनशील हैं? वे उनकी घरेलू परिस्थितियों से कितने अवगत हैं और उनकी चुनौतियों को समझते हुए स्कूल में बिताए जाने वाले उनके समय को कैसे अवसर में तब्दील करते हैं? इन सारी बातों को समझना आपको शिक्षा के क्षेत्र में बहुत सी ऐसी सकारात्मक कहानियों तक ले जाएगा, जो आपके जीवन के प्रति नज़रिए और सोच को तब्दील करने की ताक़त रखती हैं।

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