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बच्चे और बड़े दोनों इस मामले में एक जैसे हैं!!

बच्चे, पढ़ना सीखना, बच्चे का शब्द भण्डार कैसे बनता है

बच्चों का शब्द भण्डार कैसे विकसित होता है।

एक छोटा बच्चा और एक बड़ा व्यक्ति दोनों जब अपनी बात कहते हैं तो यह मानकर चलते हैं कि उनकी बात को सुनने वाला पूरी तरह समझ रहा है। बच्चों से होने वाली एक बातचीत के दौरान इस पहलू की तरफ मेरा ध्यान गया।

अपनी बात कहते समय छोटे बच्चों को यह ध्यान नहीं रहता कि सामने वाला उनकी बात को समझ पा रहा है या नहीं। वे एक फ्लो में बस अपनी बात कहते चले जाते हैं। उनके लिए धैर्य के साथ सुनने का भरोसा ही बहुत होता है।

जब हम बड़े बच्चों से बात कर रहे होते हैं तो हम भी इस बात का ख्याल रखना भूल जाते हैं कि वे हमारी बात समझ पा रहे हैं या नहीं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, “एक स्कूल में आठवीं क्लास के बच्चों को ‘मतलब’ का मतलब बताना।” हम लोगों के लिए मतलब यानी बड़ी आसान सी बात है। कुछ बच्चों के लिए मतलब की मिनिंग निकालना भी मुश्किल हो सकता है, हमें इस बात को समझना चाहिए।

भरोसा है जरूरी

पहली क्लास में पढ़ने वाला एक बच्चा बता रहा था कि उसे कौन सा अक्षर समझ में आ रहा है और कौन सा नहीं। स्थानीय भाषा में कही गई उसकी बात के मायने थोड़े-थोड़े समझ में आ रहे थे, मगर पूरी बात समझ में नहीं आ रही थी। भाषा शिक्षक भी पास ही में मौजूद थे। उन्होंने कहा, “बच्चा कह रहा है कि नहीं आ रहा है। इसे मारवाड़ी भाषा में नीठा कहते हैं।”

हम बड़े भी लोगों से बात करते समय ऐसा मानकर चलते हैं कि सामने वाले को हमारी बात पूरी तरह समझ में आ रही है। यानि इस मामले में बड़े और बच्चों में कोई अंतर नहीं है। दोनों कमोबेश एक जैसी मान्यता के साथ संचालित हो रहे होते हैं।

हालांकि बड़े संदेहवश समझे जाने पर सवाल खड़ा कर लेते हैं, मगर बच्चे तो पूरे भरोसे के साथ अपनी बात कहते हैं। अगर उनको लगता है कि सामने वाला उनकी बात पर ग़ौर कर रहा है। उनको ध्यान से सुना जा रहा है।

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