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बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

कहानी: ‘इधर देख चंदा’

इस पोस्ट में पढ़िए यशस्वी की लिखी एक कहानी।

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उसके हाथों में और उस जैसे अक्सर देखी हैं मैने ‘काली चूड़ियां’। वो खनकती नहीं हैं। मचलती नहीं हैं। सरकती नहीं हैं। स्थिर रहती हैं, अपनी सीमाओं तक। यहाँ तक कि वे कलाइयों तक भी आने का साहस नहीं करतीं। पता नहीं क्युं? जबकि मनाही भी नहीं है उनको।  क्या ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि वो किन कलाइयों पर सजती हैं या फिर, काले रंग को इज़ाज़त नहीं है कि वो खुद को हर जगह, परिस्थिति में आबाद कर सके, जीवंत रहने। एक-दूसरे पर चढ़ी हुई, सिसकी हुई, उसकी ही कलाइयों में क्यों, ठहर जा रही है वो।

जब काले बालों को आज़ादी है। काली आँखों को आज़ादी है। काले काजल को आज़ादी है और काली जुबान को भी…। उसकी देह पर काले रंग के साथ अभी बैंगनी, सफेद, धुंधला, मिट्टी सा भूरा और बारिश सी रिसती बूँद के बूंदे बनी है, सब खिल रहे, विस्तृत भी, मगर, वो काली चूड़ियाँ……? वो क्युँ उदास है हर दिन की तरह, आज भी? जबकि काला रंग तो सबसे खूबसूरत होता है जैसे कि काले बादल, स्याही सी काली रात, काले बालों की ताउम्र तमन्ना होती है सबको। फिर क्या हुआ है उन काली चूड़ियों को…। अगर उनका रंग काला न होता तो…..? (चंदा के हाथ में बँधे काले धागे की चूड़ियों को समर्पित)

(लेखक परिचयः यशस्वी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एमए किया है। वर्तमान में आप उदयपुर में सेवा मंदिर के साथ काम कर रही हैं। यशस्वी को बच्चों से बात करना और उनके सपनों व कल्पनाओं की दुनिया को जानना बेहद पसंद है।)

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