‘मैं पहली कक्षा में पढ़ता हूँ, मुझे स्कूल आना अच्छा लगता है’
पहली कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे भी अपने शिक्षकों और स्कूल के बारे में सोचते हैं। आख़िर उनके मन में क्या-क्या ख्याल आते होंगे।
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इस कॉलम में बच्चों के लिखे अनुभव। क्लासरूम में उनके अनुभव। शिक्षकों व शिक्षा के बारे में उनकी राय। उनकी बनाई तस्वीरों और बदलते समय के बारे में बच्चों के विचारों को प्रमुखता के साथ पेश करता है।
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पहली कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे भी अपने शिक्षकों और स्कूल के बारे में सोचते हैं। आख़िर उनके मन में क्या-क्या ख्याल आते होंगे।
कहानी से क्या शिक्षा मिली? ऐसे सवालों से आगे भी सफर जाता है। मगर कैसे? पढ़िए इस पोस्ट में।
बच्चों को पढ़ाते समय हमें उनकी कोशिशों को भी महत्व देना चाहिए। इससे वे अपने सीखने का हौसला बरकरार रख पाएंगे।
बच्चों को तो बच्चा बनकर पढ़ाना चाहिए। यही इस सवाल का सबसे अच्छा जवाब हो सकता है।
सरकार की तरफ़ से स्कूली बच्चों को खाना देने की बजाय पैसे देने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। आदिवासी और ग्रामीण अंचल के सरकारी स्कूलों में मिलने वाले भोजन के बदले पैसा देने का विकल्प बहुत से बच्चों को भोजन के अधिकार से वंचित कर देना होगा।
सातवीं और आठवीं कक्षा के बच्चों ने बताया कि अगर उनकी मातृभाषा में किताबें होतीं तो उनके लिए पढ़ना-समझना आसान होता। हिंदी की मुश्किलों को भी वे बड़ी बेबाकी से सामने रखते हैं। तो आइए 'बच्चों की दुनिया' में आज रूबरू होते हैं बच्चों की लिखावट से।
भारत एक 'कृषि प्रधान' देश है। ऐसा कोई वाक्य लिखना ख़ुद अपनी बात को नकारने जैसा ही है। कृषि की…
“बच्चों को हिंदी में पढ़ना सिखाना बहुत आसान काम है। लेकिन हिंदी में लिखना सिखाना काफी मुश्किल काम है।" यह कहना है एक शिक्षक का। इस पोस्ट में पढ़िए पढ़ना-लिखना सीखने से जुड़े रोचक अनुभवों के बारे में।
बच्चे अपने सवालों की लंबी लिस्ट खोलकर एक अजीब सी स्थिति में डाल देते थे। पढ़िए फेलोशिप डायरी।
स्कूल के बच्चों में काफी उत्साह था। वे काफी खुश लग रहे थे। आज के दर्शनीय स्थल के रूप में स्कूल के…