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‘ग्रोथ माइंडसेट’ का विकास कैसे करें?

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स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर कैरेल ड्वेक ने ‘ग्रोथ माइंडसेट’ का संप्रत्यय दिया।

शिक्षा के क्षेत्र में होने वाली चर्चाओं में ग्रोथ माइंडसेट का संप्रत्यय काफी लोकप्रिय हो रहा है। यह थ्योरी स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर कैरेल ड्वेक ने दिया। एक छात्र के रूप में बच्चा अपने बारे में क्या सोचता है, इसका भी बच्चे के सीखने पर बड़ा असर पड़ता है। ग्रोथ माइंडेट या विकास मानसिकता के क्षेत्र में होने वाले शोध ग़ैर-संज्ञानात्मक कारकों की पहचान कर रहे हैं जो शैक्षिक अधिगम के लिहाज से बेहद अहम हैं।

यह एक सकारात्मक संकेत है कि शिक्षक विकास मानसिकता के शोध को महत्वपूर्ण मानते हैं और विश्वास करते हैं कि इसे क्लासरूम में लागू किया जा सकता है। विकास मानसिकता एक विश्वास है कि किसी इंसान की ख़ासियत में बदलाव हो सकता है और हम अपनी बुद्धि व क्षमताओं का भी विकास कर सकते हैं।

‘ग्रोथ माइंडसेट’ का विकास कैसे करें?

इस सामान्य विचार को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। कई बार लोगों को लगता है कि विकास मानसिकता का अर्थ है कि शिक्षक द्वारा बच्चों की मेहनत के लिए तारीफ़ की जाए। बहुत से मामलों में यह लागू नहीं होता और छात्रों को महसूस कर सकते हैं कि यब बनावटी तारीफ है। इस पूरी बात को अलग तरीके से समझने का प्रयास किया जा सकता है। शुरूआत में बहुत से छात्र अभी यह बात नहीं सीख पाए होते हैं कि कठिन मेहनत करने में सोचने की मेहनत भी शामिल है। इसमें चिंतन (रिफलेक्शन) भी शामिल होता है। जरूरत के अनुसार अपने सीखने की रणनीति में बदलाव करना भी शामिल होता है ताकि हम ज्यादा प्रभावशाली ढंग से सीख सकें। छात्रों को यह बात समझाने के लिए हमें मदद करने की जरूरत है।

उदाहरण के तौर पर। भाषा के एक कालांश में एक बच्चे को हिंदी पढ़ने के दौरान मात्राओं को पढ़ने के लिए बारहखड़ी की मदद लेनी पड़ती थी। इसके कारण उसे अपनमे दिमाग़ पर काफी जोर डालना पड़ता था। ऐसी स्थिति में वह छात्र कोई न कोई बहाना बनाकर क्लास से बाहर जाना चाहता था ताकि सोचने वाली मेहनत से खुद को बचा सके। ऐसे छात्र को प्रेरित करने के लिए शिक्षक ने अपना समय देना शुरू किया और पढ़ने में रुचि बने इसके लिए कहानी की किताबों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया और कहानियां पढ़कर सुनाई ताकि बच्चे किताबों के प्रति एक स्वाभाविक लगाव विकसित हो सके। इस प्रक्रिया में कुछ महीने लगे। मगर धीरे-धीरे उस छात्र ने धारा-प्रवाह पठन की क्षमता का विकास कर लिया। शिक्षक की तरफ से मिलने वाले प्रोत्साहन और निर्देशों से उसे मदद मिली। शिक्षक भी उसकी परिस्थिति को ज्यादा बेहतर ढंग से समझ पाए।

छात्रों के ‘कोच’ बनें शिक्षक

छात्रों में ‘ग्रोथ माइंडसेट’ का विकास करने के लिए शिक्षक अपने छात्रों की कोचिंग कर सकते हैं। हर किसी छात्र को अपनी दक्षता के अनुसार आगे बढ़ने की रणनीति का अपनाने में मदद कर सकते हैं। इसके लिए छात्रों द्वारा अपनाई जाने वाली रणनीतियों की तारीफ़ करना भी शामिल हो सकता है, इससे बच्चों को लगेगा कि उनका सोचना भी मायने रखता है। समस्या समाधान के उनके कौशल को महत्व देना इस दिशा में सोचने के लिए भी छात्रों को प्रेरित करेगा। यह प्रक्रिया काफी जटिल है और इसको चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाना होगा। ताकि बच्चे स्वतंत्र पाठक के साथ-साथ स्वतंत्र चिंतक भी बन सके।

सीखने के लिए कितनी महत्वपूर्ण हैं गलतियां?

आख़िर में एक बेहद महत्वपूर्ण बात। ‘ग्रोथ माइंडसेट’ के संदर्भ में एक बात कही जाती है कि गलतियां अच्छी हैं, हम गलतियों से सीखते हैं। पर इस बात को ज्यादा व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है कि सभी गलतियां सीखने के लिहाज से महत्वपूर्ण नहीं होतीं। इसलिए हमें अपनी उन पर विचार करते हुए उन ग़लतियों पर सबसे ज्यादा ध्यान देना चाहिए जहाँ से मिली हुई सीख, अगली बार किसी काम को ज्यादा कुशलता से करने में मददगार होगी।

आमतौर पर ऐसी गलतियां तब होती हैं जब बच्चे अपने अपनी सहजता के दायरे के बाहर प्रयास कर रहे होते हैं। यानि किसी कठिन काम को करने के बाद बच्चों को जो ख़ुशी महसूस होती है, वैसे लम्हे सीखने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान ग़लतियों के बारे में सोचना और अगली बार योजना में सुधार करना छात्रों को ज्यादा सशक्त बनाता है और उनके आत्म-विश्वास में बढ़ोत्तरी होती है।

(एजुकेशन मिरर की इस पोस्ट को पढ़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। इस पोस्ट के बारे में अपनी राय साझा करिए। अपने नाम के साथ अपनी टिप्पणी कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं। शिक्षा से जुड़े कोई सवाल, सुझाव या लेख आपके पास हों तो साझा करें। हम उनको एजुकेशन मिरर पर प्रकाशित करेंगे ताकि अन्य शिक्षक साथी भी इससे लाभान्वित हो सकें।)

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