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नाम है पासबुक, करती है फेल

पाठ्यपुस्तक विवाद, नई किताबें, पाठ्यपुस्तकों पर राजनीति, हड़बड़ी का बदलाव

किताब के सारे सवालों के जवाब पासबुक में लिखे होते हैं। इसका इस्तेमाल बच्चे सवालों का जवाब याद करने के लिए करते हैं।

बड़े गुरू जी का नाम “संजीव” है। ये हर बच्चे और शिक्षक के  पास मिल जाएंगे। जब भी उनको पढ़ाई -लिखाई से जुड़ी कोई समस्या आती है तो वे इन्हीं की शरण में जाते हैं। जब स्कूल खुलता है तो बच्चे नए झोले-बस्ते की जिद के बाद बड़े गुरू जी को याद करते हैं।

बड़े गुरू जी की संगत में छोटे गुरू जी (स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक) खौफ नौ दो ग्यारह हो जाता है। बच्चों को पता है कि वे भी बड़े गुरू जी के दरबार में ही माथा टेकते हैं। संजीव एक गाइड (पास बुक) है। जो बच्चों के पाठ्यक्रम से जुड़े सारे सवालों का जवाब पहले से जानती है।

पासबुक का असर

राजस्थान के हर सरकारी स्कूल की आलमारी और बच्चों के झोले से सहजता से बरामद हो जाती है। इसका इतना क्रेज है पूछिए मत। टीचर जब बच्चों को पढ़ाते हैं तो बच्चे इससे मेल कराते हैं कि गुरू जी सही पढ़ा रहे है या नहीं। अपने छः-सात महीने के सफर में इसके बारे में अक्सर सोचता रहा हूं।

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इसके बारे में कुछ शिक्षकों का कहना है कि इसके कारण उनकी इज्जत में कमी आई है। बच्चे उनको गंभीरता से नहीं लेते। कोई भी काम दो वे घर पर इससे नकल मारकर ले आते हैं। इससे उनकी सोचने की क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। केवल उसी पर निर्भर रहने वाले शिक्षकों का भी यही हाल है। सोचने और खुद से प्रयास करने की प्रक्रिया पर इसके हमले की गंभीरता का हमको अंदाजा लग रहा होगा।

जब हर सवाल का जवाब बड़े गुरू जी से मिल जाता है तो बच्चों और शिक्षकों को परेशान होने की क्या जरूरत है ? बच्चों का कहना है कि इससे शिक्षकों के ऊपर उनकी निर्भरता कम हो जाती है। कोई भी पाठ लिखना और याद करना हो तो किसी की जरूरत नहीं पड़ती। उनकी यह बात स्कूल के एक महत्वपूर्ण पहलू की तरफ इशारा करती है कि इससे बच्चों और अध्यापकों के आपसी रिश्ते तो प्रभावित होते हैं। बच्चों के आपसी रिश्तों पर भी इसका बहुत विपरीत प्रभाव पड़ता है। उनकी आपस में एक दूसरे की मदद करने की सहज मानवीय प्रवृत्ति भी प्रभावित होती है।

क्लासरूम में होने वाली पढ़ाई हो रही प्रभावित

स्कूल आकर पढ़ाई करने और दूरस्थ शिक्षा से पढ़ाई के बीच का अंतर धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। बच्चे और अध्यापक स्कूल में पढ़ने-पढ़ाने (सही अर्थों में सीखने-सिखाने) की प्रक्रिया में शामिल होने आते हैं। उनकी इस जरूरत को पूरा करने के लिए गाइडबुक्स का प्रवेश पूरी प्रक्रिया को बहुत गहराई से प्रभावित करता है। इसका सम्मान या महत्व बढ़ने का मतलब बाकी दोनों (अध्यापक और बच्चे) के सम्मान में कमी होना है।

वर्तमान में शिक्षण प्रक्रिया की दो आधारभूत मान्यताएं हैं कि बच्चा खुद से सीखता है और शिक्षक सीखने-सिखाने की इस प्रक्रिया को आसान बनाने का काम करता है। इसके पक्ष में माहौल बनाने में अपना योगदान देता है। इन दोनों मान्यताओं पर खरा उतरने के लिए क्लॉस रूम में शिक्षण की प्रक्रिया को ज्यादा सहभागी और जीवंत बनान होगा। बच्चे को यह भरोसा दिलाना होगा कि क्लॉस रूम में किसी पाठ को पढ़ने का अनुभव गाइड से पढ़ने से बहुत ज्यादा आनंददाई और रुचिकर हो सकता है।

एक दिन मैने बच्चों को एक पाठ को सहभागी तरीके से पढ़ाकर पूछा कि गाइड से पढ़कर क्या हमको इतना ही आनंद आता तो उनका सकारात्मक जवाब मिला। उनका कहना था कि इस तरह से पढ़ने में ज्यादा समझे में आता है। मेरे एक स्कूल के प्रधानाध्यापक नें कहा कि बच्चों की लिखित और मौखिक अभिव्यक्ति पर काम करने की जरूरत है। बच्चे गाइड से उतार लाते हैं। परीक्षा में और क्लॉस में लिखते समय बहुत गलतियां करते हैं।

लेखन कौशल पर ध्यान देने की जरूरत

मैनें कहा कि लिखने पर काम करने के लिए हम उनको नए विषय देकर लिखने के लिए कह सकते हैं।इस तरह के सवालों का जवाब किसी गाइड में नहीं मिलेगा उसे खुद से प्रयास करना होगा। इस प्रक्रिया में बच्चे का उत्साह बढ़ाना होगा ताकि वह लिखने के लिए आगे आए।

अर्ली लिट्रेसी, एजुकेशन मिरर, सरकारी बनाम निजी स्कूल, पठन कौशल का विकास, पढ़ना कैसे सिखाएंइस तरह से बच्चा  भी लिखेगा वह उसका सोचने और लिखने का वास्तविक स्तर होगा। इसके बाद हम उनको वहां से आगे बढ़ाने के लिए प्रयास करना होगा। लेकिन यह एक लंबी चलने वाली प्रक्रिया होगी। जिसके लिए अध्यापक और बच्चों दोनों को धैर्य़ से काम लेना होगा। तभी इसके सकारात्मक और बेहतर प्रभाव दंखने को मिल सकते हैं।

इसी तरह से क्लॉस में पढ़ाने की प्रक्रिया को मनोरंजक और रुचिकर बनाकर हम उनको गाइड के मोह से मुक्त कर सकते हैं। इससे बच्चों को सोचने के लिए एक नया झरोखा और खिड़की दे सकते हैं।

हमको गाइड्स और पासबुक का विकल्प खोजना होगा और इस बारे में गंभीरता से सोचना होगा कि हमारे घर-परिवार और स्कूल के बच्चे इनके चपेट में तो नहीं आ रहे।

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एक अध्यापक हैं। जिन्होनें इस तरह का प्रयास अपने स्कूल में शुरू किया है। ताकि गाइड्स को बाहर का रास्ता दिखाया जा सके। इसके सकारात्मक परिणाम भी उनको मिल रहे हैं। उनकी 8वीं क्लॉस के बच्चे उनसे सीनियर स्कूल में चलने की जिद कर रहे हैं।पहली-दूसरी के बच्चे उनसे पूछ रहे हैं कि क्या आप उनके स्कूल में चले जाओगे। काश…हमारे पास ऐसे अध्यापकों की एक पूरी टीम होती तो वे भी अपने बच्चों को खुशी से विदा करते। उनको अपने बच्चों की इतनी चिंता नहीं होती।उन्होनें तय किया है कि वे 8वीं के बच्चों को पास होने के बाद भी रोजाना एक घंटा पढ़ाया करेंगे। इस विचार को मूर्त रूप देने वाले अध्यापक जी के बारे में जल्दी ही लिखुंगा। हमारे स्कूलों को ऐसे अध्यापकों की बहुत जरूरत है। जो अपने काम को एक पैशन की तरह देखते हैं।

Amrita Tanmay

आपकी सोच में एक उम्मीद की किरण दिखती है ..

बहुत-बहुत शुक्रिया शान्ती जी।

एक अध्यापक हैं। जिन्होनें इस तरह का प्रयास अपने स्कूल में शुरू किया है। ताकि गाइड्स को बाहर का रास्ता दिखाया जा सके। इसके सकारात्मक परिणाम भी उनको मिल रहे हैं। उनकी 8वीं क्लॉस के बच्चे उनसे सीनियर स्कूल में चलने की जिद कर रहे हैं।पहली-दूसरी के बच्चे उनसे पूछ रहे हैं कि क्या आप उनके स्कूल में चले जाओगे। काश…हमारे पास ऐसे अध्यापकों की एक पूरी टीम होती तो वे भी अपने बच्चों को खुशी से विदा करते। उनको अपने बच्चों की इतनी चिंता नहीं होती।उन्होनें तय किया है कि वे 8वीं के बच्चों को पास होने के बाद भी रोजाना एक घंटा पढ़ाया करेंगे। इस विचार को मूर्त रूप देने वाले अध्यापक जी के बारे में जल्दी ही लिखुंगा। हमारे स्कूलों को ऐसे अध्यापकों की बहुत जरूरत है। जो अपने काम को एक पैशन की तरह देखते हैं।

Amrita Tanmay

आपकी सोच में एक उम्मीद की किरण दिखती है ..

Shanti Garg

बहुत बेहतरीन….मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

बहुत-बहुत शुक्रिया शान्ती जी।

Shanti Garg

बहुत बेहतरीन….मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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