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अर्ली लिट्रेसीः क्या हैं मायने?

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लिखना अपने अर्थ को दूसरे तक पहुंचाने का माध्यम है।

अर्ली लिट्रेसी शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल अमरीका में किया गया। अर्ली लिट्रेसी यानि बचपन में विकसित होने वाली साक्षरता का यह तात्यपर्य नहीं है कि बच्चे को जितना जल्दी पढ़ना-लिखना सिखा दिया जाए उतना ही बेहतर है। इसका अर्थ है कि बच्चों के स्वाभाविक विकास की प्रक्रिया में ही उसे पढ़ना-लिखना सिखाना जरूरी है क्योंकि पढ़ना एक बुनियादी कौशल है।

इसकी अवधारणा के बारे में बताते हुए प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार इस विषय पर वक्तव्य देते हुए कहते हैं, “पढ़ना एक बुनियादी कौशल है। इस कौशल पर बच्चों का शेष विकास निर्भर है। चाहे विज्ञान हो या गणित या फिर अन्य विषय। सबकुछ पर निर्भर है कि बच्चे समझकर पढ़ पाते हैं या नहीं। पढ़ने में रुचि विकसित कर पाते हैं या नहीं और ख़ुद अपनी समझ से किताबों को चुनने की क्षमता का विकास उनमें हो पाता है या नहीं।”

लिखने का जिक्र करते हुए वे कहते हैं, “लिखने का पढ़ने के साथ क्या संबंध है? क्या वे लिखने में भी इस दृष्टिकोण से देखना शुरू कर देते हैं या नहीं कि यह अपने अर्थ को दूसरे तक पहुंचाने का माध्यम है। और दूसरे के अर्थ को समझने का माध्यम है पढ़ना। या वे इन दोनों को एक तकनीकी अर्थ में देखते हैं जैसा कि स्कूलों में होता है।

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