
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने हमारे रूटीन के बहुत से कामों को करना आसान बना दिया है, इस बात से शायद ही कोई असहमत होगा। इससे हमारा समय, प्रयास और रूटीन काम को करने में लगने वाली ऊर्जा भी बच रही है। एआई ने जानकारी को प्रॉसेस करने की प्रक्रिया को आसान बना दिया है और नए विचारों को दिशा देने में भी अपनी भूमिका निभा रहा है। इसके माध्यम से डेटा और डिजाइन से जुड़े बहुत से जटिल कार्यों को कुछ ही पलों में करना संभव बना दिया है। मैं स्वयं एआई का उपयोग करने के खिलाफ नहीं हूँ। लेकिन एक शिक्षक के रूप में मेरे मन में एक सवाल लगातार उठता है कि एआई के बढ़ते प्रयोग के साथ हमारा अपना मस्तिष्क कितनी सक्रियता के साथ भागीदारी कर रह पा रहा है?
हमारे लिखने की शुरुआत सोचने से हो रही है?
आज की तारीख में अगर किसी को एक टॉपिक पर लेख लिखना हो तो शुरुआत सोचने से नहीं, सीधे एआई को प्रॉम्ट देने से होती है। विषय लिखा और कुछ ही सेकंड में पूरा लेख सामने। लेकिन क्या हमने एक पल ठहकर यह जाँचा कि मिली हुई जानकारी कितनी प्रामाणिक है? उसमें हमारे अपने जीवन के वास्तविक अनुभव, विचार, तर्क और दृष्टिकोण कहाँ हैं? आजकल बड़े-बड़े अकादमिक कार्यों में भी एआई का प्रयोग हो रहा है। इसमें अपने आप में कुछ गलत नहीं है, लेकिन प्रश्न यह है कि एआई हमारा सहायक है या हमारे चिंतन का विकल्प बनता जा रहा है?

प्रॉम्प्ट देते समय क्या हमने उसमें अपना विचार, अपना मत, उद्देश्य, संदर्भ और लक्षित दर्शक वर्ग का चुनाव किया? या हमने सोचने का काम भी एआई को ही सौंप दिया? उदाहरण के तौर एआई का इस्तेमाल करके प्रॉम्प्ट बना रहे हैं और लार्ज लैंग्वेज मॉड्ल्स (एलएलएम) जैसे चैटजीपीटी या फिर क्लाड को वह प्रॉम्प्ट देकर आर्टिकल लिखने जैसा काम कर रहे हैं। ‘प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग’ सीखने-सिखाने पर आजकल काफी जोर है, क्योंकि यही वास्तविक चिंतन वाले पहलू को दर्शाता है कि हमारा परिणाम काफी हद तक हमारे द्वारा दिए गए प्रॉम्प्ट पर निर्भर करता है।
बच्चों की चित्रकला से विविधता कहाँ गायब हो गई?
आजकल चित्रकला प्रतियोगिताओं में अलग-अलग विद्यालयों से आए बच्चों के चित्रों को देखकर लगता है कि सभी की कल्पना भी लगभग एक जैसी हो गई हैं—वही रचना-विन्यास, वही प्रतीक और लगभग वही प्रस्तुति। ऐसे में एक सहज सा प्रश्न उठता है कि बच्चे की अपनी कल्पनाशीलता और मौलिकता कहाँ है? उसकी रचनात्मकता को जगह कहाँ मिली? क्या उसने दिए गए विषय पर बैठकर स्वयं से कुछ सोचा भी? यदि सौ बच्चे किसी एक विषय पर स्वतंत्र रूप से सोचेंगे, तो उनकी कल्पना में एक विविधता दिखेगी। उनकी कल्पना अलग-अलग दिशाओं में जा सकती हैं।

ऐसा संभव है कि बच्चों का बनाया प्रत्येक चित्र तकनीकी रूप से उत्कृष्ट न हो, लेकिन उसमें बच्चे की अपनी सोच की छाप तो होनी ही चाहिए। यानि स्वतंत्र चिंतन के रास्ते में कोई विचार बाधा बन रहा है, यह सही उत्तर की अपेक्षा हो सकती है। उत्तर गलत होने का डर भी इसके पीछे एक कारण हो सकता है।
कोविड के बाद का असर
मैंने अपने अवलोकन में देखा है कि कोविड के बाद बहुत से बच्चे अपने विचारों को व्यवस्थित करने, किसी विषय पर ठहराव के साथ सोचने और सहजता के साथ बताने में चुनौती का सामना कर रहे हैं। यही बच्चे अब अगर अपने विचार अभिव्यक्त करने के लिए पूरी तरह एआई पर निर्भर होने लगे, तो स्थिति और ज्यादा गंभीर हो सकती है।
आज कक्षा 4-5 के बच्चे भी विद्यालय में बड़े गर्व से बताते हैं- “ मैम, हमने अपना उत्तर एआई से चेक कर लिया।” या- “मैम, यह तस्वीर हमने एआई की मदद से बनाई है।” उनका उत्साह देखकर अच्छा भी लगता है कि वे नई तकनीक से परिचित हैं, लेकिन साथ ही एक प्रश्न परेशान करता है—इतनी छोटी उम्र में एआई की इतनी सहज और सर्वसुलभ उपलब्धता कहीं उनके स्वतंत्र चिंतन के विकास में बाधा तो नहीं बन रही?
आज कक्षा 4-5 के बच्चे भी विद्यालय में बड़े गर्व से बताते हैं- “ मैम, हमने अपना उत्तर एआई से चेक कर लिया।” या- “मैम, यह तस्वीर हमने एआई की मदद से बनाई है।” उनका उत्साह देखकर अच्छा भी लगता है कि वे नई तकनीक से परिचित हैं, लेकिन साथ ही एक प्रश्न परेशान करता है—इतनी छोटी उम्र में एआई की इतनी सहज और सर्वसुलभ उपलब्धता कहीं उनके स्वतंत्र चिंतन के विकास में बाधा तो नहीं बन रही?
यदि हर प्रश्न का उत्तर सोचने से पहले मिल जाए, हर कहानी लिखने से पहले तैयार हो जाए और हर चित्र कल्पना करने से पहले स्क्रीन पर बन जाए, तो बच्चे प्रश्नों से जूझना, गलतियाँ करना, मिटाना, दोबारा सोचना, नया रास्ता खोजना और अंततः कुछ अपना सृजित करना कहाँ से सीखेंगे? रचनात्मकता का अर्थ केवल एक सुंदर अंतिम उत्पाद बनाना भर नहीं है। उसका असली मूल्य उस प्रक्रिया में है जिसमें बच्चा सोचता है- “मैं इसे कैसे बनाऊँ? मैं क्या कहना चाहता हूँ? मेरा विचार दूसरों से अलग कैसे है?”
सोचने की आदत का विकास और एआई का साथ
शायद इसलिए हमें बच्चों को एआई से दूर रखने की नहीं, बल्कि एआई के साथ सोचने की आदत विकसित करने की जरूरत है। पहले बच्चा स्वयं सोचे, अपना उत्तर लिखे, अपना चित्र बनाए, अपना विचार प्रस्तुत करे- और उसके बाद एआई से तुलना करे, प्रश्न पूछे, फीडबैक ले या अपने काम को बेहतर बनाने के नए रास्ते खोजे। एआई को पहला विचार देने वाला नहीं, हमारे अपने विचार के बाद आने वाला सहयोगी बनना चाहिए। मैं एआई के प्रयोग के खिलाफ नहीं हूँ।
मैं उस पीढ़ी के लिए चिंतित हूँ जिसे हम ब्राइट माइंड्स कहते हैं। क्योंकि यदि इन बच्चों के मस्तिष्क को हर बार तैयार विचार मिलने लगे, तो कहीं ऐसा न हो कि उनके पास साधन तो पहले से कहीं अधिक हों, लेकिन अपने मौलिक विचारों को जन्म देने का अभ्यास धीरे-धीरे कम होता जाए। मौलिकता का खोना केवल कला या लेखन का नुकसान नहीं होगा। मौलिक विचार ही नए प्रश्न पैदा करते हैं, नए समाधान खोजते हैं और अंततः नए सृजन का आधार बनते हैं।

इसलिए शायद सवाल यह नहीं होना चाहिए कि – “बच्चों को एआई का प्रयोग करना चाहिए या नहीं?” सवाल यह होना चाहिए- “क्या हम बच्चों को एआई का उपयोग करना सिखा रहे हैं, या एआई को उनकी जगह सोचना सिखा रहे हैं?” तकनीक जितनी बुद्धिमान होती जा रही है, उतना ही जरूरी है कि हम बच्चों के अपने मस्तिष्क को सोचने, सवाल करने, कल्पना करने और सृजन करने के अवसर देते रहें।
(परिचय: अल्पा निगम एक नवाचारी शिक्षिका हैं, आपको फ़ुलब्राइट फेलोशिप (2022–23),राष्ट्रीय ICT अवॉर्ड (2016), राज्य शिक्षक सम्मान (2017), नारी सम्मान और यूथ आइकॉन अवॉर्ड (2018) जैसे प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए हैं। आपने बुनियादी गणित व साक्षरता के क्षेत्र में ई-कॉन्टेंट और प्रशिक्षण मॉड्यूल विकसित किए, 1.17 लाख से अधिक शिक्षकों को प्रशिक्षित किया तथा भोजपुरी में कक्षा 1–2 की पाठ्यपुस्तकों का अनुवाद कर स्थानीय भाषा शिक्षण को बढ़ावा दिया। अपनी प्रोफेशनल लर्निंग कम्युनिटी ‘नींव’के माध्यम से शिक्षकों के क्षमतावर्धन में योगदान दे रही हैं। इसके साथ ही साथ निपुण भारत मिशन की राष्ट्रीय टास्क फ़ोर्स सदस्य के रूप में अपना सक्रिय योगदान दे रही हैं।)
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