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शिक्षकों की तारीफ में कंजूसी क्यों?

किसी सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले काम को अमूमन आराम की नौकरी माना जाता है। शिक्षकों के बारे में लोगों की राय होती है कि अरे! स्कूल में क्या काम होता है। बस हाजिरी लगाओ और पूरा दिन अच्छे से बिताकर घर वापस लौट आओ। शिक्षकों के आईक्यु टेस्ट वाली ख़बरें भी आती रहती हैं कि शिक्षकों को फलां चीज़ नहीं आती, इस क्लास के बच्चे उस क्लास की किताब नहीं पढ़ सकते, स्कूल के एमडीएम में छिपकली गिरने जैसी ख़बरों को भरपूर सुर्खी मिलती है। मगर स्कूलों के बारे में अच्छी ख़बरें कम ही पढ़ने को मिलती है कि किसी स्कूल में बहुत अच्छे काम को किसी अख़बार ने अपनी राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खी बनाई हो और पूरे देश में उसकी चर्चा हो रही हो।

स्कूल की रैली में जाते बच्चे और शिक्षकमैंने व्यक्तिगत तौर पर ऐसे बहुतेरे सरकारी स्कूल देखे हैं जहाँ शिक्षक मन से पढ़ाते हैं। साथी शिक्षकों की तरफ से मिलने वाले उलाहने को दरकिनार करके लगन से अपना काम करते हैं। ऐसे दौर में जब हर कोई शिक्षकों की आलोचना करने को तत्पर दिखाई देता है, सच बात भी कही जानी चाहिए ताकि लोगों को लगे कि वाह! ऐसे काम की तो सच में तारीफ बनती है।

पहला उदाहरण: एक स्कूल में दूसरी क्लास के बच्चे फटाफट किताब पढ़ते हैं। स्कूल के शिक्षकों ने यह काम बग़ैर किसी ग़ैर-सरकारी संस्था के सपोर्ट के किया। यहां पढ़ाने वाले भाषा शिक्षक की उम्र 60 के पार है। एक-दो साल में वे रिटायर होने वाले हैं, मगर उनके पढ़ाने का जज्बा ऐसा है कि युवाओं को भी मात देता है।

इस स्कूल में उन्हीं के पढ़ाए हुए छात्र शिक्षक बनकर आए हैं जो अपने इन शिक्षक का काफी सम्मान करते हैं। क्या हमें ऐसे शिक्षकों की तारीफ नहीं करनी चाहिए। क्या हमें ऐसे शिक्षकों की कोशिश और काम को खुले दिल से स्वीकार नहीं करना चाहिए। इस सवाल का एक सीधा सा जवाब होगा, हाँ जरूर करना चाहिए। वह भी बग़ैर किसी कंजूसी के।

पढ़ेंः जीवन की पाठशाला के शिक्षकों का शुक्रिया

दूसरा उदाहरणः आदिवासी अंचल में स्थित एक स्कूल में पहली क्लास के बच्चे हिंदी भाषा में मिलने वाले निर्देशों को समझ पाते हैं। क्लास में बच्चों को अपने घर की भाषा बोलने की पूरी छूट है। बच्चे सवालों का जवाब देने के लिए तत्पर दिखाई देते हैं। किताबों के साथ बच्चा का बेहद अच्छा रिश्ता बना है, जिसका श्रेय भाषा शिक्षक का बच्चों के प्रति स्नेह और उन्हें पढ़ना सिखाने की लगन को दिया जा सकता है। इस स्कूल में एक ग़ैर-सरकारी संस्था काम कर रही है जो बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने और पढ़ने की आदत का विकास करने के ऊपर फोकस होकर काम करती है।

यहां के भाषा शिक्षक ने अपने अनुभव का इस्तेमाल दूसरी क्लास में सीधे प्रवेश लेने वाली एक लड़की को पढ़ाने के लिए किया। उसकी जिज्ञासा काबिल-ए-तारीफ है। यह शिक्षक स्कूल में अपना समय बिल्कुल भी खराब नहीं करते, यहां स्टाफ कम हैं। इसलिए वे एक क्लास से खाली होते ही दूसरी क्लास में चले जाते हैं, क्या हम ऐसे शिक्षक के हौसले की दाद नहीं देंगे। या फिर यह कहकर संतोष कर लेंगे कि ये तो सरकारी स्कूल में पढ़ाते हैं। सरकार से वेतन उठाते हैं, इनकी तारीफ करने की क्या जरूरत है।

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सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों की तारीफ हमें क्यों करनी चाहिए, उसके पाँच कारणों पर ग़ौर फरमाते हैं।

1. पहली बात, ऐसे शिक्षक बहुत ही विपरीत परिस्थितियों में काम कर रहे होते हैं। उनके स्कूल में बच्चों के बैठने के लिए बेंच नहीं होती, कभी-कभी दरी तक नहीं होती, पंखे और बिजली तो दूर की बात है, फोन का नेटवर्क भी नहीं आता बहुत से इलाक़ों में, शिक्षकों को स्कूल पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी होती है। कभी-कभी आठवीं तक के स्कूल में चार का ही स्टाफ होता है तो बहुत सारे कामों को करने की जिम्मेदारी उनके कंधे पर होती हैं। इसलिए ऐसे शिक्षकों की तारीफ करनी चाहिए ताकि उनको यह न लगे कि बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने और उनके भविष्य की परवाह करने वाली अपनी कोशिश में वे अकेले खड़े हैं।

2. दूसरी बात, ऐसे शिक्षक उन बच्चों के साथ काम कर रहे हैं जिनको वाकई सपोर्ट की जरूरत है। जिनके घर पर कोई पूछने वाला नहीं है कि तुम्हारा आज का दिन स्कूल में कैसा था? इन बच्चों के लिए किसी तरह के ट्युशन की कोई व्यवस्था नहीं होती। ऐसे बच्चों को घर का काम भी करना होता है। अभिभावकों के खेत पर जाने वाली स्थिति में घर और छोटे बच्चों के रखवाली करने की जिम्मेदारी भी बच्चों के ऊपर होती है। ऐसे बच्चों के साथ धैर्य से काम करने और उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए सदैव प्रयास करने वाले शिक्षकों की तारीफ करनी जरूरी है ताकि उनके भीतर यह अहसास बना रहे कि कतार की आखिर में खड़े लोगों को आगे लाने की मुहिम में उनके दर्द को समझने वाले लोग भी हैं। केवल आलोचना के बाण छोड़ने वाले लोगों की मौजूदगी से तो सब वाकिफ हैं।

3. तीसरी बात, लोगों में विश्वास पैदा हो कि सरकारी स्कूल में अच्छा काम करने वाले शिक्षक भी हैं। चाहें उनकी संख्या कुछ हज़ार ही क्यों न हो। ऐसे शिक्षक काम करना चाहते हैं, जब वे बच्चों को पढ़ा नहीं पाते तो उन्हें भी तकलीफ होती है। एक शिक्षक कहते हैं, “हमें तकलीफ होती है जब हम पूरे महीने शैक्षणिक कार्यों के अलावा अन्य काम करके वेतन लेते हैं। हमें लगता है कि हम बच्चों के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं।”

4. हमें ऐसे इंसान की कद्र करनी चाहिए जो चौतरफा आलोचनाओं के बावजूद अपने काम को ज़िंदादिली के साथ करने की कोशिश कर रहे हैं।बोर्ड की परीक्षाओं के कारण बच्चों के साथ-साथ शिक्षक भी दबाव में हैं। उनके ऊपर परिणाम देने का दबाव बनाया जा रहा है। शिक्षकों पर चौतरफा हमले हो रहे हैं। उनको हर बात के लिए निशाना बनाया जाता है। मगर जब फैसले की बात होती है। निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी की बात होती है तो वे हासिये पर ढकेल दिये जाते हैं। किसी भी पॉलिसी को अंतिम रूप देने से पहले उनके विचारों को कोई महत्व नहीं दिया जाता है। हमने उनको सिर्फ किसी काम को लागू करने वाली एजेंसी का एजेंट बना दिया है।

5. किसी सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक की कद्र हमें इसलिए भी करनी चाहिए कि हममें से अधिकांश लोगों को उन लोगों ने पढ़ाया है जिनकी पढ़ाई-लिखाई खुद इन्हीं सरकारी स्कूलों में हुई है। या फिर हमने भी इन्हीं सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की है। चाहें वह पहली से आठवीं तक की बात हो या फिर दसवीं या बारहवीं की। अगर वे शिक्षक हमारी ज़िंदगी में नहीं होते तो शायद हम इस मुकाम पर नहीं होते। यह और बात है कि वक्त के साथ सरकारी स्कूलों, सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों, सरकारी शिक्षा का महत्व कम होता दिख रहा है।

पर जितने बड़े स्तर पर ये स्कूल काम करते हैं, उस नज़रिये से इनका महत्व आज भी ज्यों का त्यों कायम है। इसकी चुनौतियां अगर बदली हैं तो हमें नये समाधान खोजने होंगे। कुछ फैसले अगर स्कूलों व शिक्षा के हित में नहीं हैं तो उन्हें बदलना भी होगा। यह ध्यान रखते हुए कि शिक्षक की जगह कोई भी तकनीक, कोई भी पासबुक या कोई भी डिजिटल डिवाइस या टीचर एजुकेटर नहीं ले सकता है। एक शिक्षक का काम एक शिक्षक ही भली भांति कर सकता है।

इसलिए भी हमें एक शिक्षक का दिल से सम्मान करना चाहिए। उनके मेहनत की कद्र करनी चाहिए क्योंकि वे बहुत से घरों में शिक्षा का पहला दीपक जलाने का प्रयास कर रहे हैं। हमारी तारीफ से उनकी कोशिशों को बल मिलेगा और वे अपने प्रयासों को ज्यादा अच्छे ढंग से करने की कोशिश करेंगे।

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9 Comments on शिक्षकों की तारीफ में कंजूसी क्यों?

  1. I should we thankful for the readers and teachers who find an alignment with such writing. It gives happiness to read that these stories give support and encouragement to the teachers community. Good wishes for your journey. Such support will be always there for admirable work done by the teachers and teacher educators as well. We need such strong voice from teacher’s side too. I would like to publish any writing related to their challenges on ground and success stories as well.

  2. Words of appreciation can work wonders fr ny mortal. And same theory goes wid d words of negativity, dat these can hamper d spirit of nyone who might be working hard in her/his field. All d society talks abt our increased pay structures. Offcourse we, d government school teachers, r olso getting paid fr our work. May i knw wch profession z goin on without paying d workers involved wid it? ??? nobdy lyk bashing, we too need positive reinforcement nd a respect in d society, Again. We r working towards achieving it. But we need such a support too. A big thnku fr sch a post

  3. इस पोस्ट के बारे में शिवानी ने लिखा, ” I am not against criticism…….bt y only negative-criticism??? from every corner of d society, be it print-media, electronic-media or any sch public platform that too without weighing d efforts we r putting in…………..every effort of ours z weighed in d terms of salaries we r getting……….dis z really derogatory………..we, d government sector teachers, r olso humans…….and we have fetched our jobs through a fair competition, we didn’t just enter hाre for the sake of salaries. Some are here, as they had their role models in d form of teachers (my father was a teacher with a Government school, and he is my role model)……….I am not asking anyone to praise us, but at least stop being judgemental for us…………Kudos to d article writer and a big thank you from all of us.”

  4. वृजेश सिंह // July 7, 2017 at 6:20 am //

    इस पोस्ट के बारे में लोगों ने जो कहा, “Excellent view, hope one day society will understand the importance of teachers & work done by them.”

    “I generally post the most positive aspect of any school which i visit…under the title every school is unique and so are the teachers…”

    “You wrote excellent view.”

    “Parents apne bachchon ke bhi tareef me kafi kanjoos hain hamare samaj me.” इसका जवाब था, “यह एक जेनेटिक समस्या है भारत में। काम करने वाले लोगों की तारीफ करके हम अपने आसपास का माहौल अच्छा बना सकते हैं। शायद आर्ट ऑफ एप्रीशिएशन जैसा कोई कोर्स चलाना पड़ेगा।”

  5. पहले लिखी पोस्ट के अंश, “भारत की वर्तमान शैक्षिक व्यवस्था में अध्यापक की कल्पना चिंतन करने के बजाय, चिंतित रहने वाले एक मनुष्य के रूप में की जा सकती है. समाज के एक जागरूक सदस्य के रूप में अध्यापकों से हमारी बड़ी अपेक्षाएं होती है. लेकिन उनके सहयोग में संकोच करने वाली सोच का दबदबा समाज में आज भी बरकरार है.” आपकी चिंताओं की तरफ संकेत करते हैं।

  6. धीरेंद्र जी, सबसे पहले आपका बहुत-बहुत शुक्रिया इस पोस्ट को पढ़ने। पसंद करने। अपने विचार साझा करने के लिए। शिक्षक की भूमिका को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने की एक कोशिश की है। शिक्षकों की अच्छाइयों को हाईलाइट करने की एक छोटी सी कोशिश है जो जारी रहेगी।

    आपकी बात से बिल्कुल सहमत हूँ कि प्रोत्साहन मिलना चाहिए और सही सपोर्ट मिलना चाहिए। मगर ज़मीनी सच्चाई इसके विपरीत नज़र आती है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि हम अपनी तरफ से सही बातों को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करें।

    स्कूल में भयमुक्त माहौल हर किसी के लिए होना चाहिए। स्कूल आने वाले बच्चों के साथ-साथ शिक्षकों को भी ऐसा माहौल देना प्रशासन और समाज की जिम्मेदारी है।

  7. Dheerendra // March 19, 2016 at 5:53 pm //

    शिक्षकों की वर्तमान स्थिति , उनकी मनःस्थिति को साझा करने के लिए धन्यवाद । कैसे विषम परिस्थिति में भी शिक्षक अपनी भूमिका निभा रहा है।आजकल छात्र- छात्राओं के साथ शिक्षकों को भी मूल्यांकन से गुजरना पड रहा है और वह भी केवल एक तरफा, जहाँ देखने का दृष्टिकोण ही नकारात्मक है अच्छाइयाँ तो उपेक्षित ही रह जाती है और कमियों को हाईलाइट कर दिया जाता है।विविडंबना यह है कि किसी शिक्षक को कुछ कमी रहने पर फटकार तो बहुत मिलती है पर उस कमी को दूर करने का सहयोग नही , कुछ अच्छा करने हेतु प्रोत्साहन नही। बच्चों के लिए जिस तरह भयमुक्त शिक्षा आवश्यक है निःसंदेह यह सत्य है ।परंतु शिक्षण कार्य करवाने वाला ही भययुक्त माहौल मे रहे तो क्या शिक्षण प्रभावित नहीं होगा……?

  8. इस पोस्ट को पसंद करने और अपनी राय बताने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया पंकज जी। भारत में प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा काम करने वाले शिक्षकों को प्रोत्साहन की जरूरत है ताकि वे अपने काम को जिंदादिली के साथ कर सकें।

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