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बाल-मनोविज्ञान का ककहरा तक नहीं जानते शिक्षक!!

स्कूल जाते बच्चे।

स्कूल जाते बच्चे।

हमारे सरकारी स्कूलों में पढ़ने बच्चों के बारे में माता-पिता और शिक्षक क्या सोचते हैं? वे ऐसा क्यों सोचते हैं ? वै ऐसा कितने लंबे समय से सोच रहे हैं ? इन सवालों का जवाब जानना जरूरी है। यह हमें वास्तविक स्थिति को समझने में मदद करने वाले सवाल हैं। 

ये कैसी सोच है?
अध्यापकों के ट्रेनिंग देने वाले एक शिक्षक कहते हैं, ” है कि सरकारी स्कूल में आने वाले बच्चे कचरा हैं। अच्छे बच्चे तो निजी स्कूलों में चले जाते हैं।” इस तरह के विचार से जाहिर होता है कि इसमें बच्चों के लिए सम्मान की भावना नहीं है। अगर बच्चों को पढ़ना नहीं आता है तो वे किसी योग्य नहीं हैं। एक शिक्षक के मन में तो अपने स्कूल के हर बच्चे के लिए स्नेह, अपनेपन और समानुभूति की एहसास होना चाहिए। इसके अभाव में ऐसे विचार सामने आते हैं जो बच्चों को प्रेम, परवाह और स्नेह के हक़ से वंचित करते हैं।
मैकाले का मकसद
बच्चों के बारे में ऐसे विचारों से लगता है कि लार्ड मैकाले साहब अपने मक़सद में काफ़ी हद तक कामयाब हो गये। मैकाले का यही मकसद था कि भारत के लोगों को ऐसी शिक्षा दो कि उनमें से कुछ लोगों को उनके ही खिलाफ खड़ा किया जा सके। हमारे समाज में ऐसी घटनाएं बार-बार दिखायी देती हैं जब सामान्य व बड़े पदों पर पहुंचे अंग्रेजीदां लोग बाकी लोगों को कमतरी वाली निगाह से देखते हैं। मानो उनके सींग-पूंछ उग आई है।
 
सरकारी स्कूल के बच्चों के बारे में यह बात सरकारी स्कूल के शिक्षकों को सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की ट्रेनिंग देने वाले शिक्षक के हैं। उनका कहना है कि अच्छे बच्चे निजी स्कूलों में चले जाते हैं। सरकारी स्कूलों में कचरा ही बचता है।  वे पढ़ने में कमजोर होते हैं। उनमें प्रतिभा का अभाव होता है। उनके अभिभावक उनके ऊपर ध्यान नहीं देते। उनके घर में बेहतर माहौल नहीं मिलता। अभिभावक दारू-शराब पीते हैं। बच्चे भी उनकी राह पर चलते हैं।
पूर्वाग्रहों से मुक्त होना जरूरी
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ऐसे तमाम आग्रहों-पूर्वाग्रहों से लदे-फंदे शिक्षक अपने स्कूल के बच्चों से कैसे पेश आते होंगे। इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। ऐसी सोच से शिक्षकों को बाहर निकालना वास्तव में एक बड़ी चुनौती शिक्षक होना केवल बीएड और एसटीसी की डिग्री ले लेना है। यह बाल-मनोविज्ञान के उस ककहरे को याद रखना और उसे जीवन में उतारा भी है, जो आपने अपनी पढ़ाई के दौरान सीखा था।
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मेरा मानना है कि बच्चों को मात्र बच्चा होने के नाते प्यार और सम्मान मिलना चाहिए। एक शिक्षक के लिए तो बाल-मनोविज्ञान की समझ बेहद जरूरी है। केवल थ्योरी में मिले नंबरों से बात नहीं बनती। वास्तव में सीखना तो वही है जो हम जीवन व्यवहार में उतार पाए हैं। बाकी तो सब हमने केवल बुद्धि के स्तर पर समझकर मान लिया है। बच्चों के बारे में ऐसी राय रखने वाले शिक्षक तो बच्चों से ज्यादा नादान हैं। अच्छी सोच का हमारे ऊपर सकारात्मक असर होता है और जिन बच्चों के साथ हम काम करते हैं उनका भी मनोबल बढ़ता है।
 
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DR RADHA KISHAN SONI

yah vastvikta hai. n to balmanovigan jaante hain awan n hi jaanna chhahate hain. balki koshish karate hain ki jo koi thodo sa jaanata hai usko kaise bhulaen. Dr. RK Soni

DR RADHA KISHAN SONI

yah vastvikta hai. n to balmanovigan jaante hain awan n hi jaanna chhahate hain. balki koshish karate hain ki jo koi thodo sa jaanata hai usko kaise bhulaen. Dr. RK Soni

बहुत-बहुत शुक्रिया अमृता जी। यह आलेख शिक्षा व्यवस्था में मौजूद शिक्षकों की मानसिकता के बारे में सोचने और सवाल खड़े करने के दृष्टिकोण से लिखा गया था। समाज के सबसे प्रगतिशील तबके का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों की सोच अगर इस तरह की है तो बाकियों का क्या होगा………..उनको सही तरीके से सोचने की दिशा में प्रेरित करने का काम करना है। ताकि स्कूलों में बदलाव का चिराग रौशन हो सके।

Amrita Tanmay

पता नहीं बीएड में वे क्या पढ़ते हैं..जो ककहरा भी नहीं जानते..बाल-मनो विज्ञान का..

बहुत-बहुत शुक्रिया अमृता जी। यह आलेख शिक्षा व्यवस्था में मौजूद शिक्षकों की मानसिकता के बारे में सोचने और सवाल खड़े करने के दृष्टिकोण से लिखा गया था। समाज के सबसे प्रगतिशील तबके का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों की सोच अगर इस तरह की है तो बाकियों का क्या होगा………..उनको सही तरीके से सोचने की दिशा में प्रेरित करने का काम करना है। ताकि स्कूलों में बदलाव का चिराग रौशन हो सके।

Amrita Tanmay

पता नहीं बीएड में वे क्या पढ़ते हैं..जो ककहरा भी नहीं जानते..बाल-मनो विज्ञान का..

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