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अर्ली लिट्रेसीः पहली कक्षा में पढ़ रहे कम उम्र के बच्चों का क्या होगा?

आंगनबाड़ी केंद्र में खेलते बच्चे। भारत में लंबे समय से यह मांग की जा रही है कि सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के प्री-स्कूलिंग के लिए भी क़दम उठाना चाहिए ताकि इन बच्चों को भविष्य की पढ़ाई के लिए पहले से तैयार किया जा सके। उनको पढ़ने और किताबों के आनंद से रूपरू करवाया जा सके।

भारत में लंबे समय से यह मांग की जा रही है कि सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के प्री-स्कूलिंग के लिए भी क़दम उठाना चाहिए।

शिक्षा का अधिकार क़ानून (आरटीई) के मुताबिक़ पहली कक्षा में प्रवेश के समय बच्चे की सही उम्र छह साल है। इससे कम उम्र के बच्चों का प्रवेश या उम्र में हेरा-फेरी करके बच्चों को एडमीशन देना क़ानूनी रूप से ग़लत है। यह शिक्षा के अधिकार क़ानून का भी उल्लंघन है।

क्योंकि आरटीई छह से चौदह साल तक की उम्र के बच्चों को शिक्षा के अधिकार की गारंटी देता है। मगर हाल के वर्षों में कम उम्र के बच्चों को एडमीशन देने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसके कारण बहुत से सरकारी स्कूलों में ऐसे बच्चे नज़र आते हैं जिनको घर पर और पड़ोस में खेलना चाहिए। दादा-दादी के साथ वक़्क गुजारना चाहिए। छोटे बच्चों के साथ मोहल्ले में धमाचौकड़ी करनी चाहिए।

पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की स्थिति

हमारे देश में सरकार की तरफ़ से प्री-स्कुलिंग की कोई व्यवस्थित सुविधा नहीं है। सरकार की तरफ़ से आँगनबाड़ी केंद्रो का संचालन किया जाता है। लेकिन बहुत सी जगहों पर उनकी हालत इतनी खस्ता है कि बच्चे तो क्या बड़ों को भी वहां जाने का मन न करे। कुछ राज्यों में जैसे उत्तराखंड में प्राथमिक स्कूलों के भीतर ही आँगनबाड़ी केंद्र संचालित हो रहे हैं, इससे पहली कक्षा में एडमीशन से पहले बच्चों को वहां भेजाना आसान है। वहीं राजस्थान के कुछ आँगनबाड़ी केंद्र भी स्कूलों के भीतर स्थित है, लेकिन यह महज संयोग की बात है।

राजस्थान में प्राथमिक शिक्षा की आवश्यकता को समझते हुए कुछ-एक आँगनबाड़ी केंद्रों पर पूर्व-प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्ति साल 2013 में की गई थी। इससे जुड़ी एक ख़बर दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुई थी, ” महिला एवं बाल विकास विभाग के अंतर्गत आंगनवाड़ी केंद्रों में आने वाले बच्चों को पढ़ाने के लिए नियुक्त किए गए पूर्व प्राथमिक शिक्षकों को अब सरकारी स्कूलों में भी अध्ययन कार्य करवाना पड़ेगा। प्रारंभिक शिक्षा में पिछले लम्बे समय से शिक्षकों के पद रिक्त होने से पढ़ाई व्यवस्था गड़बड़ाई हुई थी। जिसके लिए पूरे राज्य में कार्यरत एनटीटी शिक्षकों को सरकारी स्कूल में अध्ययन करना होगा। जिससे सरकारी स्कूलों को सहयोग मिलेगा। शिक्षण व्यवस्था के लिए एनटीटी शिक्षक को स्कूल में लगाने के बाद इनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी ब्लॉक शिक्षा अधिकारी को दी है। वे संबंधित आंगनवाड़ी केंद्रों वाली स्कूल की जांच कर हाजरी सुनिश्चित करेंगे।”

इससे पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की तरफ़ सरकार के ध्यान देने वाली बात सामने आई थी। इसके तहत डूंगरपुर ,उदयपुर, बांसवाड़ा, सिरोही तथा प्रतापगढ़ जिलों में योजना के क्रियान्वय की बात कही गयी थी। अभी इसका क्या हाल है? इस बारे में कोई रिपोर्ट या कोई ख़बर कहीं पढ़ने को नहीं मिली है।

कम उम्र के बच्चों का एडमीशन

सबसे जरूरी सवाल है कि पहली कक्षा में कम उम्र के बच्चों के एडमीशन की असल वजह क्या है? पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था न होना इसका एक प्रमुख कारण है। इसके अन्य कारणों में से एक है शिक्षकों को बच्चों के नामांकन का टॉरगेट देना। कभी-कभी तो ख़ुद अभिभावक ही अपने छोटे बच्चों के एडमीशन का दबाव बनाते हैं।

भारत में शिक्षा का अधिकार क़ानून एक अप्रैल 2010 से लागू किया गया। इसे पाँच साल पूरे हो गए हैं। इसके तहत 6-14 साल तक की उम्र के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का प्रावधान किया गया है।

भारत में शिक्षा का अधिकार क़ानून एक अप्रैल 2010 से लागू किया गया। इसे पाँच साल पूरे हो गए हैं। इसके तहत 6-14 साल तक की उम्र के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का प्रावधान किया गया है।

अभिभावकों को ऐसा लगता है कि जब पड़ोस के बाकी बच्चे निजी स्कूलों में एलकेजी, यूकेजी में पढ़ रहे हैं तो उनके बच्चे को भी स्कूल जाना चाहिए। ऐसे में वे भी बच्चे की उंगली थामे स्कूल पहुंच जाते हैं, और पहली कक्षा में कम उम्र के बच्चे का एडमीशन कराने की बहस शुरू हो जाती है।

छोटे बच्चों के एडमीशन के पीछे शिक्षकों का एक मनोवैज्ञानिक डर भी काम करता है, उनको लगता है कि अगर उनके स्कूल में कम बच्चे पढ़ रहे हैं तो उनका ट्रांसफर दूसरे स्कूलों में कर दिया जाएगा, इस कारण से भी वे नामांकन बढ़ाने की कोशिश करते हैं।

छोटे बच्चों की परेशानी

सबसे ध्यान देने वाली बात है कि ऐसे छोटे बच्चों के लिए लगातार पाँच-छह घंटे बैठना मुश्किल होता है। जिस उम्र में उनको आज़ादी के साथ घूमना चाहिए। अपनी मर्ज़ी के मुताबिक जीना चाहिए। उस उम्र में वे नियंत्रित होने और निर्देशों के अनुसार संचालित होना सीख रहे हैं। यह बच्चों के ‘बचपन पर हमला’ है। इन बच्चों के लिए पेन पकड़ना भी मुश्किल होता है। वर्णमाला की पहचान और संख्या ज्ञान तो बहुत दूर की बात है।

इस रफ़्तार से चलने की शुरुआत करने वाले बच्चे स्कूल रूपी जेल के क़ैदी बनकर रह जाते हैं, जो हमेशा के लिए पढ़ने-लिखने के कौशल से महरूम हो जाते हैं क्योंकि पढ़ना-लिखना सीखना सही उम्र में ही संभव है। अर्ली लिट्रेसी के बारे में प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार एक लेक्चर में आगाह करते हैं, “अर्ली लिट्रेसी का मतलब बच्चों को जल्द से जल्द पढ़ना-लिखना सिखा देना नहीं है। जैसा कि आजकल हो रहा है। कम उम्र में बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखा देने की दुकाने खुल गई हैं। जो बच्चों को कम उम्र में ही पढ़ना सिखा देने की जरूरत को बढ़ावा दे रही हैं।”

जो पहली में पढ़ रहे हैं, उनका क्या होगा?

ग़ौर करने वाली बात है कि पड़ोसियों को इस बात की भी चिंता होती है कि कोई चार साल की लड़की घर पर क्यों रहती है? उसके घर वाले उसे स्कूल क्यों नहीं भेजते। यह इसी अंधी दौड़ से निर्मित होने वाली मानसिकता से उपजा सवाल है। जिसके वशीभूत होकर अभिभावक यह समझने का प्रयास नहीं करते कि छोटे बच्चे की यह उम्र तो घर पर रहने की है। इस उम्र में उसे हमारे और परिवार के देखभाल की सबसे ज़्यादा जरूरत है। मगर उनको कौन समझाएं कि बच्चों का बचपना महफूज रहने दीजिए, छह साल की उम्र से छोटे बच्चों को स्कूल मत भेजिये।

मगर सबसे गंभीर स्थिति तो उन बच्चों की है जिनका एडमीशन पहली कक्षा में हो गया है, उसके लिए सरकार ही कुछ कर सकती है। क्योंकि चार-साढ़े चार साल की उम्र वाले बच्चे अब शिक्षा के अधिकार क़ानून के दायरे में आते हैं। उनको फेल नहीं किया जा सकता है। उनको अगली कक्षा में जाने से रोका नहीं जा सकता है। उनको पाँच साल की उम्र में दूसरी कक्षा में न भेजना बच्चे के उन अधिकारों का हनन करना है, जो उसे शिक्षा के अधिकार की गारण्टी देता है। एक अधिकार देने के चक्कर में बच्चों का बचपना छीन रहा है। इस तथ्य पर हम बड़ो की नज़र क्यों नहीं जाती, बच्चे तो ख़ैर बच्चे हैं।

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