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नई शिक्षा नीति-2019 ड्राफ्ट: तीन भाषा वाले फार्मूले पर होने वाले विवाद का समाधान क्या है?

नई शिक्षा नीति-2019 के ड्राफ्ट में हिंदी भाषा को लेकर शुरू हुआ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। तमिलनाडु के साथ-साथ अन्य राज्यों जैसे महाराष्ट्र इत्यादि से भी हिंदी थोपने वाले मसौदे की कड़ी आलोचना हो रही है। इस सिलसिले में शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर अध्ययन-अध्यापन से जुड़े मनोज कुमार बेहद ग़ौर करने वाली बात कहते हैं, जो तीन भाषाओं वाले विवाद के समाधान की दिशा में सोचने-समझने की गुजारिश करती है।

भाषावैज्ञानिक दृष्टि से सभी भाषाएँ संवाद और विचार के लिए पूर्णतः सक्षम होती हैं | किसी भाषा के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संपर्क भाषा के रूप में उभरने का कारण भाषा के भीतर मौजूद नहीं होता है, बल्कि ऐतिहासिक आकस्मिकताओं के कारण कोई भाषा संपर्क भाषा का रूप ले लेती है | ऐतिहासिक आकस्मिकताओं पर हमारा कोई वश नहीं है, इसलिए भाषा और सत्ता के संबंधों को स्वीकारते हुए शिक्षा से वंचित तबकों के लिए शिक्षा नीति निर्धारित की जानी चाहिए |

त्रिभाषा फॉर्मूले की ‘आदर्श स्थिति’

  1. स्थानीय मानकीकृत भाषा – शिक्षा का माध्यम
    2 .कोई एक विदेशी भाषा – भाषाओं की सूची में अंग्रेजी, जर्मन सब विकल्प के रूप में मौजूद हों|
  2. कोई एक और भारतीय भाषा- भाषाओं की सूची में हिन्दी, उर्दू, तमिल सब सब विकल्प के रूप में शामिल भी हों|

विदेशी भाषाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता के लिए आप कोई ऐसा तर्क नहीं पेश कीजिएगा जो प्रकारांतर से हिंदी के पक्ष में भी चला जाए| ध्यान रखिएगा|

मैंने आदर्श त्रिभाषा फार्मूला पेश किया है| लेकिन हमारी एकमात्र मुश्किल यह है कि हम अमूर्त-आदर्श समय में नहीं, ऐतिहासिक समय में रहते हैं| और कृपया आलोक राय की किताब “Hindi Nationalism” का हवाला नहीं दीजिएगा| जब किताब आई थी तभी मैंने पढ़ ली थी| मुझको वह एक overrated काम लगता है| वैसे भी वह किताब नहीं, कितबिया है| चंद्रभान प्र. आदि ने तो खैर कोई किताब भी नहीं लिखी है | बयानबाजी पर क्या बात की जाए|

(लेखक परिचय: मनोज कुमार पिछले 11 वर्षों से स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं और शिक्षा के समाजशास्त्र, भाषा-शिक्षण, बाल-साहित्य जैसे विषयों के अध्ययन-अध्यापन से जुड़े हैं|शिक्षा से जुड़े समसामयिक मुद्दों पर सतत लिख रहे हैं।)

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