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क्या हमारी सोच में बदलाव से सरकारी स्कूलों में बदलाव संभव है? 

20180409_1707331968328550.jpgसरकारी स्कूलों के प्रति हमारा नज़रिया कैसा है? हम वहाँ पढ़ने वाले बच्चों के बारे में क्या सोचते हैं? सरकारी स्कूल में पढ़ने के लिए बच्चे जिस परिवेश से आते हैं, उसको लेकर हमारी क्या धारणा है? गाँव और शहर के बाहरी इलाक़ों के बारे में हमारी क्या राय है? हम सरकारी द्वारा शिक्षा पर होने वाले खर्चे को कितना महत्व देते हैं?

किसी सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे के ‘मिड डे मील’ को हम ख़ैरात मानते हैं या जरूरत मानते हैं। सरकारी स्कूलों का देश के विकास में कोई योगदान है या फिर ये देश को पीछे ले जा रहे हैं। वहाँ पढ़ाने वाले शिक्षक काम भी करते हैं या फिर केवल कुर्सी तोड़ते हैं। इन सारे सवालों का जवाब यह तय करने की संभावना रखता है कि हमारे प्रयासों से सरकारी स्कूल में कुछ बदलेगा भी या रत्तीभर फर्क़ नहीं पड़ेगा।

बदलाव की असीम संभावनाओं से भरे हैं सरकारी स्कूल

अगर मैं सिर्फ अपनी बात करूं तो मुझे लगता है कि सरकारी स्कूल बदलाव की असीम संभावनाओं का दूसरा नाम है। वहां काम करने और बच्चों व अभिभावकों का अपनापन पाने का जितना अवसर है, उतना दूसरे किसी क्षेत्र में नहीं है। सरकारी स्कूल एक ऐसी जगह है, जहाँ गाँव, छोटे कस्बों और शहरों के उन बच्चों के सपने पल रहे हैं जिनको वाकई मदद और सहयोग की जरूरत है। सतत प्रोत्साहन और प्रेरणा की जरूरत है ताकि समय से पहले ही सपनों के फूल मुरझाने की बजाय फिर से जीवंत हो उठें। सक्रिय हो उठें और जीवन की चुनौतियों को एक अवसर के रूप में स्वीकार करने के लिए प्रतिबद्धता के भाव से भर उठें।

ऐसे ही माहौल में एक नये और व्यापक बदलाव की उम्मीद छुपी है, जहाँ किसी बच्चे को उसकी पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण हीनभावना से नहीं देखा जाता। सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे भी उतने सम्मान और स्नेह के हक़दार हैं, जितने किसी कान्वेंट या किसी नामी-गिरामी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे। उनके सवाल उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने किसी अन्य बच्चे को। उनको भी अटेंशन पाने का और दुलार पाने का उतना ही अधिकार है जितना किसी अन्य बच्चे को, क्योंकि वे भी भारत के नन्हे नागरिक हैं, जो भविष्य में अपनी जिम्मेदारी के माध्यम से देश को आगे ले जाने में अपनी भूमिका चुनेंगे और उसका निर्वाह करेंगे।

यह भूमिका किसी शहरी स्कूल में पढ़े बच्चे से भी ज्यादा बड़ी और चुनौतीपूर्ण हो सकती है, इसलिए यह सोचकर कि यह सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा है, यह पढ़कर क्या करेगा? इसे कहाँ का आईएएस बनान है? इसे कौन सा देश चलाना है? ऐसे व्यर्थ के सवालों में फंसकर उपेक्षित मत करिए। भारत की विविधता का एक चेहरा सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे हैं, उनकी संख्या निजी स्कूलों की तुलना में कहीं ज्यादा बड़ी है।

सरकारी स्कूलों की उपेक्षा से क्या फर्क पड़ता है?

किसी काम का भौगोलिक क्षेत्र और मानवीय पहुंच के हिसाब से ज्यादा बड़ा होना उपेक्षा की बजाय ध्यान देने की माँग करता है। सरकारी स्कूल जो दूर-दराज के क्षेत्रों में स्थित है, वहाँ के लोग सोचते हैं कि यहाँ कौन आता है? कौन ध्यान देता है? यहाँ की किसको पड़ी है? हम क्या कर रहे हैं, इससे किसी को कोई फर्क़ नहीं पड़ता। मगर सच तो यह है कि फर्क़ पड़ता है। इस देश पर फर्क़ पड़ता है जहाँ इंसान 21वीं सदी के बुनियादी कौशल से वंचित हो रहे हैं।  बच्चे शिक्षा के अपने बुनियादी अधिकार से वंचित हो रहे हैं। इस वंचना के अहसास से मुक्ति दिलाने में शिक्षा की अहम भूमिका है। यह भूमिका अगर हम अपनी तरफ से निभा पाए तो लाखों बचपन संवर जाएंगे, बहुत से सपने मरने से बच जाएंगे। आखिर में दुष्यंत कुमार की एक कविता पढ़िए।

एक आशीर्वाद / दुष्यंत कुमार

जा तेरे स्वप्न बड़े हों।

भावना की गोद से उतर कर
जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें।

चाँद तारों सी अप्राप्य ऊचाँइयों के लिये
रूठना मचलना सीखें।

हँसें
मुस्कुराएँ
गाएँ।

हर दीये की रोशनी देखकर ललचायें
उँगली जलाएँ।
अपने पाँव पर खड़े हों।
जा तेरे स्वप्न बड़े हों।

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